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मनरेगा (वीबी जी राम जी) योजना का विचार देने वाले राजस्थान में कैसे बिगड़े इसके हाल?

राजस्थान में साल 2021-22 के दौरान 100 दिन पूरे करने वाले मजदूरों की संख्या करीब 10 लाख थी जो अब घटकर सिर्फ 94 हजार रह गई है

संसद में पेश किया जा सकता है नया बिल
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 28 जनवरी , 2026

मनरेगा अपने नए नाम – वीबी जी राम जी- की वजह से बीते दिनों काफी चर्चा में रही लेकिन इस दौरान इसका मूल विचार देने वाले राजस्थान में योजना की हालत पर ज्यादा कुछ नहीं कहा गया. जबकि इस प्रदेश में पिछले 20 साल से गांव-गरीब की रोज़ी का मजबूत सहारा रही यह योजना अब पहचान तलाशती नजर आ रही है. बीते पांच साल में इस योजना के तहत न सिर्फ औसत कार्य दिवस घटे हैं बल्कि 100 दिन का वैधानिक रोजगार भी कागज़ों तक सिमट गया है.

देश में सबसे पहले राजस्थान से ही मनरेगा योजना के ऐतिहासिक विचार ने जन्म लिया था. राजस्थान में अरुणा रॉय और शंकर सिंह के नेतृत्व में मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) ने सबसे पहले रोजगार का कानूनी हक दिए जाने की आवाज उठाई थी. MKSS ने ही सबसे पहले यह सवाल उठाया था कि सरकार से काम मांगना क्यों जरूरी है और रोजगार भी एक कानूनी हक हो सकता है. यही आवाज आगे चलकर देशव्यापी आंदोलन बनी और केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार को 2 फरवरी 2006 को देश के 200 सबसे पिछड़े जिलों में इस योजना की शुरूआत करनी पड़ी.

शुरुआत में राजस्थान के आदिवासी बहुल बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर सिरोही, झालावाड़ और करौली जिलों को इसमें शामिल किया गया. फिर 1 अप्रैल 2008 से इसे देश के सभी जिलों में लागू कर दिया गया. 2 अक्टूबर 2009 को इस योजना का नाम राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की जगह महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम कर दिया गया.

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के ताजा आंकड़ों पर नजर डालें तो राजस्थान में 'बीवी जी राम जी' योजना के बजट, 100 दिन रोजगार और कार्य पूर्ण होने जैसे कामों में भारी गिरावट आई है. साल 2025 में राजस्थान के 33 में से सिर्फ दो जिले ऐसे थे जहां इस योजना के तहत 25 फीसदी से ज्यादा कार्य पूर्ण हुए. 15 जिलों में तो 10 फीसदी भी कार्य पूर्ण नहीं हुए. इनमें जयपुर, झुंझुनूं, बूंदी, चित्तौड़गढ, अलवर, करौली, पाली, राजसमंद, कोटा, हनुमानगढ़, धौलपुर, दौसा, सवाई माधोपुर, सिरोही और टोंक जिलों का नाम शुमार है.

साल 2021-22 में इस योजना के तहत हर परिवार को साल में औसत 60 दिन का कार्य मिल रहा था जो अब घटकर 39 दिन रह गया है. इसी तरह साल 2021-22 में 100 दिन पूरे करने वाले मजदूरों की संख्या करीब 10 लाख थी जो अब घटकर सिर्फ 94 हजार रह गई है. प्रदेश के 9 जिले तो ऐसे हैं जहां एक हजार परिवारों को भी 100 दिन का रोजगार नहीं मिल पाया.

इन वर्षों में कार्य दिवस और रोजगार के अवसर ही नहीं घटे हैं बल्कि बजट में भी भारी कटौती हुई है. 2021 में इस योजना के तहत राजस्थान को केंद्र से 9800 करोड़ रुपए की राशि दी जा रही थी जो अब घटकर 5200 करोड़ रह गई है.

मनरेगा की जगह 'वीबी जी राम जी' नाम और इसमें संशोधन किए जाने के बाद केंद्र की ओर से मिलने वाली राशि में अब ओर कटौती होगी क्योंकि पहले इस योजना में केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी 90:10 थी जो अब 60:40 कर दी गई है.

राजस्थान में इस योजना के तहत भुगतान में देरी भी अब परिपाटी बन चुकी है. कानून के अनुसार इस योजना में काम करने वाले हर मजदूर को 15 दिन के भीतर मजदूरी का भुगतान मिलना चाहिए मगर राजस्थान में भुगतान में 90 दिन से ज्यादा देरी के ही 15 हजार से ज्यादा मामले हैं. 16 से 30 दिन की देरी के 84 हजार और 15 दिन की देरी के 2 लाख 65 हजार मामले लंबित चल रहे हैं. 15 दिन में काम का भुगतान नहीं होने पर जुर्माने का भी प्रावधान है मगर राजस्थान में भुगतान में देरी के लिए जिम्मेदारी किसी भी सरकारी अधिकारी पर जुर्माना नहीं लगाया गया है.

इस योजना की वर्तमान हालत पर MKSS के प्रतिनिधि शंकर सिंह कहते हैं, ''मनरेगा सिर्फ एक सरकारी स्कीम नहीं है, बल्कि गांव, गरीब और श्रमिक के आर्थिक सशक्तिकरण और सम्मान की पहचान है. अब सरकार इस योजना को खत्म करने तुली है. बजट में केंद्रीय हिस्सेदारी कम होने से मजदूरी के कार्य दिवस और 100 दिन रोजगार के अवसर और ज्यादा घटने की आशंका है.''

राजस्थान रोजगार अभियान से जुड़े मुकेश गोस्वामी का कहना है - मनरेगा के कारण गांवों की तस्वीर बदली है. खेतों में मेड़बंदी हुई, तालाब खुदे, चेकडैम बने और सबसे बड़ी बात- गरीब के हाथ में काम और मजदूरी आई. पलायन पर ब्रेक लगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी का संचार हुआ. 100 दिन के रोजगार का वादा सिर्फ कानून में नहीं, ज़मीन पर भी नज़र आने लगा. 

राजस्थान में इस योजना के तहत कुल 1 करोड़ 19 लाख जॉब कार्ड वितरित हुए हैं जिनमें से 81 लाख 28 हजार जॉब कार्ड एक्टिव हैं. सूबे में एक करोड़ एक्टिव वर्कर हैं जिनमें से 20 फीसद अनुसूचित जाति और 22 फीसद अनुसूचित जनजाति वर्ग के हैं.

अब केंद्र सरकार ने मनरेगा को नए नाम और नई पैकेजिंग के साथ पेश किया है, लेकिन सवाल जस का तस है कि राजस्थान, जिसने देश को रोजगार का रास्ता दिखाया, वहां यह योजना आज अपनी पहचान बचाने की जंग क्यों लड़ती नज़र आ रही हैॽ क्या नाम बदलने से राजस्थान के हिस्से का रोजगार और बजट लौट आएगा? 

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