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यूपी में बीजेपी के लिए केशव प्रसाद मौर्य क्यों हो गए हैं जरूरी?

पिछले कुछ दिनों से अमित शाह, राजनाथ सिंह और यूपी की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल से मुलाकात के बाद उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का नाम यूपी बीजेपी अध्यक्ष की दौड़ में सबसे आगे दिख रहा है

Keshav prashad maurya meeting with Amit shah on 8th july 2025
उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री ने 8 जुलाई 2025 को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की थी
अपडेटेड 11 जुलाई , 2025

आठ जुलाई की सुबह आए एक फोन कॉल के बाद यूपी के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य दिल्ली के लिए उड़ान भरने की तैयारी करने लगे थे. दि‍ल्ली में वे सीधे बीजेपी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के आवास पहुंचे. 

मुलाकात के फौरन बाद केशव प्रसाद मौर्य ने अमित शाह को भारतीय राजनीति का चाणक्य बताते हुए मुलाकात की फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट की. उप मुख्यमंत्री ने एक्स पर लिखा, ''भारतीय राजनीति के चाणक्य एवं हम जैसे लाखों कार्यकर्ताओं के प्रेरणास्रोत व मार्गदर्शक, देश के गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह से शिष्टाचार भेंटकर 2027 में उत्तर प्रदेश में 2017 दोहराने एवं तीसरी बार बीजेपी सरकार बनाने सहित विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा कर मार्गदर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.''  

अगले दिन केशव केंद्रीय रक्षा मंत्री और लखनऊ से सांसद राजनाथ सिंह से भी मिले. इसके बाद 11 जुलाई को लखनऊ में राज्यपाल आनंदी बेन पटेल से उप मुख्यमंत्री की मुलाकात ने यूपी बीजेपी में चल रही अटकलबाजियों को एक सिरा पकड़ाते देखा. माना जा रहा है कि केशव प्रसाद मौर्य को यूपी बीजेपी संगठन में बड़ी भूमिका मिल सकती है. 

असल में समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के आक्रामक पीडीए नैरेटिव का मुकाबला करने में अभी तक बीजेपी कमजोर ही साबित हो रही है. ऐसे में पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व यूपी में ओबीसी चेहरे को आगे करके विपक्षी दलों की रणनीति का जोरदार काउंटर करना चाहता है. 
वैसे तो 2022 के विधानसभा चुनाव में यूपी बीजेपी के अध्यक्ष रहे स्वतंत्र देव सिंह के नाम पर भी केंद्रीय नेतृत्व ने चर्चा की लेकिन विपक्ष के आक्रामक संविधान बचाओ और पीडीए नैरेटिव का मुकाबला उतने ही आक्रामक ढंग से करने के लिए बीजेपी को यूपी में ऐसा ओबीसी नेता चाहिए जो हिंदुत्व के साथ ओबीसी को बांधे रखने में सक्षम हो. केशव प्रसाद मौर्य इसमें पूरी तरह से फि‍ट बैठ रहे हैं. 

वे लगातार सपा पर हमलावर हैं. 8 जुलाई को उन्होंने सपा प्रमुख अखिलेश यादव के कांवड़ यात्रा पर आरोपों के जवाब में कहा, “आपका ड्रामा अब नहीं चलेगा” और बीजेपी कांवड़ यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित कर रही है. सोशल मीडिया प्लेटफार्म “एक्स” पर मौर्य ने विपक्षी इंडिया गठबंधन पर विदेशी वोटरों को फर्जी नाम से रजिस्टर करने का आरोप लगाया और 2027 में बीजेपी की जीत की बात कही. इसी बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चुनाव के लिए फर्जी डिग्री का आरोप लगाने वाली याचिका को सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया, जिससे मौर्य की छवि को एक राहत मिली. ऐसे में अब मौर्य की यूपी बीजेपी के शीर्ष पद पर ताजपोशी की सभी अड़चनें भी दूर हो चुकी हैं.   

लोकसभा चुनाव के दौरान यूपी में “इंडिया” गठबंधन के घटक दलों कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) ने जिस तरह से आरक्षण और संविधान के मुद्दे पर सफलतापूर्वक सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को घेरा उससे भगवा दल की कमजारी स्पष्ट नजर आ गई. इसी का फायदा विपक्षी दलों को मिला और “इंडिया” गठबंधन अप्रत्याशित रूप से यूपी की 80 में से 43 लोकसभा सीटें जीतने में सफल रहा. वहीं बीजेपी केवल 33 सीटों पर ही सिमट गई. 

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में बीजेपी को पिछड़े वोट बैंक में सेंध का सामना करना पड़ा था. खासकर यादव के अलावा नॉन-यादव ओबीसी- जैसे मौर्य, कुशवाहा, निषाद, कश्यप — अब पहले की तरह पूरी तरह बीजेपी के साथ नहीं दिखे थे. केशव प्रसाद मौर्य, मौर्य समुदाय के सबसे बड़े चेहरे हैं, और पूरे यूपी में उनकी पहचान एक पिछड़े नेता के रूप में है. पार्टी उन्हें फ्रंट पर लाकर इस वर्ग में पुनः भरोसा कायम करना चाहती है. 

लखनऊ में अवध कालेज की प्राचार्य और राजनीति शास्त्र विभाग की प्रोफेसर बीना राय बताती हैं, “लोकसभा चुनाव के दौरान और उसके बाद‍ जिस तरह से विपक्षी दल आरक्षण के मुद्दे पर आक्रामक है उसका काउंटर करने में भगवा दल के पास सक्षम पिछड़े नेताओं की कतार नहीं दिख रही. इसी शून्यता को भरने की कोशिश केशव प्रसाद मौर्य कर रहे हैं. बीजेपी में रहकर उन्होंने जिस तरह से जातीय जनगणना की मांग की उससे उन्होंने खुद को यूपी में बीजेपी के सबसे बड़े ओबीसी चेहरे के रूप में स्थापित रखा. जातीय जनगणना करने की घोषणा से केंशव प्रसाद मौर्य ओबीसी समुदाय के बीच मजबूत ही हुए हैं.”

पिछड़े वोटबैंक से ताल्लुक रखने वाली बीजेपी की सहयोगी पार्टियों के नेताओं को भी केशव प्रसाद मौर्य ने अपने साथ जोड़ रखा है. लखनऊ में अपने “कैंप कार्यालय” में केशव मौर्य लगातार विधायकों और प्रमुख नेताओं की मेजबानी कर रहे हैं. पार्टी के हर मंच पर “संगठन सरकार से बड़ा होता है.” का जोरदार उद्घोष करके केशव प्रसाद मोर्य ने पार्टी संगठन के नेताओं के बीच भी अपने को लोकप्रिय बनाए रखा है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी लंबे समय से ब्राह्मण-ठाकुर वर्चस्व के आरोपों से घिरी रही है, खासकर यूपी में. केशव को यूपी में संगठन की कमान सौंपकर बीजेपी यह दिखाना चाहती है कि वह सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए गंभीर है. 

बीना राय के मुताबिक, “केशव मौर्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से निकले नेता हैं, जो पार्टी के निचले ढांचे को अच्छी तरह जानते हैं. उन्होंने 2016-17 में यूपी में बीजेपी को सत्ता में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. तब वे प्रदेश अध्यक्ष थे. यह पृष्ठभूमि उन्हें आज भी संगठन के लिए एक जरूरी चेहरा बनाती है.” उधर सपा अब सिर्फ यादवों की पार्टी नहीं रहना चाहती — वह मौर्य, कुशवाहा, पटेल, पासी आदि जातियों को भी साध रही है. ऐसे में बीजेपी को इन जातियों का जवाब उन्हीं की जाति से आने वाले मजबूत नेताओं के ज़रिए देना होगा — केशव मौर्य इसका फ्रंटलाइन चेहरा बन सकते हैं.

क्या है केशव मौर्य की पृष्ठभूमि

केशव प्रसाद मौर्य का जन्म इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में शामिल रहे कौशांबी (अब अलग जिला) सिराथु तहसील के सिराथु गांव (वर्तमान में नगर पंचायत) में 7 मई 1969 को हुआ था. इनके पिता छोटे किसान थे. तीन भाई और तीन बहनों में केशव का नंबर तीसरा हैं. इनमें परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी ऐसे में केशव ने अपने पिता के साथ मजदूरी, चाय बेचने के अलावा कई ऐसे छोटे-छोटे काम किए जिसका एक गरीब परिवार से वास्ता रहता है. शुरुआती शिक्षा गांव के ही प्राइमरी विद्यालय में हुई. इसके पास के ही जूनियर हाइस्कूल से शि‍क्षा ग्रहण की. इसी दौरान वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आकर स्वयंसेवक बने. 

केशव प्रसाद आगे की पढ़ाई के लिए वर्ष 1989 में प्रयागराज आ गए. इस दौरान वे विश्व हिंदू परिषद में पूर्वी उत्तर प्रदेश के संगठन मंत्री ठाकुर गुरजन सिंह और विश्व हिंदू परिषद के महामंत्री अशोक सिंघल के संपर्क में आए. केशव को विश्व हिंदू परिषद के पूर्णकालिक कार्यकर्ता के नाते प्रयागराज के यमुनापार इलाके के संगठन मंत्री की जिम्मेदारी मिली. इस वक्त तक रामजन्मभूमि आंदोलन गति पकड़ चुका था और इसमें केशव प्रसाद मौर्य भी सक्रियता से शामिल हुए. संगठन का कार्य करते रहने के साथ केशव ने वर्ष 1993 हिंदी साहित्य सम्मेलन से साहित्य रत्न की उपाधि‍ ली. अयोध्या में विवादित ढांचा ध्वंस के बाद वे विश्व हिंदू परिषद के गोरक्षा अभि‍यान के हिस्सा बने. विश्व हिंदू परिषद में विभाग और संभाग का काम देखने के बाद यह संगठन मंत्री के तौर पर दिल्ली पहुंचे. इसके बाद लंबे समय तक अयोध्या में प्रांत संगठन मंत्री के तौर पर काम किया. साल 2002 में कुछ पारिवारिक वजहों से यह अपने घर लौट आए. 

इसके बाद 2004 में इलाहाबाद में शहर पश्च‍िमी विधानसभा सीट पर बीजेपी प्रत्याशी के रूप में उपचुनाव लड़ा. यह उपचुनाव माफि‍या अतीक अहमद के सांसद बनने के बाद खाली हुई सीट पर हो रहा था. इस सीट पर अतीक का भाई चुनाव लड़ रहा था जो तत्कालीन बसपा विधायक राजूपाल हत्याकांड में मुख्य अभि‍युक्त था. 2007 के विधानसभा चुनाव में भी केशव ने चुनाव लड़ा था लेकिन सफलता नहीं मिली. इसके बाद 2012 में केशव को सिराथु विधानसभा सीट से बीजेपी ने प्रत्याशी बनाया. यह इनके राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन चुनौती थी क्यों‍कि सि‍राथु सीट कभी भी बीजेपी ने नहीं जीती थी. तब केशव प्रसाद ने विधानसभा चुनाव में सि‍राथु में पहली बार भगवा झंडा फहरा दिया. 

इसके दो साल बाद फूलपुर लोकसभा सीट से बीजेपी प्रत्याशी के रूप में उन्होंने जीत दर्ज की. बीजेपी ने जब 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज की सबसे बड़ी चुनौती सपा के पिछड़े वोटबैंक में सेंध लगाने की थी. इसके बाद पार्टी ने केशव प्रसाद मौर्य को प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष बनाकर दांव खेला. प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद केशव ने कार्यकर्ताओं में जमकर जोश भरा. नतीजा वर्ष 2017 में बीजेपी और उसके सहयोगियों ने मिलकर यूपी की 325 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की. इसलिए कई लोग उन्हें उस समय यूपी के मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक दावेदार के रूप में देखते थे, जब तक कि योगी आदित्यनाथ ने उन्हें पछाड़ नहीं दिया. 

मौर्य को उपमुख्यमंत्री बनाया गया. लेकिन यहां भी समझौता करना पड़ा क्योंकि बीजेपी ने आदित्यनाथ के लिए दो डिप्टी नियुक्त किए. हालांकि केशव पर बीजेपी संगठन का विश्वास बना रहा. 2022 के विधानसभा चुनावों में मौर्य को अपनी सीट सिराथू से हार के बावजूद पिछड़े मतदाताओं में पैठ के चलते उपमुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गई. अपने को आरक्षण और संविधान का सच्चा समर्थक बताने की कोशिश में वे योगी सरकार पर भी सवाल खड़े करने से नहीं चूके थे. 

ओबीसी नेता और लंबे समय से आरएसएस कार्यकर्ता केशव प्रसाद मौर्य 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद योगी आदित्यनाथ से सीएम पद खोने के बाद से अपने असंतोष को बमुश्किल छिपा पाए. हालांकि उसके बाद से उनके समर्थक लोकसभा चुनाव बाद बदली परिस्थ‍ितियों में उन्हें “बड़ी” भूमिका में देखने की आस लगाए हैं. फि‍लहाल यह बड़ी भूमिका संगठन में ही मिलती दिख रही है. राजनीति के जानकार बताते हैं कि अगर योगी आदित्यनाथ 2027 के विधानसभा चुनाव बाद दिल्ली की राजनीति की ओर बढ़ते हैं, तो बीजेपी को यूपी एक ऐसा चेहरा चाहिए जो जातिगत संतुलन साध सके. ऐसे में केशव प्रसाद मौर्य को संभावित विकल्प या बैलेंसिंग पावर के रूप में तैयार किया जा सकता है.

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