राजस्थान में सामाजिक संवेदनशीलता के ताने-बाने को छूने वाला लेकिन एक प्रगतिशील कानून सियासत की भेंट चढ़ गया है. सूबे की पूर्व अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में पारित हुआ ‘राजस्थान सम्मान और परंपरा के नाम पर वैवाहिक संबंधों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का प्रतिषेध विधेयक, 2019’ राज्यपाल ने छह साल और पांच माह बाद वापस लौटा दिया है.
5 अगस्त 2019 को तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में अंतर्जातीय विवाह, अंतरधार्मिक विवाह और सगोत्र विवाह का विरोध और प्रेम विवाह करने वालों की ऑनर किलिंग (थोथे सम्मान के नाम पर हत्या) करने वालों के खिलाफ यह कानून लाया गया था. इसमें ऑनर किलिंग साबित होने पर मृत्युदंड की सजा का प्रावधान किया गया था. उस वक्त विपक्ष में रही BJP ने इस कानून को सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों पर प्रहार बताते हुए इसका पुरजोर विरोध किया था. मौजूदा शिक्षा मंत्री और तत्कालीन BJP विधायक मदन दिलावर ने इस कानून में शामिल सगोत्र (एक ही रक्त संबंध) शब्द पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि कांग्रेस सरकार समाज को अंधकार में धकेल रही है. हालांकि, विधेयक पर बहस के दौरान तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री शांति धारीवाल ने यह हवाला दिया था कि उन्होंने सगोत्र शब्द हटाने के लिए प्रस्ताव पेश कर दिया है.
अब इस कानून की वापसी पर पूर्व संसदीय कार्यमंत्री शांति धारीवाल का कहना है, “समाज की संकीर्ण सोच को दूर करने के लिए यह कानून लाया गया था. राजस्थान में अंतरजातीय और अंतर धार्मिक प्रेम विवाहों पर खाप पंचायतों के बढ़ते दखल से निपटने के लिए यह कानून सक्षम था क्योंकि आईपीसी और सीआरपीसी की धाराएं ऐसे मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं थीं.”
राजस्थान विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार प्रदेश में 2015 से 2019 के बीच खाप पंचायतों के अवैध फरमानों के 71 और ऑनर किलिंग के 12 मामले सामने आए थे. इस दौरान 4 युवक और 8 युवतियों की हत्या प्रेम विवाह करने पर कर दी गई.
राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने 28 जनवरी को ‘राजस्थान सम्मान और परम्परा के नाम पर वैवाहिक संबंधों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का प्रतिषेध विधेयक, 2019’ को वापस लौटाते हुए हवाला दिया कि यह कानून भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की कुछ निरस्त धाराओं से संबंधित है. भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 103 सम्मान हत्या से निपटने के लिए पर्याप्त है. बीएनएस की धारा 103 में ऑनर किलिंग साबित होने पर मृत्युदंड और आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान है.
कानूनविद् मानते हैं कि भारतीय न्याय संहिता में ऑनर किलिंग के खिलाफ व्यापक प्रावधान हैं मगर राजस्थान में खाप पंचायतों की बढ़ते दखल को रोकने के लिए इस तरह के कानून की जरूरत थी. राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ता अभिमन्यु सिंह यदुवंशी कहते हैं, ''राजस्थान में खाप पंचायतें अंतरजातीय और अंतरधार्मिक प्रेम विवाहों पर मनमाने फरमान सुनाती रहती हैं. खाप पंचायतों द्वारा प्रेम विवाह करने वालों को समाज से बहिष्कृत करने, जुर्माना लगाने और मारपीट करने जैसे अपराध आम हैं.''
बहरहाल सरकार और विपक्ष जो भी तर्क दें मगर इस कानून की वापसी ने यह सवाल तो खड़ा कर ही दिया है कि क्या ‘सम्मान’ के नाम पर होने वाली हिंसा को सामान्य आपराधिक मामलों की तरह छोड़ दिया जाएगा?
क्या थे कानून के प्रावधान
राजस्थान सम्मान और परम्परा के नाम पर वैवाहिक संबंधों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप का प्रतिषेध विधेयक, 2019’ में सम्मान के नाम पर नव विवाहित दंपति या उनमें से किसी एक की हत्या करने पर मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान किया गया था. ऐसे मामलों में पांच लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान भी था.
सम्मान के नाम पर अंतरर्जातीय और अंतर धार्मिक प्रेम विवाह करने वालों को गंभीर रूप से घायल करने पर 10 साल के कठोर कारावास से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा और 3 लाख रुपए तक के जुर्माने से दंडित किए जाने का प्रावधान था. मामूली चोटों पर तीन से पांच साल का कारावास और दो लाख रुपए जुर्माने की व्यवस्था की गई.
इसमें अंतरजातीय और अंतर धार्मिक विवाह करने वालों के खिलाफ गैर कानूनी सभा, उनकी स्वतंत्रता को खतरे में डालना और आपराधिक धमकी को भी परिभाषित करते हुए इसे गैर जमानती अपराध की श्रेणी में शामिल किया गया.
जिला कलेक्टर और अतिरिक्त जिला कलेक्टर स्तर के अधिकारियों को प्रेम विवाह करने वालों के खिलाफ जाति और खाप पंचायतों की गैर कानूनी सभाओं पर रोक लगाने और उनके खिलाफ कार्रवाई का अधिकार दिया गया. गैर कानूनी सभा करने पर सभा में शामिल सदस्यों को छह महीने से पांच साल तक की कैद और 1 लाख रुपये तक के जुर्माने की सजा का प्रावधान किया गया.
राजस्थान के अलावा देश के किसी अन्य राज्य में ऑनर किलिंग के खिलाफ इस तरह का कानून नहीं है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 2024 में ऑनर किलिंग को रोकने के लिए कानूनी उपाय सुझाने के लिए एक आयोग का गठन किया था. कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने ऑनर किलिंग के खिलाफ कानून का प्रस्ताव रखा है मगर अभी इसका ड्राफ्ट भी तैयार नहीं हुआ है.

