scorecardresearch

केरल में ढहा वामपंथ का आखिरी किला: LDF की करारी हार और UDF के उदय की बड़ी वजहें

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने अपनी करीबियों पर आंख मूंदकर भरोसा किया और बागियों की ताकत को कम करके जिसका नतीजा उन्हें सत्ता गंवाकर भुगतना पड़ा

Kerala CM Pinarayi Vijayan casts vote in Kannur.
मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन अपना वोट डालने के बाद (फाइल फोटो)
अपडेटेड 4 मई , 2026

मोदी सरकार के दौरान वामपंथियों ने केरल के रूप में अपना इकलौता ठिकाना खो दिया. इसका हश्र भी पश्चिम बंगाल जैसा ही रहा. निवर्तमान मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने विधानसभा चुनाव में लगातार तीसरी जीत का सपना देखा था. लेकिन मतदाता उनके और उनकी इस सोच के खिलाफ थे.

कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के खिलाफ भारी अंतर से विधानसभा चुनाव हारना लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) के लिए चौंकाने वाला है. यही नहीं, चुनाव में इसके कई लाल किले ढह गए हैं. यह दिखाता है कि पार्टी कार्यकर्ताओं तक ने माकपा (CPIM) के खिलाफ वोट दिया.

अधिकांश मंत्रियों की हार सरकार के खिलाफ लहर की ओर इशारा करती है. स्वास्थ्य मंत्री वीणा जॉर्ज, देवस्वोम मंत्री वी.एन. वासावन, उद्योग मंत्री पी. राजीव, स्थानीय स्वशासन मंत्री एम.बी. राजेश, उच्च शिक्षा मंत्री आर. बिंदू, अनुसूचित जाति-जनजाति मंत्री ओ.आर. केलू, बंदरगाह मंत्री कदनपल्ली रामचंद्रन, केरल कांग्रेस के मंत्री रोशी ऑगस्टीन, खेल मंत्री वी. अब्दुल रहमान, संग्रहालय मंत्री कदनपल्ली रामचंद्रन, वन मंत्री ए.के. ससींद्रन और परिवहन मंत्री के.बी. गणेश कुमार चुनाव में हार गए. वहीं मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन भी कई राउंड की काउंटिंग में पीछे ही चल रहे थे और अपनी सीट धर्मदम में बमुश्किल 10,000 वोटों से जीत पाए.

यह केरल में वामपंथियों के लिए एक बड़ा झटका है, जिन्होंने 140 सदस्यीय विधानसभा में 76 सीटें हासिल कर लगातार तीसरी जीत का सपना देखा था. कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF ने वायनाड, एर्नाकुलम, पतनमतिट्टा और मलप्पुरम जिलों की सभी सीटें जीतकर LDF का सूपड़ा साफ कर दिया. यह नतीजा कांग्रेस और UDF के पक्ष में अल्पसंख्यकों के ध्रुवीकरण को दिखाता है. वहीं वामपंथियों को अपने मजबूत गढ़ों में अपने ही कैडर के वोट नहीं मिल पाए.

केरल सरकार के एक सीनियर ब्यूरोक्रेट ने इंडिया टुडे को बताया, "पिनाराई विजयन ने तब बड़ी भूल की जब उन्होंने चुनाव से पहले मतदाताओं को हल्के में लिया. उन्हें राजनीति से दूर रहने वाले करीबियों के एक समूह ने गुमराह किया. उन्होंने उनसे कहा कि उनका हर फैसला सही है और केरल उन्हें ही वोट देने जा रहा है. पिनाराई की इस गिरावट के लिए उनके वे करीबी ही जिम्मेदार हैं."

जब पिनाराई अपने घरेलू मैदान और कम्युनिस्ट किले में संघर्ष कर रहे थे, तब माकपा के बागियों ने जीत दर्ज की. इनमें अंबालापुझा से पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता जी. सुधाकरन, तलिपरम्बा से वरिष्ठ नेता टी.के. गोविंदम और पय्यानूर से वी. कुन्हीकृष्णन शामिल हैं.

केरल में बागियों की जीत माकपा के लिए एक बड़ा झटका है क्योंकि पार्टी नेतृत्व ने कैडरों के बीच उनकी पकड़ को कम करके आंका था.

राजनीतिक विश्लेषक ए. जयशंकर ने पहले ही इस चुनाव में LDF की हार की भविष्यवाणी की थी. ताजा रुझानों के बाद वे कहते हैं, "पिनाराई ने अपनी दूसरी पारी के दौरान जो करीबी तंत्र विकसित किया, उसकी भारी कीमत माकपा को चुकानी पड़ी. महिलाओं और नए मतदाताओं ने उन्हें लोकतंत्र के लिए खतरा माना. उन्होंने टीम की अनदेखी करते हुए राजनीति में अकेले खेल खेला. उनके मंत्री पूरी तरह से अनजान और अक्षम थे. अब 81 वर्ष की आयु में उनके पास सुधार करने का समय नहीं है. अब वे बस इतना चाहते हैं कि उनके दामाद मोहम्मद रियास भविष्य के लिए राजनीतिक ढांचे में फिट हो जाएं."

युद्ध हारने से ज्यादा माकपा को इस बात का पछतावा होगा कि BJP ने कोल्लम जिले के नेमम और चाथन्नूर में अपना खाता खोल लिया है. BJP के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर और बी.बी. गोपकुमार ने क्रमशः नेमम और चाथन्नूर में अच्छे अंतर से जीत हासिल की. ये दो सीटें केरल में पार्टी की राजनीतिक तकदीर बदलने वाली हैं. माकपा के गढ़ रहे कन्नूर और कोझिकोड में पार्टी ने सबसे अधिक वोटों की गिरावट देखी.

इस बीच, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की उम्मीदवार फातिमा तहलिया ने LDF संयोजक टी.पी. रामकृष्णन को सात हजार से अधिक मतों से हरा दिया. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा है, "संदेश साफ है. केरल UDF को वोट देने का इंतजार कर रहा था. पूरे केरल में सत्ता विरोधी लहर ने UDF को मेगा जीत दिलाई. हम एक जिम्मेदार सरकार बनाएंगे और भविष्य में स्वच्छ शासन प्रदान करेंगे."

यह बड़ी जीत दिखाती है कि माकपा की मशीनरी केरल के लोगों की राजनीतिक नब्ज समझने में विफल रही. वह केवल पिनाराई के करिश्मे और संकट के समय में पार्टी को बचाने की उनकी शक्ति पर ही निर्भर रही. कांग्रेस उम्मीदवारों में नीलांबुर से आर्यदन शौकत और पुथुपल्ली में चांडी ओम्मन ने 50,000 से अधिक वोटों से जीत दर्ज की.

केरल का अपना एक अनोखा राजनीतिक डीएनए है. 2026 के नतीजों ने वामपंथियों को निराश किया है क्योंकि उन्होंने मोदी के दौर में अपना अकेला गढ़ भी गंवा दिया.

Advertisement
Advertisement