“नीतीश कुमार एक एसेट यानी संपत्ति हैं.” जून की 29 तारीख को बिहार के उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता सम्राट चौधरी ने एक वीडियो पोस्ट कर यह बात कही. सम्राट चौधरी ने कहा, “विपक्ष के नेता के रूप में भी मैंने उन्हें एक एसेट माना था और अब भी मैं ऐसा ही मानता हूं.”
उन्होंने जोर देकर कहा कि भाजपा ने नीतीश को मौजूदा सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार किया था, भले ही उनकी जनता दल (यूनाइटेड) के पास केवल 43 सीटें थीं. इसके बावजूद वे मुख्यमंत्री बने.
उपमुख्यमंत्री से ऐसी प्रशंसा की उम्मीद की जाती है. लेकिन, सम्राट चौधरी के बयान के बाद जो बात ध्यान खींचती है, वो यह कि बिहार में एक ऐसे भाजपा नेता जिनके पास राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के मुख्यमंत्री उम्मीदवार को तय करने का कोई वास्तविक अधिकार नहीं है, उन्होंने खुलकर नीतीश का समर्थन किया है.
दूसरी तरफ भाजपा के किसी वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता ने सार्वजनिक रूप से नीतीश को अगले कार्यकाल में मुख्यमंत्री पद के लिए समर्थन नहीं दिया है. साफ है कि नीतीश के नाम पर भाजपा में विरोधाभास देखने को मिल रहा है.
2020 के चुनाव में भाजपा 243 में से 74 सीटें हासिल करके दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन इसके बावजूद बिहार एकमात्र हिंदी पट्टी का राज्य है, जहां पार्टी ने कभी शासन नहीं किया है. आज, 78 विधायकों के साथ भाजपा राज्य में सबसे बड़ी पार्टी है. फिर भी पार्टी नीतीश के नेतृत्व में आगामी चुनावों की तैयारी कर रही है. नीतीश पर यह निरंतर निर्भरता राज्य में कठिन राजनीतिक और जातिय अंकगणित को दर्शाती है.
बिहार की राजनीति के कुशल रणनीतिकार है नीतीश कुमार
2005 से ही नीतीश कुमार बिहार की राजनीति की धुरी रहे हैं. वे बिहार की राजनीति में कुशल रणनीतिकार और स्थिरता लाने वाले नेता के तौर पर पहचान बना चुके हैं. अक्टूबर 2005 के विधानसभा चुनावों से शुरू होकर 2010, 2015 और 2020 में उनके नेतृत्व वाले गठबंधन को जीत हासिल होती दिखी है.
राष्ट्रीय चुनावों में भी नीतीश कुमार ने NDA के लिए जोरदार जनादेश दिया. 2009 में 40 में से 32 सीटें, 2019 में 39 और 2024 में 30 सीटें जीतकर NDA ने अपनी मजबूती दिखाई. नीतीश की एकमात्र गंभीर चुनावी असफलता 2014 के लोकसभा चुनावों में आई थी, जब JDU ने अपने दम पर चुनाव लड़ा था और सिर्फ दो सीटें जीती थीं.
तब भी पार्टी ने सम्मानजनक 16.04 फीसद वोट हासिल किए थे. 2020 में सिर्फ 43 विधानसभा सीटें जीतने के बावजूद, JDU का मुख्य मतदाता आधार काफी हद तक बरकरार रहा. यह स्थायी समर्थन इस बात को रेखांकित करता है कि कैसे नीतीश का टिकाऊ वोट-बैंक विपरीत परिस्थितियों में भी आसानी से नहीं खिसकता. भाजपा के लिए, यह उन्हें न सिर्फ एक विकल्प से ज्यादा बनाता है, बल्कि यह गठबंधन की ताकत को बढ़ाने वाला भी है.
भाजपा में सभी वर्गों के बीच लोकप्रिय नेता का अभाव
बिहार में भाजपा नेतृत्व संकट से जूझ रही है. उसके पास नीतीश की तरह सभी वर्गों के बीच लोकप्रिय कोई नेता नहीं है, जबकि JDU का प्रभाव हाल के वर्षों में कम हुआ है. 2020 में उसे केवल 15.39 फीसद वोट मिले और पांच निर्वाचन क्षेत्रों में जमानत भी नहीं मिली, लेकिन नीतीश का जमीनी नेटवर्क बरकरार है.
कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने के कारण वे महादलितों और अत्यंत पिछड़ी जातियों (EBC) में लोकप्रिय नेता बनकर उभरे हैं समाज के इन वर्गों में भाजपा अभी तक महत्वपूर्ण पैठ नहीं बना पाई है.
यही वजह है कि भाजपा को नीतीश के मुकाबले मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने में संघर्ष करना पड़ रहा है. पार्टी भले ही मजबूत कैडर और अच्छी तरह से संचालित चुनावी मशीनरी का दावा करती हो, लेकिन बिहार की राजनीति अभी भी व्यक्तित्वों पर निर्भर करती है. नीतीश जैसे आकर्षक नेता के बिना, NDA को प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों में बिखराव का खतरा है.
जातिगत अंकगणित में भी फिट बैठते हैं नीतीश
जाति आज भी बिहार की राजनीति की मुख्य धुरी बनी है. हालांकि, भाजपा ने EBC और महादलितों के बीच बढ़त हासिल की है, जिन्हें पारंपरिक रूप से इसके दायरे से बाहर माना जाता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि यह अभी भी JDU से पीछे है.
ये समूह नीतीश के चुनावी स्थायित्व का आधार हैं. कम वोट-शेयर के साथ भी ये समूह करीबी मुकाबलों में JDU का समर्थन कर उसे बढ़त दिला देती है.
जीतने के लिए NDA को इस वर्ग का वोट हासिल करना जरूरी है. पिछड़ी जातियों का समर्थन हासिल करने वाले किसी भरोसेमंद सहयोगी के बिना भाजपा को दर्जनों सीटों पर मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. नीतीश की उम्मीदवारी से इस वर्ग के बड़े हिस्सा का वोट बिना बंटे NDA को मिलता है.
यही वजह है कि नीतीश कुमार बिहार के अस्थिर राजनीतिक परिदृश्य में निरंतरता का प्रतिनिधित्व करते हैं. हालांकि पिछले कुछ सालों में जिस तरह उन्होंने अपना पाला बदला है. इससे उनकी इमेज अवसरवादी नेता की हो गई है.
2015 में भाजपा से अलग होकर वे महागठबंधन में शामिल हुए. 2017 में NDA में वापस लौटे, 2022 में एक बार फिर से महागठबंधन में शामिल होकर 2024 में वापस NDA में आ गए. इसकी वजह से भले ही कुछ लोग उन्हें अवसरवादी के रूप में पेश करते हों, लेकिन उन्होंने राज्य में प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखी है.
उनकी सरकार को शायद ही कभी आंतरिक असंतोष का सामना करना पड़ा हो. उन्होंने गठबंधन की राजनीति को अचूक सहजता के साथ संभाला है.
भाजपा, जो दूसरे राज्यों में नए मुख्यमंत्रियों के साथ प्रयोग करने के लिए जानी जाती है. उस भाजपा के लिए भी बिहार में नीतीश की जगह किसी ऐसे व्यक्ति को लाना अनावश्यक जोखिम भरा है, जिसे मुख्यमंत्री पद के लिए आजमाया नहीं गया हो.
इन्हीं वजहों से NDA के सहयोगी दल JDU के लिए मुख्यमंत्री का पद अब भी एक तरह से रिजर्व है. बिहार में कड़े चुनावी गणित को देखते हुए लगता है कि यहां मुट्ठी भर सीटें सरकार के गठन में अहम भूमिका निभा सकती है. ऐसे में भाजपा किसी भी कामचलाऊ फॉर्मूले से नेतृत्व बदलने के लिए अनिच्छुक हो सकती है, कम से कम चुनाव परिणाम आने तक.
विपक्ष के खिलाफ एक फायरवॉल हैं नीतीश
तेजस्वी यादव की राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का यादव और मुस्लिम मतदाता समूह पर मजबूत पकड़ है. बिहार में इन मतदाता समूहों की संख्या कुल मतदाताओं की संख्या का करीब 30 फीसद है. 2020 में RJD 75 सीटों के साथ राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन सहयोगी दलों के खराब प्रदर्शन के कारण सरकार बनाने में विफल रही.
पिछले कुछ चुनावों से ऐसा देखने को मिल रहा है कि नीतीश की पार्टी गैर-यादव OBC और EBC के बीच राजद की पैठ को कमजोर कर रही है. यही वजह है कि नीतीश कुमार की JDU विपक्षी एकजुटता के खिलाफ एक मजबूत दीवार बन गई है.
NDA समीकरण से नीतीश को हटा दें, तो वह फायरवॉल गायब हो जाएगा. नीतीश के NDA छोड़ते ही इस समूह के मतदाता राजद की ओर जा सकते हैं या पूरी तरह से अनुपस्थित हो सकते हैं.
इस तरह भाजपा के लिए नीतीश कुमार न केवल एक चुनावी साथी हैं, बल्कि महागठबंधन के संभावित उदय के खिलाफ एक मजबूत ताकत भी हैं. राष्ट्रीय स्तर पर नीतीश कुमार के साथ भाजपा का गठबंधन एक व्यापक और समावेशी छवि पेश करने में मदद करता है.
BJP और JDU के गठबंधन से वो धारणाएं भी कमजोर होती है कि भाजपा सिर्फ उच्च वर्गों की पार्टी है. बिहार जैसे राज्य जहां धारणाएं सरकार के काम-काज से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है, वहां यह गठबंधन चुनावी लिहाज से मूल्यवान लगती है.
भाजपा के लिए क्यों अपवाद है बिहार?
बिहार में कभी भी कोई भाजपा नेता मुख्यमंत्री नहीं रहा है. 2005 से अब तक जीतनराम मांझी के 2014-15 में थोड़े समय के कार्यकाल को छोड़ दें तो इस पद पर नीतीश का एकाधिकार रहा है.
विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही भाजपा खुद को अपनी बढ़ती सांगठनिक ताकत और नीतीश पर अपरिहार्य निर्भरता के बीच फंसी हुई पाती है. इसके नेताओं की नई पीढ़ी में अभी तक कोई भी नेता ऐसा नहीं है जो जातिगत गणित, प्रशासनिक ट्रैक रिकॉर्ड और बिहार के सभी वर्गों में स्वीकार्य हों.
भाजपा भले ही राष्ट्रीय राजनीति पर हावी हो, लेकिन बिहार में सत्ता के लिए सूत्र अभी भी नीतीश के पास ही है. जब तक भाजपा अपने उत्तराधिकारी को नहीं चुन लेती जो उनके करिश्मे और जाति-भेद से परे पहुंच वाला हो, तब तक उसके पास राज्य भर में 'साहेब' के नाम से मशहूर व्यक्ति से बंधे रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.

