इस हफ्ते की शुरुआत में 22 अप्रैल को पूर्णिया के धमदाहा की जनसभा में जब तेजस्वी यादव ने कहा, “आप या तो बीमा भारती को वोट करें, अगर बीमा भारती को चुनना नहीं चाहते तो एनडीए को चुन लें. किसी और के धोखे में न आएं.” तो यह बात साफ हो गई कि तेजस्वी चाहते हैं कि भले पूर्णिया में राजद प्रत्याशी की जीत न हो, और जदयू प्रत्याशी संतोष कुशवाहा जीत जाएं, मगर निर्दलीय प्रत्याशी पप्पू यादव की जीत किसी सूरत में न हो.
हालांकि राजद नेता ने अपने भाषण में यह भी कहा, “यह एक व्यक्ति का चुनाव नहीं. इंडिया गठबंधन और एनडीए के बीच का चुनाव है.” मगर उनके पूरे भाषण के दौरान पप्पू यादव के समर्थक लगातार पप्पू यादव जिंदाबाद के नारे लगाते रहे. तेजस्वी ने यह बात भले ही अभी कही हो, लेकिन राजनीतिक जानकार इस बात को उसी दिन से समझने लगे थे जब राजद ने बिना कांग्रेस की राय लिए पूर्णिया से बीमा भारती के नाम की घोषणा कर दी थी.
जबकि पप्पू यादव पिछले साल सितंबर से ही पूर्णिया में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने ‘नमस्ते पूर्णिया’ अभियान चलाया, फिर अपनी जनाधिकार पार्टी का विलय कांग्रेस में कराया. खुद लालू और तेजस्वी से राबड़ी देवी के सरकारी आवास में जाकर मुलाकात की.
पूर्णिया में दूसरे चरण में 26 अप्रैल को वोट पड़ने हैं. इस बीच यह संवाददाता दो बार दो-दो दिन के लिए वहां की यात्रा कर चुका है. पप्पू यादव अपने समर्थकों के साथ वहां लगातार प्रचार अभियान चला रहे हैं. उनके समर्थक काफी आक्रामक तरीके से उनके पक्ष में बोलते नजर आते हैं. ऐसा लग रहा है कि पप्पू यादव ने राजद के कोर वोटर मुस्लिम और यादव पर काफी पकड़ बना ली है. मुसलमानों पर पूरी तरह और यादवों का भी बड़ा हिस्सा उनके साथ खड़ा और उनके पक्ष में बोलता नजर आ रहा है.
इनके अलावा गरीबों का एक बड़ा तबका जो अक्सर आपदा या बीमारी की हालत में पप्पू यादव से तत्काल राहत पाता रहा है, वह भी उनके साथ दिखता है. स्थानीय राजनीति के जानकार स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि मुकाबला जदयू के निवर्तमान सांसद संतोष कुशवाहा और पप्पू यादव के बीच ही है. हाल-हाल तक जदयू में रहीं बीमा भारती का प्रभाव उनके विधानसभा क्षेत्र रूपौली से बाहर बहुत कम है.
इस बीच तेजस्वी यादव खुद पूर्णिया में डटे हैं. वे बीमा भारती के नामांकन के वक्त भी पूर्णिया आए थे. तब से आज तक यहां पांच जनसभा कर चुके हैं. मंगलवार को उन्होंने बीमा भारती के पक्ष में रोड शो भी किया. 24 अप्रैल को भी दूसरे चरण के प्रचार अभियान के आखिरी दिन उनके पूर्णिया में ही रहने की संभावना जताई जा रही है.
तेजस्वी के साथ राजद के दो मुख्य रणनीतिकार, राज्यसभा सांसद प्रो. मनोज झा और संजय यादव भी पूर्णिया में हैं. इनके अलावा राजद के कई विधायक पूर्णिया में बीमा भारती का प्रचार कर रहे हैं. पूर्णिया में तेजस्वी और राजद नेताओं की अतिसक्रियता से जाहिर है कि राजद ने इस सीट को नाक का सवाल बना लिया है. कहा जा रहा है कि तेजस्वी चाहते हैं कि बीमा भारती भले हार जाएं मगर पप्पू यादव न जीतें.
लोगों को इस प्रकरण से 2019 का बेगूसराय का लोकसभा चुनाव याद आ रहा है. जब इसी तरह कन्हैया कुमार को हराने में तेजस्वी और राजद ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था. इसके बाद कन्हैया की बिहार में राजनीतिक सक्रियता कम होने लगी. इस बार भी कांग्रेस ने उन्हें बिहार के बदले दिल्ली से चुनावी मैदान में उतारा है, जबकि इस बार बेगूसराय से उनके जीतने की प्रबल संभावना जताई जा रही थी.
कन्हैया और पप्पू यादव को लेकर तेजस्वी, लालू और राजद की असुरक्षा की वजह यह मानी जाती है कि राजद नहीं चाहता कि विपक्षी धड़े में कोई ऐसा मजबूत नेता उभरे जो आने वाले समय में तेजस्वी के नेतृत्व को चुनौती दे सके. इसलिए राजद के लिए एनडीए को हराने से बड़ा काम 2019 में कन्हैया कुमार को हराना लगा, इस बार पार्टी पप्पू यादव को हराने में जुटी है.
तेजस्वी पप्पू यादव से कन्हैया कुमार से अधिक बड़ा खतरा महसूस करते हैं. क्योंकि एक तो वे उनके स्वजातीय हैं, जिन्होंने कोसी के इलाके में यादवों के वोट में सेंध लगा दी है. मुसलमान पूरी तरह उनके साथ हैं. दूसरा, पप्पू यादव राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय रहते हैं. किसी भी संकट के वक्त तत्काल पीड़ित परिवार तक पहुंच जाते हैं और उन्हें फौरी राहत पहुंचा देते हैं. उनकी टीम लोगों को बड़े सरकारी अस्पतालों में इलाज में मदद करती है. अगर वे निर्दलीय चुनाव जीत जाते हैं तो कांग्रेस उन्हें कभी खोना नहीं चाहेगी. पिछले तीन दशकों से कांग्रेस बिहार में राजद के भरोसे ही चुनाव लड़ती रही है. पार्टी में कोई ऐसा जमीनी पकड़ वाला नेता नहीं हुआ जो अपने दम पर पार्टी को आगे बढ़ा सके. मगर यह स्थिति राजद के लिए सुखकर नहीं होगी, वह किसी सूरत में कांग्रेस को आत्मनिर्भर होते देखना नहीं चाहेगी.
वैसे तेजस्वी और पप्पू यादव के बीच तब से अदावत रही है, जब से तेजस्वी बिहार की राजनीति में सक्रिय हुए थे. 2015 तक पप्पू यादव राजद के साथ ही थे, मगर तब जब लालू ने तेजस्वी को अपना उत्तराधिकारी बनाने के संकेत दिए तो पप्पू यादव ने कहा था, “पुत्र होने से कोई उत्तराधिकारी नहीं हो जाता है. मैं 1991 से लालू के साथ खड़ा हूं, उनका असली उत्तराधिकारी मैं हूं.”
इसके बाद लालू परिवार और पप्पू में दूरियां बढ़ने लगीं और पप्पू ने राजद छोड़कर अपनी अलग पार्टी, जनाधिकार पार्टी बना ली. हालांकि इस पार्टी को राजनीतिक सफलता नहीं मिली, मगर 2024 के लोकसभा चुनाव के वक्त अचानक वे महत्वपूर्ण हो गए. सितंबर 2023 से ‘नमस्ते पूर्णिया’ अभियान चलाने के बाद उन्होंने पूर्णिया में बड़ी रैली की, जिसके बाद राजनीतिक पार्टियों का ध्यान उनकी तरफ गया.
पप्पू कहते हैं, “लालू जी ने खुद मुझे मिलने बुलाया था. वे चाहते थे मैं अपनी पार्टी का विलय राजद में कर लूं और मधेपुरा या सुपौल में से कोई एक सीट ले लूं. मगर मैं पूर्णिया छोड़ना नहीं चाहता था. इस बीच कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी का फोन मेरे पास आ गया और मैंने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर दिया.”
हालांकि गठबंधन की मजबूरियों की वजह से कांग्रेस ने उन्हें पूर्णिया से टिकट नहीं दिया. पप्पू दोस्ताना संघर्ष में उतरना चाहते थे, कांग्रेस ने इसकी भी इजाजत नहीं दी. मगर तकनीकी तौर पर वे अभी-भी कांग्रेस के साथ हैं और कहते हैं कि मुझे कांग्रेस के बड़े नेताओं का आशीर्वाद मिला हुआ है. मगर कांग्रेस का कोई नेता यहां तक कि उनकी पत्नी रंजीत रंजन भी उनके प्रचार में पूर्णिया नहीं आई हैं. दूसरी तरफ तेजस्वी ने राहुल गांधी की भागलपुर की सभा में बीमा भारती को उनकी शुभकामनाएं दिलवा दी हैं.
मगर जानकार यह मानते हैं कि तमाम कोशिशों के बावजूद बीमा भारती अभी-भी लड़ाई से बाहर है. हां, यह जरूर कहा जा रहा है कि तेजस्वी राजद के कोर वोटर मुस्लिम और यादव को अपनी तरफ खींचकर पप्पू को कमजोर करना चाह रहे हैं. मगर कम से कम मुस्लिम मतदाताओं पर तेजस्वी की अपील का बहुत असर नहीं दिखता. पूर्णिया के मुस्लिम मतदाता मानते हैं कि अगर इस सीट पर कोई एनडीए को हरा सकता है तो वे पप्पू यादव ही हैं. राजद ने यहां से बीमा भारती को उतार कर एनडीए के खिलाफ लड़ाई को कमजोर किया है. 22 अप्रैल के तेजस्वी के बयान ने मुसलमानों को और मजबूती से पप्पू के पक्ष में कर दिया है.
तेजस्वी की अपील यादवों पर भी बहुत कारगर नहीं दिखती क्योंकि यादव अपने स्वजातीय उम्मीदवार को छोड़ कर गंगौता जाति की बीमा भारती को जिताने में अनिच्छुक हैं. हालांकि यादवों का एक धड़ा राजद के साथ जा सकता है.
आम तौर पर ऐसा माना जा रहा है कि बीमा भारती जितनी मजबूत होंगी, पप्पू उतने ही कमजोर होंगे. मगर कुछ जानकार इस थ्योरी को भी गलत मानते हैं. उनके मुताबिक बीमा भारती के वोटर वही हैं जो अब तक लोकसभा चुनाव में संतोष कुशवाहा को वोट करते रहे हैं. चाहे उनकी जाति गंगौत हो या फिर अति पिछड़ी जातियां. ऐसे में अगर रूपौली और आसपास के इलाके में बीमा भारती ज्यादा वोट बटोर लेती हैं तो नुकसान संतोष कुशवाहा का ही होगा. अब तक रूपौली और धमदाहा विधानसभा की बढ़त ही संतोष कुशवाहा को जीत दिलाती रही है.
एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर एनडीए और राजद दोनों को कड़ी चुनौती देना. उनका लड़ाई में बने रहना. उनको हराने के लिए एनडीए और राजद दोनों द्वारा पूरी ताकत झोंक देना भी पप्पू के लिए फायदेमंद साबित होता नजर आ रहा है. उनको लेकर आम मतदाताओं में सहानुभूति है. दो बार से सांसद रहे संतोष कुशवाहा से उकताए कुछ एनडीए समर्थक भी उन्हें वोट कर सकते हैं.
हालांकि उनकी दबंग राजनेता की पुरानी छवि उनके लिए अभी-भी बाधक है. पूर्णिया में मजबूत पकड़ रखने वाले मेडिकल प्रोफेशनल का समूह उनके खिलाफ है. व्यापारियों का समूह भी उनसे सशंकित है. अगर पप्पू हारते हैं तो उसकी बड़ी वजह इसी वर्ग की चिंताएं और उनकी दबंग वाली छवि होगी. 24 अप्रैल को पूर्णिया में प्रचार अभियान समाप्त हो रहा है. 26 तारीख को मतदान होंगे. तब तक तीनों धड़े जोर लगा रहे हैं.

