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दिल्ली की हालिया विधानसभा इतिहास की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली असेंबली क्यों रही?

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की ताजा स्टडी से पता चलता है कि सातवीं दिल्ली विधानसभा में प्रोडक्टिविटी बहुत कम रही, सिर्फ 74 बैठकें हुईं और 14 विधेयक ही पारित हुए

सांकेतिक तस्वीर
दिल्ली विधानसभा की एक बैठक
अपडेटेड 22 जनवरी , 2025

दिल्ली में विधानसभा चुनावों का बिगुल जोर-शोर से बज रहा है. यहां 5 फरवरी को वोट डाले जाएंगे. लेकिन इन सब के बीच एक ऐसी स्टडी सामने आई है जो दिल्ली की हालिया विधानसभा के कामकाज से जुड़े प्रदर्शन की अच्छी तस्वीर पेश नहीं करती. निवर्तमान विधानसभा फरवरी 2020 से दिसंबर 2024 तक चली थी.

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की एक ताजा स्टडी बताती है कि दिल्ली की पिछली यानी सातवीं विधानसभा प्रोडक्टविटी और गवर्नेंस के मामले में अपने पिछले छह कार्यकालों की तुलना में सबसे बदतर साबित हुई है. साल 2020 से 2024 तक, इन करीब पांच सालों में सिर्फ 74 दिन ही बैठकें हुईं जो एक खराब रिकॉर्ड है.

यह अलग बात है कि दिल्ली की राजनीति में ये पांच साल राजनीतिक रूप से काफी व्यस्त रहे, लेकिन हकीकत यही है कि 74 बैठकें प्रदेश के विधायी इतिहास में बैठकों की सबसे कम संख्या थी. औसत निकालें तो हर साल करीब 15 दिन ही बैठकें हुईं. तिस पर भी सत्र अक्सर छोटे ही होते थे, और अक्सर ये बैठकें केवल एक या दो दिन तक ही चलती थीं. 

कई बार ऐसा भी हुआ कि सत्र को औपचारिक रूप से स्थगित किए बिना ही अवसान कर दिया गया. सत्र को हिस्सों में बांटा गया, जो विधायी गतिविधि में कटौती के पैटर्न को बताता है. यूं तो उपराज्यपाल को सत्र बुलाने और स्थगित करने का अधिकार है, लेकिन निजी बैठकों का समय-निर्धारण विधानसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आता है.

जहां तक सातवीं विधानसभा में विधेयकों को पास करने का सवाल है तो आपूर्ति या व्यय बिलों को छोड़कर महज 14 विधेयक ही पारित किए गए. हालांकि इनमें से किसी भी बिल को विस्तृत जांच के लिए किसी समिति के पास नहीं भेजा गया. 

इन 14 प्रमुख विधायी पहलों में विधायकों के वेतन और भत्ते को संशोधित करने के लिए पांच विधेयक शामिल थे, जो सभी विधायी कार्यों का एक तिहाई से अधिक हिस्सा था. इसके विपरीत शिक्षा, बिजली सुधार और पर्यटन जैसे अधिक अहम क्षेत्रों में एक-एक विधेयक ही सामने आए, जो अक्सर एक दिन के भीतर पारित कर दिए गए. 

हालांकि पिछले 12-13 सालों में विधेयकों की जांच के लिए कमिटी की गैरमौजूदगी देखने को मिली है. साल 2012 से शायद ही कोई बिल जांच के लिए कमिटी के पास गया है. यह प्रैक्टिस विधायी निगरानी और जवाबदेही पर सवालिया प्रश्न उठाता है. जांच की इस कमी के कारण अहम नीतिगत ब्योरे की जांच नहीं हो पाती, जिससे शासन की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर पड़ता है. 

प्रश्नकाल, जिसे कार्यकारी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक अहम तरीका माना जाता है, इन 74 बैठक दिनों में सिर्फ नौ दिन ही आयोजित किया गया. कई बार विधानसभा बैठकों के एलान की नोटिस महज सात दिनों पहले दी गई, जबकि प्रश्नों को प्रस्तुत करने के लिए 12 दिनों के लीड समय की जरूरत होती है. ऐसे में प्रश्न प्रस्तुत करने का नियम अव्यावहारिक-सा हो गया. दिल्ली विधानसभा के 219 सालाना औसत प्रश्न लोकसभा में सालाना पूछे जाने वाले 8,200 प्रश्नों की तुलना में बहुत कम हैं, जो विधायी पूछताछ प्रश्नों में चिंताजनक गिरावट का संकेत देता है. 

2021 में प्रश्नों के लिए बनी समिति ने एक प्रश्न के उत्तर की जांच की तो पता चला कि उत्तर गलत दिया गया था. इस तरह का मामला विशेषाधिकार के उल्लंघन के बराबर ही समझा जाता है. समिति ने सिफारिश की कि मामले को विशेषाधिकार समिति को भेजा जाना चाहिए. 2022 में, विधानसभा अध्यक्ष ने प्रश्नों के असंतोषजनक उत्तरों के मामले को विशेषाधिकार समिति को भेजा. वो मामला फिलहाल समिति के पास ही लंबित है. 

2024 में विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान अध्यक्ष ने देखा कि राजस्व, सेवा, भूमि और भवन और गृह जैसे विभाग प्रश्नों के उत्तर प्रस्तुत नहीं करते हैं, जिससे प्रश्नकाल बाधित होता है. इसके अलावा, बजट चर्चाओं में वार्षिक और मंत्रालय-विशिष्ट बहसें शामिल कर दी गईं, जिससे विचार-विमर्श के लिए निर्धारित दिन प्रति वर्ष औसतन दो दिनों तक कम हो गए. इस तरह, हर साल बजट के बहस पर केवल चार घंटे खर्च करने के साथ विधानसभा ने ठोस चीजों पर गति को प्राथमिकता दी, जिससे वित्तीय जवाबदेही के प्रति इसकी प्रतिबद्धता पर सवाल भी उठे. 

कैसा रहा कमिटी सिस्टम

दिल्ली विधानसभा की 33 समितियों, जिन्हें नीतियों और व्यय का गहन विश्लेषण करने के लिए डिजाइन किया गया था, उसने इस कार्यकाल के दौरान केवल 20 रिपोर्टें प्रस्तुत कीं. यह पिछली विधानसभा में 50 रिपोर्टों की तुलना में एक जबरदस्त गिरावट है. और तो और, किसी भी वित्तीय समिति ने रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की, और स्थायी समितियों ने पांच सालों में केवल तीन रिपोर्टें ही प्रस्तुत कीं. समिति की कार्यक्षमता का कमजोर होना संस्थागत जांच और संतुलन के बिगड़ने को और भी रेखांकित करता है. 

विधायकों के प्रदर्शन में गिरावट

विधायकों की मौजूदगी औसतन 79 फीसद रही, जिसमें महिला विधायकों ने पुरुष विधायकों की तुलना में 83 फीसद बेहतर प्रदर्शन किया. विधानसभा में 62 पुरुष और आठ महिला सदस्य थे. केवल आठ फीसद विधायकों ने 40 से अधिक बहसों में भाग लिया, जबकि 44 फीसद ने पूरे कार्यकाल में 10 से कम प्रश्न पूछे. यह प्रवृत्ति विधायी जिम्मेदारियों से व्यापक विरक्ति को दर्शाती है, खास कर आम आदमी पार्टी (आप) के विधायकों के बीच, जिन्होंने औसतन 11 प्रश्न पूछे जबकि बीजेपी के विधायकों ने प्रति विधायक 40 प्रश्न पूछे.

दोषपूर्ण विरासत

सातवीं दिल्ली विधानसभा का कार्यकाल पूर्णता की तुलना में तात्कालिकता को दर्शाते हैं. समिति के संदर्भों को दरकिनार करके, बहसों को छोटा करके और सत्रों को कम करके विधानसभा ने एक चिंताजनक मिसाल कायम की है. आठवीं विधानसभा के लिए चुनाव नजदीक आते ही मजबूत विधायी प्रक्रियाओं और जीवंत लोकतांत्रिक भागीदारी की जरूरत पहले कभी इतनी स्पष्ट नहीं हुई. दिल्ली के राजनीतिक इतिहास का यह अध्याय एक चेतावनी की कहानी के रूप में काम करता है कि जब शासन एक जिम्मेदारी के बजाय एक कर्मकांड बन जाता है तो क्या होता है.

दिल्ली विधानसभा से जुड़ी इंडिया टुडे की ये रिसर्च स्टोरी भी पढ़ें....

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