उत्तर प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों की चल-अचल संपत्ति की अनिवार्य घोषणा एक बार फिर सत्ता और सिस्टम के बीच सबसे संवेदनशील सवाल बनकर उभरी है. 31 जनवरी की तय समयसीमा तक मानव संपदा पोर्टल पर संपत्ति का वार्षिक ब्योरा अपलोड न करने वाले 47,816 राज्यकर्मियों पर अब अनुशासनात्मक कार्रवाई की तलवार लटक रही है.
जनवरी का वेतन रोके जाने और प्रमोशन पर रोक जैसे सख्त कदमों के बावजूद यह सवाल जस का तस है कि आखिर सरकारी कर्मचारी अपनी संपत्ति बताने से हिचक क्यों रहे हैं. योगी सरकार ने इस बार संपत्ति घोषणा को महज औपचारिकता नहीं रहने दिया. मुख्य सचिव एसपी गोयल ने नवंबर और फिर जनवरी में दो बार स्पष्ट निर्देश जारी किए कि उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली के तहत सभी श्रेणियों के राज्यकर्मी पिछले वर्ष तक की अपनी चल-अचल संपत्ति का ब्योरा 31 जनवरी तक मानव संपदा पोर्टल पर अनिवार्य रूप से दर्ज करें. इसके बावजूद 8.65 लाख में से 47,816 कर्मचारी तय समयसीमा में यह प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाए.
नियम क्या कहते हैं
उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी आचरण नियमावली के अनुसार हर सरकारी कर्मचारी को हर साल अपनी और अपने आश्रितों की चल-अचल संपत्ति का विवरण देना अनिवार्य है. इसमें जमीन, मकान, फ्लैट, दुकान, वाहन, आभूषण, निवेश, बैंक जमा और अन्य महत्वपूर्ण परिसंपत्तियां शामिल हैं. नियम यह भी कहता है कि यदि कोई कर्मचारी सेवा काल में कोई बड़ी संपत्ति खरीदता है तो उसे विभागीय अनुमति लेनी होती है और वार्षिक संपत्ति विवरण में उसका स्पष्ट उल्लेख करना होता है.
यह नियम केवल औपचारिक घोषणा तक सीमित नहीं है. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कर्मचारी की आय और संपत्ति के बीच कोई असंगति न हो. यदि किसी कर्मचारी की घोषित आय के मुकाबले असामान्य संपत्ति पाई जाती है, तो उसके खिलाफ विभागीय जांच और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई का रास्ता खुलता है.
नियमों का उल्लंघन करने पर कार्रवाई का प्रावधान भी उतना ही सख्त है. समय पर संपत्ति विवरण न देने को आचरण नियमों का उल्लंघन माना जाता है. इसके तहत वेतन रोका जा सकता है, वार्षिक वेतनवृद्धि और प्रमोशन पर रोक लग सकती है और गंभीर मामलों में विभागीय जांच शुरू कर निलंबन तक की कार्रवाई हो सकती है.
इस बार सरकार ने वेतन को हथियार बनाया. निर्देश दिया गया कि जिन कर्मचारियों ने संपत्ति विवरण अपलोड नहीं किया है, उन्हें फरवरी में जनवरी का वेतन न दिया जाए. अगर किसी कर्मचारी को नियम के बावजूद वेतन मिल जाता है, तो संबंधित आहरण-वितरण अधिकारी यानी डीडीओ को जिम्मेदार ठहराया जाएगा. यही वजह है कि विभागीय प्रमुखों से एक सप्ताह में पूरी रिपोर्ट तलब की गई है.
अधिकारियों में क्यों है डर
दिलचस्प बात यह है कि संपत्ति घोषणा में सबसे ज्यादा पिछड़ापन वरिष्ठ अधिकारियों में दिखा है. मानव संपदा पोर्टल पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक प्रथम श्रेणी के केवल 83 प्रतिशत अधिकारियों ने संपत्ति का ब्योरा दिया, जबकि तृतीय श्रेणी के 96 प्रतिशत कर्मचारियों ने यह प्रक्रिया पूरी की. संपत्ति न बताने वालों में 16.89 प्रतिशत प्रथम श्रेणी और 13.92 प्रतिशत द्वितीय श्रेणी के अधिकारी हैं. इसके मुकाबले तृतीय श्रेणी में यह आंकड़ा 4.03 प्रतिशत और चतुर्थ श्रेणी में 7.34 प्रतिशत है. यह असमानता कई सवाल खड़े करती है. आम तौर पर यह माना जाता है कि निचले स्तर के कर्मचारियों को तकनीकी या जानकारी की कमी हो सकती है, लेकिन यहां तस्वीर उलट है. जानकार मानते हैं कि वरिष्ठ अधिकारियों में संपत्ति का स्वरूप जटिल होता है और वही हिचक का बड़ा कारण है.
स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा, बेसिक और माध्यमिक शिक्षा, लोक निर्माण, राजस्व, पंचायती राज, गृह, पशुधन, वित्त, वन, बाल विकास एवं पुष्टाहार और सिंचाई जैसे बड़े विभागों में संपत्ति न बताने वाले कर्मचारियों की संख्या अपेक्षाकृत ज्यादा है. ये वही विभाग हैं जहां बजट, निर्माण कार्य, नियुक्ति और सेवा वितरण से जुड़े फैसले लिए जाते हैं. ऐसे में सरकार का संदेह और गहराता है कि कहीं संपत्ति घोषणा से बचने के पीछे अनियमितताओं का डर तो नहीं.
यह पहली बार नहीं है जब संपत्ति घोषणा को लेकर सख्ती दिखाई गई हो. पिछले वर्षों में भी सौ से अधिक अधिकारियों के खिलाफ संपत्ति विवरण न देने या गलत जानकारी देने पर विभागीय जांच शुरू हुई है. कुछ मामलों में निलंबन और वेतनवृद्धि रोकने जैसी कार्रवाई भी हुई. विजिलेंस जांच में कई ऐसे अधिकारी पकड़े गए जिनकी आय के मुकाबले संपत्ति असंगत पाई गई. सरकार के सूत्रों का कहना है कि इस बार खासतौर पर उन अधिकारियों की सूची तैयार की जा रही है जिन्होंने लगातार एक से ज्यादा वर्षों तक संपत्ति विवरण नहीं दिया. इनमें से कई प्रथम और द्वितीय श्रेणी के अधिकारी हैं.
ऐसे मामलों में केवल वेतन रोकने तक सीमित न रहकर विस्तृत जांच कराई जा सकती है. प्रशासनिक मामलों के जानकार और पूर्व आईएएस अधिकारी एसके सिंह कहते हैं, “संपत्ति विवरण देने का नियम नया नहीं है. फर्क सिर्फ इतना है कि अब इसका डिजिटल ट्रैक बन रहा है. पहले फाइलों में कागज दब जाते थे, अब हर एंट्री का रिकॉर्ड रहेगा.” उनका मानना है कि यही डिजिटल ट्रैकिंग कई अधिकारियों को असहज कर रही है.
हिचक के पीछे की वजहें
सरकारी गलियारों में चर्चा है कि संपत्ति घोषणा से बचने के पीछे सबसे बड़ा डर जांच का है. कई अधिकारी ऐसे हैं जिन्होंने वर्षों पहले जमीन या मकान खरीदे, लेकिन उस समय विभागीय अनुमति नहीं ली. कुछ मामलों में संपत्ति पत्नी, बच्चों या रिश्तेदारों के नाम पर है, जिनका ब्योरा देने में असमंजस है. यदि यह संपत्ति घोषित कर दी गई, तो पुराने मामलों की फाइलें खुलने का खतरा है. दूसरी वजह यह है कि यदि किसी संपत्ति को वार्षिक विवरण में नहीं दिखाया गया और बाद में शिकायत या जांच में वह सामने आ गई, तो कार्रवाई तय मानी जाती है. इसलिए कुछ अधिकारी जोखिम लेने के बजाय पूरी प्रक्रिया से ही दूरी बनाए रखना बेहतर समझते हैं, भले ही इसका खामियाजा वेतन रोकने के रूप में क्यों न भुगतना पड़े.
हालांकि सभी मामलों को जानबूझकर की गई अनदेखी कहना भी पूरी सच्चाई नहीं है. कई कर्मचारियों ने तकनीकी और व्यवहारिक समस्याओं की ओर भी इशारा किया है. मानव संपदा पोर्टल पर संपत्ति अपलोड करने की प्रक्रिया कई कर्मचारियों के लिए जटिल है. पोर्टल पर लॉगिन की समस्या, ओटीपी न आना, पुराने डेटा का न दिखना और दस्तावेज अपलोड में दिक्कत जैसी शिकायतें सामने आई हैं.
ग्रामीण क्षेत्रों में तैनात कर्मचारियों के लिए इंटरनेट की उपलब्धता और तकनीकी सहायता की कमी भी बाधा बनी. कुछ विभागों में समय रहते आंतरिक स्तर पर कोई मॉनिटरिंग नहीं हुई, जिससे आखिरी दिनों में भारी भीड़ के कारण पोर्टल स्लो हो गया. हालांकि सरकार का तर्क है कि दो महीने का पर्याप्त समय दिया गया था और तकनीकी दिक्कतें अपवाद हो सकती हैं, नियम से बचने का बहाना नहीं.
योगी सरकार का दावा कि वह भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपना रही
योगी सरकार का दावा है कि यह पूरी प्रक्रिया भ्रष्टाचार विरोधी अभियान है. यही वजह है कि मुख्य सचिव स्तर से सीधे निगरानी की जा रही है और डीडीओ तक की जवाबदेही तय की गई है. यह संदेश साफ है कि संपत्ति घोषणा अब कागजी खानापूर्ति नहीं रहेगी. नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग के अधिकारियों का कहना है कि संपत्ति का ब्योरा देने से ईमानदार कर्मचारियों को डरने की जरूरत नहीं है. नियम सभी के लिए समान हैं और पारदर्शिता ही प्रशासनिक भरोसे की बुनियाद है.
सरकार यह भी दावा कर रही है कि तकनीकी दिक्कतों को दूर करने के लिए पोर्टल को और सरल बनाया जाएगा, लेकिन नियमों में ढील की कोई गुंजाइश नहीं है. यूपी के एक पूर्व आईएएस अफसर एस. पी. आर्य बताते हैं, “आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि कितने कर्मचारी आखिरी मौका मिलने पर संपत्ति विवरण देते हैं और कितनों पर वास्तव में कार्रवाई होती है. लेकिन इतना तय है कि संपत्ति घोषणा को लेकर यह सख्ती प्रशासनिक संस्कृति में एक बड़ा बदलाव है. इससे यह भी तय होगा कि सरकारी तंत्र में पारदर्शिता केवल नारे तक सीमित रहती है या वास्तव में व्यवहार में उतरती है.”

