करीब ढाई साल पहले जयपुर के किशनपोल, हवामहल और शास्त्री नगर इलाकों में हिंदुओं के पलायन के पोस्टर लगाए गए थे. घरों के बाहर लगे इन पोस्टरों को लेकर खूब सियासी बवाल हुआ और इस मामले की गूंज राजस्थान विधानसभा में भी सुनाई दी. BJP प्रवक्ता रामलाल शर्मा ने तो पोस्टर लगाने वालों की पैरवी करते हुए इसे 'लैंड जिहाद' तक बता दिया. हालांकि, विवाद बढ़ने पर पुलिस ने स्पष्ट किया कि यहां पलायन जैसा कोई मामला नहीं है और न ही किसी ने शिकायत दी है कि वे भय के कारण पलायन कर रहे हैं.
इसी पोस्टर विवाद की परिणति के बतौर राजस्थान की भजनलाल सरकार अब एक ऐसा कानून लाने की तैयारी कर रही है जिससे राजस्थान में दंगा और अशांत क्षेत्रों में जमीन, जायदाद और मकान जैसी संपत्ति के ट्रांसफर पर कानूनी शिकंजा कसा जा सकेगा. भजनलाल कैबिनेट ने ‘राजस्थान अशांत क्षेत्रों में अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक और किराएदारों को बेदखली से संरक्षण विधेयक, 2026’ के ड्राफ्ट को मंजूरी दी है. इसके तहत अशांत क्षेत्रों में बिना सरकार की मंजूरी के कोई भी प्रॉपर्टी खरीदी और बेची नहीं जा सकेगी.
गुजरात के बाद राजस्थान ऐसा दूसरा राज्य होगा जहां इस तरह का बिल लाया जा रहा है. गुजरात में 1986 में अमर सिंह चौधरी की कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में ‘गुजरात अशांत क्षेत्रों में अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर प्रतिबंध और किराएदारों को परिसर से बेदखली से संरक्षण बिल’ लाया गया था. इसे 1991 में तत्कालीन चिमनभाई पटेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने कानूनी जामा पहनाया. 2002 में गुजरात दंगों के बाद वहां की BJP सरकार ने इस कानून में व्यापक संशोधन किए.
राजस्थान में इसे लागू करने के पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि यह कानून सांप्रदायिक तनाव को रोकने, अवैध सौदों पर लगाम लगाने और किसी भी इलाके के जनसांख्यिकीय संतुलन में अचानक बदलाव को नियंत्रित करने में कारगर होगा. सरकारी पक्ष का मानना है कि कई बार दंगों के बाद भय, दबाव या अफवाहों के माहौल में प्रॉपर्टी के सौदे होते हैं, जिससे भविष्य में और तनाव पैदा होता है. राजस्थान सरकार के संसदीय कार्यमंत्री जोगाराम पटेल कहते हैं, ‘‘कुछ विशेष इलाकों में जनसांख्यिकीय असंतुलन को रोकने, कानून-व्यवस्था व सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए यह कानून लाया जा रहा है. इन इलाकों में दंगा या हिंसा के भय से स्थानीय लोग अपनी संपत्ति बहुत ही कम दामों में बेचने को मजबूर हो जाते हैं. यह कानून ऐसे लोगाें के हितों की रक्षा करेगा.’’
वहीं दूसरी तरफ प्रतिपक्ष और कानून विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कानून संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा. प्रतिपक्ष को आशंका है कि इस एक्ट का अघोषित फोकस मुस्लिम बहुल इलाकों पर रहेगा. इसके जरिए यह सुनिश्चित किया जाएगा कि ऐसे इलाकों में मुस्लिम परिवार किसी हिंदू की प्रॉपर्टी न खरीद सकें या फिर बिना सरकारी हरी झंडी के कोई सौदा संभव न हो. इस कानून के जरिए सरकार 'सोशल इंजीनियरिंग' की कोशिश करेगी.
राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ता अभिमन्यु यदुवंशी कहते हैं, ‘‘यह संविधान के अनुच्छेद 300A- संपत्ति के अधिकार और अनुच्छेद-14 समानता के अधिकार के खिलाफ है. संविधान हर व्यक्ति को संपत्ति खरीदने और बेचने का अधिकार देता है. इसे कानून में बांधना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है. कुछ विशेष इलाकों में जिला कलेक्टर को संपत्ति खरीदने या बेचने पर छूट का अधिकार देने से लालफीताशाही बढ़ेगी.’’
कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा इस बिल को BJP की साजिश बताते हैं. उनक कहना है, ‘‘राजस्थान जैसे शांत प्रदेश को अशांत बनाने के लिए BJP असंवैधानिक कार्यों वाला 'गुजरात मॉडल' थोपने पर आमादा है. निजी संपत्तियों पर प्रशासन बैठाने के लिए यह काला कानून लाया जा रहा है. यह कौन तय करेगा कि कौन-सा इलाका अशांत है, किस आधार पर जनसंख्या चिह्नित की जाएगीॽ पहले मोहल्ला अशांत करेंगे, बाद में कस्बा व जिला और फिर पूरा लोकतंत्र अशांत घोषित करने की साजिश है. जिस क्षेत्र को 'अशांत क्षेत्र' घोषित किया जाएगा, वहां न निवेश आएगा, न विकास होगा, न सामाजिक सौहार्द बचेगा. ’’
कलेक्टर की अनुमति बिना जमीन बेचना हाेगा गैरजमानती अपराध
इस कानून में सरकार को यह अधिकार होगा कि वह दंगा और हिंसा प्रभावित क्षेत्रों को अशांत क्षेत्र का दर्जा दे सके. अशांत क्षेत्र घोषित होने के बाद कोई व्यक्ति बिना सरकार की अनुमति से संपत्ति की खरीद और बिक्री करेगा तो उसे गैर जमानती अपराध माना जाएगा. कानून का उल्लंघन करने पर पांच साल की जेल और दो लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान होगा.
किसी भी संपत्ति को बेचने या खरीदने के लिए प्रॉपर्टी के मालिक को जिला कलेक्टर कार्यालय में हलफनामा पेश करना होगा जिसमें यह बताना होगा कि वह अपनी मर्जी से संपत्ति बेच रहा है तथा इसके बदले उसे सही कीमत दी जा रही है.
कानून के तहत कलेक्टर को शक होने या सूचना झूठी पाए जाने पर सौदा निरस्त करने का भी अधिकार रहेगा. इसके साथ ही कलेक्टर को अगर यह लगता है कि संबंधित इलाके में जनसंख्या संतुलन बिगड़ रहा है. एक ही समुदाय के लोग ज्यादा बस रहे हैं अथवा ध्रुवीकरण के हालात हो गए हैं, तब भी संपत्ति बेचने पर रोक लगाई जा सकेगी.
इस कानून को लेकर एक आशंका ये भी है कि सुरक्षा और स्वतंत्रता के नाम पर खींची गई यह महीन रेखा अगर कानून के नाम पर लांघी गई तो उसका असर सिर्फ प्रॉपर्टी बाजार पर नहीं पूरे लोकतांत्रिक मूल्यों पर पड़ेगा. देखना ये भी है कि क्या यह कानून वाकई शांति और सुरक्षा का औजार बनेगा या फिर सामाजिक ताने-बाने में दरार की कोई नई कहानी पैदा करेगा.

