
राजस्थान में गांव-ढाणी तक प्रशासन की पहुंच आसान बनाने और लोगों की समस्याओं का मौके पर समाधान करने के लिए रात्रि चौपाल व्यवस्था शुरू की गई थी. इसके तहत कलेक्टरों को एक-एक रात गांवों में रुकने का नियम था लेकिन ऐसा लगता है कि अफसरशाही की उदासीनता की भेंट चढ़ गई.
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और मुख्य सचिव वी. श्रीनिवास ने साफ निर्देश दिए थे कि हर जिला कलेक्टर को महीने में चार बार गांवों में रात्रि विश्राम कर चौपाल लगानी है. कलेक्टर ही नहीं, जिलों के प्रभारी सचिव यानी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी भी जनता के बीच जाकर उनकी समस्याएं सुनेंगे.
इन आदेशों की हकीकत यह है कि प्रदेश के 41 जिलों में से 23 कलेक्टर अब तक एक भी रात्रि चौपाल नहीं लगा पाए हैं, जबकि 18 कलेक्टरों ने सिर्फ एक-एक चौपाल कर औपचारिकता निभाई है. पूरे राजस्थान में सिर्फ तीन कलेक्टर ऐसे हैं, जिन्होंने दो-दो बार ग्राम चौपाल लगाई. एक महीने में कोई भी कलेक्टर चार चौपाल पूरी नहीं कर पाया. प्रभारी सचिव बनाए गए वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों ने तो गांव की तरफ रुख भी नहीं किया.
ऐसे में अब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने खुद मोर्चा संभाला है और वे रात्रि चौपालों में पहुंचकर सीधे जनता से संवाद कर रहे हैं. मुख्यमंत्री ने इसकी शुरुआत 6 मई को चित्तौड़गढ़ के बंबोरी गांव में रात्रि चौपाल से की, वहीं अगली रात मुख्यमंत्री सीकर जिले के जाजोद गांव पहुंचे. दोनों जगह मुख्यमंत्री ने ग्रामीणों की समस्याएं सुनीं और अधिकारियों को मौके पर ही उनके निराकरण के निर्देश दिए.
मुख्यमंत्री के गांव पहुंचते ही पूरा प्रशासन भी सक्रिय नजर आया. कलेक्टर और एसपी समेत तमाम आला अधिकारी मुख्यमंत्री के पहुंचने से कई घंटों पहले ही गांव में डेरा डालकर बैठ गए. सड़कें दुरुस्त होने लगीं, बिजली-पानी की व्यवस्थाएं सुधारी गईं और गांव अचानक मिनी सचिवालय में तब्दील हो गया. इस दौरान ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी रही कि अगर मुख्यमंत्री के आने पर एक रात में व्यवस्थाएं सुधर सकती हैं, तो आम दिनों में प्रशासन गांवों से इतना दूर क्यों रहता है?

मुख्यमंत्री ने जाजोद में सिर्फ चौपाल ही नहीं लगाई, बल्कि गांव में रात्रि विश्राम भी किया. उन्होंने ग्रामीणों से सहज अंदाज में बातचीत की, महिलाओं से संवाद किया और बच्चों को चॉकलेट बांटी. रात्रि चौपाल में स्कूल की बालिकाओं ने मुख्यमंत्री से विज्ञान संकाय खोलने का आग्रह किया और सुबह मुख्यमंत्री ने स्कूल पहुंचकर बालिकाओं के हाथ में विज्ञान संकाय खोले जाने का आदेश थमा दिया. मुख्यमंत्री सुबह मॉर्निंग वॉक के दौरान गांव की गलियों में निकले, चाय की दुकान पर रुके और आम लोगों से बातचीत की. मुख्यमंत्री ने इस दौरान गांव के एक व्यक्ति के यहां बाजरे की रोटी, खिचड़ी और केर-सांगरी जैसे पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद लिया. इस पूरे कार्यक्रम को सरकार के ग्राउंड कनेक्ट के तौर पर देखा जा रहा है.
दिलचस्प बात यह है कि जहां-जहां विधायकों और कलेक्टरों ने रात्रि चौपाल लगाई, वहां उसका असर साफ दिखाई दे रहा है. धौलपुर में कलेक्टर श्रीनिधि बीटी ने 28 शिकायतों का मौके पर समाधान कराया, वहीं अजमेर में कलेक्टर लोकबंधु ने नागोला गांव में 73 समस्याएं सुनीं. चित्तौड़गढ़ में पालोद चौपाल में 47 परिवाद आए, वहीं बाड़मेर में 17 शिकायतें मौके पर निपटाई गईं. दौसा, जयपुर, जैसलमेर और करौली समेत कई जिलों में भी ग्रामीणों को तत्काल राहत मिली. इससे साफ है कि यदि प्रशासन गांवों तक पहुंचे तो लोगों को फायदा मिल सकता है.
मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद प्रदेश में आधे से ज्यादा मंत्री और 20 से अधिक विधायक पिछले एक महीने में रात्रि चौपाल लगा चुके हैं. डिप्टी सीएम प्रेमचंद बैरवा ने दूदू में चौपाल की, वहीं दीया कुमारी ने राजसमंद जिले के राज्यावास गांव में रात्रि चौपाल लगाकर जन समस्याएं सुनीं. सत्ता ही नहीं, बल्कि संगठन की ओर से भी प्रदेश में रात्रि चौपालें लगाई जा रही हैं. BJP प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने 4 मई को जयपुर के बस्सी तहसील के दूधली गांव में रात में विश्राम कर जनता की समस्याएं सुनीं.
कई जगह मंत्रियों और विधायकों को रात्रि चौपालों में जनता की नाराजगी का भी सामना करना पड़ा, वहीं कई जगह आला अधिकारी चौपालों से नदारद रहे. सिरोही के राजपुरा में 7 मई को रात्रि चौपाल में पहुंचे ग्रामीण विकास व पंचायती राज राज्यमंत्री ओटाराम देवासी के खिलाफ ग्रामीणों ने नारेबाजी की. करौली जिले के मासलपुर में वरिष्ठ अधिकारी तो नहीं पहुंचे, वहीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, ग्राम विकास अधिकारी, पटवारी व बिजली विभाग के कर्मचारी आए और हस्ताक्षर कर वापस लौट गए. ग्रामीण समस्याएं सुनाने का इंतजार करते रह गए.
एक तरफ मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल सहयोगी रात की चौपालें लगा रहे हैं वहीं दूसरी ओर अधिकांश विधायक और अधिकारी इस व्यवस्था से दूरी बनाए हुए हैं. अब तक सिर्फ 20 विधायक ही रात्रि चौपाल लगा पाए हैं. ऐसे में सियासी और प्रशासनिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या BJP विधायकों और अफसरों ने सरकार के आदेशों को गंभीरता से नहीं लिया या फिर वे गांवों में जाकर जनता के बीच बैठने से बच रहे हैं?
देखा जाए तो रात्रि चौपाल का उद्देश्य सिर्फ शिकायत सुनना नहीं था, बल्कि प्रशासन और जनता के बीच बढ़ती दूरी को कम करना भी था. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा लगातार गांवों में जाकर अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाने के साथ ही यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि सरकार जनता के बीच है. ऐसे में अगर जिला प्रशासन ही इस पहल में दिलचस्पी नहीं दिखाए, तो पूरी व्यवस्था की गंभीरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है.

