उत्तर प्रदेश में पराली जलाने की घटनाएं एक बार फिर सुर्खियों में हैं. सरकार की सख्त हिदायतों, जुर्माने और वैकल्पिक उपायों की योजनाओं के बावजूद किसान पराली जलाना बंद नहीं कर रहे. ताजा आंकड़े चौंकाने वाले हैं. इस बार उत्तर प्रदेश ने पंजाब को पीछे छोड़ते हुए देश में पराली जलाने के मामलों में पहला स्थान हासिल किया है.
कंसोर्टियम फॉर रिसर्च ऑन एग्रो इकोसिस्टम मॉनिटरिंग एंड मॉडलिंग फ्रॉम स्पेस” (CREAMS) के आंकड़ों के मुताबिक, 15 सितंबर से 22 अक्टूबर 2025 के बीच प्रदेश में पराली जलाने के कुल 704 मामले दर्ज हुए हैं, जबकि पंजाब में यह संख्या 484 रही. हरियाणा में 58, राजस्थान में 292, मध्य प्रदेश में 378 और दिल्ली में मात्र तीन मामले सामने आए हैं.
इन आंकड़ों से साफ है कि पराली जलाने की समस्या अब पंजाब या हरियाणा तक सीमित नहीं रही. यह पूरे उत्तर भारत की हवा में फैल चुकी है, और इस बार इसका केंद्र उत्तर प्रदेश बन गया है. यह तब हुआ है जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद निर्देश दिया था कि वित्त वर्ष 2025-26 में पराली जलाने की घटनाओं को शून्य किया जाए. उन्होंने सभी जिलाधिकारियों को सख्त आदेश दिए थे कि सेटेलाइट से निगरानी कराई जाए, दोषियों पर कार्रवाई की जाए और किसानों को वैकल्पिक उपायों के लिए जागरूक किया जाए.
आदेश में यहां तक कहा गया था कि यदि कोई किसान पराली जलाते हुए पाया जाता है, तो उस पर पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई जाए. दो एकड़ से कम क्षेत्र पर 2,500 रुपए, दो से पांच एकड़ पर 5,000 रुपए और पांच एकड़ से अधिक पर 15,000 रुपए तक का जुर्माना तय किया गया है. लेकिन इन सब प्रयासों के बावजूद हालात सुधरने के बजाय बिगड़ते दिख रहे हैं. इसका मतलब है कि सरकारी नीतियों और उनको लागू करने के बीच की भारी खाई है.
उत्तर प्रदेश में भी मथुरा जिला पराली जलाने का नया केंद्र बन गया है. पिछले तीन वर्षों से लगातार यह जिला इस मामले में प्रदेश में पहले नंबर पर है. इस साल भी यही स्थिति बनी हुई है. 15 सितंबर से अब तक मथुरा में पराली जलाने की 75 घटनाएं दर्ज की गई हैं. जिले में धान कटाई शुरू होते ही हवा की गुणवत्ता तेजी से बिगड़ी. समीर ऐप के आंकड़ों के मुताबिक, एक से नौ अक्टूबर तक वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 50 से 60 के बीच था. जैसे ही कटाई शुरू हुई, 10 अक्टूबर को AQI 100 पर पहुंचा, 11 को 115, 18 को 129 और 19 अक्टूबर को यह बढ़कर 156 तक पहुंच गया. यानी खेतों में जलती पराली ने हवा में जहर घोल दिया. दीपावली के आस-पास वायु प्रदूषण और बढ़ गया. यह स्थिति साफ बताती है कि पराली जलाने के असर को न तो प्रशासन रोक पा रहा है और न किसान इसे गंभीरता से ले रहे हैं.
मथुरा जिले के उप कृषि निदेशक कार्यालय में कार्यरत प्राविधिक सहायक नरेंद्र पाल सिंह को अपनी आवंटित ग्राम पंचायत भरनाखुर्द में पराली जलाने की रोकथाम न करने के कारण निलंबित कर दिया गया. जिलाधिकारी सीपी सिंह का कहना है, “हम किसानों को लगातार जागरूक कर रहे हैं. पराली जलाने पर कानूनी कार्रवाई होगी, एफआईआर दर्ज की जाएगी और नुकसान की भरपाई कराई जाएगी.” प्रशासन की तरफ से बयान जारी किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों का रवैया अलग ही है.
गांवों में किसानों से बातचीत करने पर एक अलग कहानी सामने आती है. मथुरा के किसान ओमप्रकाश कहते हैं, “हम क्या करें? कटाई के बाद खेत में पराली रह जाती है. मजदूर मिलते नहीं, मशीनें महंगी हैं और अगली फसल का समय नजदीक होता है. इसे जलाना ही सबसे आसान तरीका है.” यह बयान उस सच्चाई की तरफ इशारा करता है जिसे सरकारी कागजों में जगह नहीं मिलती.
पीलीभीत में तो हालात और तनावपूर्ण हैं. 23 अक्टूबर को छाता तहसील के हताना गांव में पराली जलाने से रोकने पहुंचे लेखपाल और वीडीओ पर किसानों ने हमला करने की कोशिश की. तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया और 12 को पाबंद किया गया. यह घटना दिखाती है कि किसानों और प्रशासन के बीच संवाद और भरोसे की कितनी कमी है. किसानों को यह कार्रवाई दमन लगती है, जबकि अधिकारी इसे नियमों का पालन बताते हैं.
प्रदेश के कृषि विभाग में भी पराली जलाने को लेकर हड़कंप है. 23 अक्टूबर को कृषि निदेशालय लखनऊ में शीर्ष अधिकारियों की बैठक हुई. कृषि निदेशक डॉ. पंकज त्रिपाठी ने निर्देश दिए कि मुख्यालय के अधिकारी अब सीधे फील्ड पर जाकर निगरानी करेंगे. उन्होंने दावा किया कि “पिछले साल की तुलना में घटनाओं में कमी आई है.” लेकिन विभाग के अपने ही आंकड़े बताते हैं कि यूपी में पराली जलाने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं. वर्ष 2020 में पराली जलाने की कुल 554 घटनाएं सामने आयीं थीं. इसके बाद वर्ष 2021 में 631, वर्ष 2022 में 204, वर्ष 2023 में 423, वर्ष 2024 में 723 तो वर्ष 2025 के सितंबर महीने तक 660 मामले सामने आए हैं. अक्टूबर के अंत तक यह संख्या 700 से पार हो जाएगी. यानी दावा कुछ और है, हकीकत कुछ और.
राज्य सरकार ने इस बार किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए मल्चर और ट्रेचर जैसी मशीनों पर 40 से 50 प्रतिशत तक की सब्सिडी की घोषणा की है. ये मशीनें पराली को काटकर मिट्टी में मिला देती हैं, जिससे खेत की उर्वरता बढ़ती है. किसानों को इस योजना का लाभ पाने के लिए कृषि विभाग के पोर्टल पर आवेदन करना होता है या नजदीकी कार्यालय से संपर्क करना पड़ता है. आवेदन प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए सरकार ने टोकन भुगतान प्रणाली भी शुरू की है. 10,000 रुपये तक के उपकरण पर कोई टोकन भुगतान नहीं, 10,000 से 50,000 रुपये तक के उपकरण पर 2,500 रुपये और एक लाख से ऊपर की मशीन पर 5,000 रुपये तक का टोकन शुल्क तय किया गया है.
सरकार का मानना है कि इस योजना से किसान पराली जलाने के बजाय उसे खेत में ही मिलाने के लिए प्रेरित होंगे. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सब्सिडी का फायदा तभी होगा जब यह जमीन तक पहुंचे. पंजाब और हरियाणा के पिछले अनुभव बताते हैं कि ऐसी योजनाओं में अक्सर आवेदन प्रक्रिया जटिल होती है, वितरण में देरी होती है और जागरूकता की भारी कमी रहती है.
छोटे किसान तो इस प्रक्रिया से ही बाहर रह जाते हैं. कई बार जिला स्तर पर ही आवेदन फंस जाते हैं और मशीनें गांवों तक नहीं पहुंच पातीं. बाराबंकी के किसान अमरजीत सिंह कहते हैं, “सरकार कहती है पराली मत जलाओ, लेकिन इसे हटाने का खर्च कौन देगा? मजदूरी बढ़ गई है. मशीन किराए पर लेने के लिए 25 हजार रुपये लगते हैं. हमारी खेती में इतना बचता ही नहीं.” अमरजीत की बात उन लाखों किसानों की आवाज है जो नीति और वास्तविकता के बीच फंसे हैं.
विशेषज्ञ मानते हैं कि पराली जलाने की समस्या केवल कानूनी नहीं, आर्थिक भी है. किसान अपनी लागत कम रखना चाहता है. पराली को हटाने या प्रबंधन के उपाय उसके लिए अतिरिक्त खर्च बन जाते हैं. इसलिए वह जोखिम उठाकर भी उसे जला देता है. प्रशासन जुर्माना लगाता है, लेकिन पराली फिर भी जलती है.
इस समय उत्तर प्रदेश के कई जिलों में हवा का स्तर तेजी से गिर रहा है. मथुरा, शाहजहांपुर, बाराबंकी, फतेहपुर और पीलीभीत से आने वाला धुआं दिल्ली-एनसीआर की हवा को भी प्रभावित करता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, पराली जलाने से हवा में पीएम 2.5 और पीएम 10 कणों की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है. इससे सांस और फेफड़ों के रोग बढ़ते हैं. एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट पहले ही राज्यों को इस मुद्दे पर फटकार लगा चुके हैं, लेकिन हर साल वही स्थिति दोहराई जाती है, नए आदेश, नई योजनाएं, और वही पुराना धुआं.
अब सवाल यह है कि आगे का रास्ता क्या है. विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल जुर्माने से यह समस्या नहीं सुलझेगी. इसके लिए किसानों को प्रोत्साहन और तकनीकी सहायता दोनों की जरूरत है. किसान नेता हरनाम सिंह वर्मा बताते हैं, “सबसे पहले, पंचायत या किसान उत्पादक संगठन (FPO) स्तर पर मशीन बैंक बनाए जाएं, ताकि छोटे किसान भी सस्ती दर पर उपकरणों का इस्तेमाल कर सकें. दूसरा, किसानों को प्रशिक्षण दिया जाए कि पराली को मिट्टी में कैसे मिलाया जा सकता है. तीसरा, फसल अवशेष से बायोगैस या ऊर्जा उत्पादन के मॉडल को प्रोत्साहित किया जाए. इससे किसानों को आर्थिक लाभ भी मिलेगा और प्रदूषण भी घटेगा.”
कई विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि किसानों को अपराधी नहीं, भागीदार बनाया जाए. जब तक किसान की मजबूरी को समझे बिना उस पर कार्रवाई की जाएगी, तब तक कोई भी नीति सफल नहीं हो सकती. किसान पराली इसलिए नहीं जलाता कि उसे पर्यावरण की परवाह नहीं, बल्कि इसलिए कि उसके पास कोई सस्ता और सही विकल्प नहीं है. सरकार की मंशा साफ है, स्वच्छ हवा और प्रदूषण मुक्त प्रदेश. लेकिन नीतियों का असर तभी दिखेगा जब वे खेत तक पहुंचेंगी. कागजों पर नियम कठोर हैं, मगर जमीनी हकीकत यह है कि अधिकारी आंकड़े सुधारने में लगे हैं, किसान अगले फसल चक्र की चिंता में, और हवा में धुआं फैलता जा रहा है.
पराली जलाने का यह वार्षिक संकट एक चेतावनी भी है कि अगर नीति का क्रियान्वयन किसानों की वास्तविकता से मेल नहीं खाता, तो हर सर्दी वही कहानी दोहराई जाएगी.

