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छत्तीसगढ़ में शिकारियों के सामाजिक बहिष्कार का विरोध क्यों कर रहे हैं वन्यजीव कार्यकर्ता?

छत्तीसगढ़ के एक वन्यजीव कार्यकर्ता ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को पत्र लिखकर वन विभाग के जरिए वन्यजीव अपराधियों के सामाजिक बहिष्कार के फैसले को रोकने की मांग की है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 6 फ़रवरी , 2026

24 दिसंबर 2025 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वन विभाग की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई. इस बैठक में वन्यजीव संरक्षण के लिए एक नई रणनीति तय की गई, जिसमें अवैध शिकार करने वालों के सामाजिक बहिष्कार की बात कही गई.

वन विभाग का यह फैसला अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बन गया है. विपक्ष के अलावा वन्यजीव कार्यकर्ता भी इस फैसले का विरोध कर रहे हैं. आलोचकों का कहना है कि विभाग का यह तर्क 'खाप पंचायतों' के फरमानों के समान है.

वन्यजीव कार्यकर्ताओं के मुताबिक, सामाजिक बहिष्कार का यह फैसला संवैधानिक अधिकारों और मौलिक गारंटियों का उल्लंघन करता है. इतना ही नहीं, इससे समाज में अशांति और तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है. राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) एके पांडे की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में बाघ अभयारण्यों के फील्ड अधिकारियों सहित भारतीय वन सेवा (IFS) के कई अधिकारी शामिल थे.

 बैठक में यह निर्णय लिया गया कि वन विभाग अवैध शिकार के खिलाफ जागरूकता फैलाने के लिए ग्राम प्रधानों, धार्मिक नेताओं, प्रभावशाली व्यक्तियों और सामाजिक संगठनों की मदद लेगा. ऐसी बैठकों में शिकार के मामलों की तस्वीरें साझा की जाएंगी और बार-बार अपराध करने वालों के खिलाफ सामाजिक बहिष्कार की अपील की जाएगी.

वन विभाग ने ऐसे आरोपियों को समाज से बहिष्कृत करने की अपील करने का फैसला किया है. ऐसी पहली बैठकें उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व और कवर्धा वन प्रभाग (जिसमें भोरमदेव वन्यजीव अभयारण्य शामिल है) में प्रस्तावित हैं, क्योंकि इन क्षेत्रों में अवैध शिकार के ज्यादा मामले सामने आते हैं.

रायपुर के वन्यजीव कार्यकर्ता नितिन सिंहवी ने RTI के माध्यम से इस बैठक से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की है. उन्होंने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर वन्यजीव अपराधियों के प्रस्तावित सामाजिक बहिष्कार को रोकने के लिए हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है.

सिंहवी का मानना है कि इस तरह का फैसला किसी व्यक्ति को आत्महत्या तक के लिए विवश कर सकता है. उन्होंने कहा, "सामाजिक बहिष्कार का अर्थ है किसी व्यक्ति को समाज, संस्कृति, आर्थिक गतिविधियों और परिवार से अलग-थलग कर देना, साथ ही सार्वजनिक रूप से अपमानित करना. ग्रामीण क्षेत्रों में, खासकर आदिवासी समुदायों में, इस प्रकार के बहिष्कार का किसी व्यक्ति के जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है."

सिंहवी ने आगे कहा कि आदिवासी और ग्रामीण समाजों में सामाजिक बहिष्कार बेहद गंभीर होता है और इसका असर पूरे परिवार पर पड़ता है. उन्होंने कहा कि प्रथम दृष्टया यह आह्वान संविधान में निहित सुरक्षा और स्वतंत्रता का उल्लंघन प्रतीत होता है. उन्होंने सवाल उठाया, "अगर अदालतें आरोपी को निर्दोष पाती हैं तो क्या होगा? सामाजिक बहिष्कार से हुए नुकसान की भरपाई कैसे की जाएगी?" 

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