राजस्थान की सियासत के चर्चित ‘मानेसर कांड’ को छह साल बीत चुके हैं, मगर यह प्रकरण आज भी राजनीतिक विमर्श से बाहर नहीं जा पाया है. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने हाल के दिनों में जिस तरह बार-बार इसका जिक्र छेड़ा है, उससे यह सवाल फिर खड़ा हो गया है कि क्या गहलोत पुराने जख्म कुरेदकर कोई नया सियासी नैरेटिव गढ़ रहे हैं? या फिर BJP के हमलों का जवाब देने की यह उनकी कोई सोची-समझी रणनीति है?
पिछले 12 दिन में यह तीसरा मौका है जब अशोक गहलोत ने मानेसर प्रकरण का जिक्र किया है. खास बात यह है कि हर बयान के वक्त संदर्भ और जगह चाहे अलग-अलग रही हो, मगर संदेश एक ही था - मानेसर प्रकरण को बार-बार दोहराना.
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मानेसर सिर्फ एक पुरानी बगावत नहीं, बल्कि गहलोत की राजनीति का जीवंत हिस्सा है. राजनीतिक विश्लेषक डॉ. गजेंद्र सिंह फोगाट कहते हैं, "मानेसर प्रकरण को बार-बार कुरेदकर अशोक गहलोत पार्टी में यह संदेश देना चाहते हैं कि कांग्रेस और गांधी परिवार के प्रति कौन ज्यादा वफादार है."
मानेसर प्रकरण का ताजा जिक्र BJP प्रदेश प्रभारी राधा मोहन दास अग्रवाल के उस बयान के बाद आया, जिसमें उन्होंने सचिन पायलट को बहरुपिया बता दिया. 27 अप्रैल को टोंक में एक सभा में अग्रवाल ने कहा, "पायलट की एक टांग कांग्रेस में और दूसरी न जाने कहां रहती है? जिनकी अपनी पार्टी, अपने मुख्यमंत्री और अपने कार्यकर्ताओं के प्रति विश्वसनीयता नहीं रही, उसे आपने टोंक का विधायक बना दिया. वह न तो आपके टोंक के निवासी हैं और न ही राजस्थान के, फिर भी ऐसे व्यक्ति को जिताकर आपने नई प्रथा बना दी."
इस बयान ने राजस्थान के सियासी पारे में उबाल ला दिया. अग्रवाल के इस बयान के कुछ देर बाद ही गहलोत मानेसर प्रकरण को फिर सुर्खियों में ले आए. गहलोत ने कहा, "BJP सचिन पायलट और हमारे विधायकों को गुमराह करके मानेसर लेकर गई थी. सचिन पायलट को अब यह अहसास हो गया है कि इस प्रकार की गलती करने का क्या अंजाम होता है. अब वे समझ भी गए हैं और संभल भी गए हैं. मैं उम्मीद करता हूं कि अब वे हमें छोड़कर कभी नहीं जाएंगे. हमारी पूरी पार्टी उनके साथ है."
14 अप्रैल को नागौर के डीडवाना में आंबेडकर जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में भी अशोक गहलोत ने मानेसर प्रकरण का जिक्र छेड़ा था. गहलोत ने कहा, "भजनलाल शर्मा और मदन राठौड़ हमारे ऊपर बोलते हैं. वे चाहते हैं कि मैं सचिन पायलट का नाम लूं कि ये लोग मानेसर गए थे. वे चाहते हैं कि हमारी लड़ाई फिर शुरू हो जाए."
फिर 23 अप्रैल को दिल्ली में अशोक गहलोत और सचिन पायलट लंबे समय बाद सार्वजनिक तौर पर एक साथ दिखे. पायलट ने आगे बढ़कर गहलोत से हाथ मिलाया तो गहलोत ने मुस्कुराते हुए कहा, "अब कोई नहीं कहेगा कि हम दोनों में बनती नहीं."
गहलोत के इस बयान ने BJP को फिर सियासी टिप्पणी का मौका दे दिया. BJP प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने कहा, "अगर किसी को बार-बार कहना पड़े कि हमारे बीच मतभेद नहीं हैं, तो इसका मतलब है कि अंदरखाने सब ठीक नहीं है."
बीते साल 21 मई 2025 को कांग्रेस मुख्यालय में राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर आयोजित कार्यक्रम में भी गहलोत ने मानेसर प्रकरण को याद किया. उस वक्त उनके निशाने पर पायलट के साथ ही कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा भी रहे. गहलोत ने गोविंद सिंह डोटासरा को मानेसर कांड की देन बताकर यह जताने की कोशिश की कि अगर मानेसर प्रकरण नहीं होता, तो डोटासरा का कद इतना बड़ा नहीं होता.
दरअसल, जुलाई 2020 का मानेसर प्रकरण राजस्थान की राजनीति का वह मोड़ था, जब सचिन पायलट और उनके समर्थक 18 विधायकों की बगावत ने गहलोत सरकार को संकट में डाल दिया था. गहलोत को मुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग को लेकर पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ 12 जुलाई 2020 को हरियाणा के मानेसर स्थित एक रिसॉर्ट में पहुंच गए थे. सत्ता बचाने के लिए गहलोत और उनके समर्थक विधायक भी 34 दिन तक जयपुर और जैसलमेर के होटलों में कैद रहे. इस घटना ने पार्टी के भीतर गहरे अविश्वास की रेखा खींच दी थी. गहलोत अब उसी प्रकरण को बार-बार याद दिलाकर शायद यह बताना चाहते हैं कि राजनीतिक स्मृति छोटी नहीं होती.
हालांकि, प्रदेश कांग्रेस के लिए 25 सितंबर 2022 का दिन भी मानेसर की घटना से कमतर नहीं था, मगर यह दिन मानेसर की तरह ज्यादा सुर्खियों में नहीं आ पाया. सचिन पायलट ने भी एक-दो मौकों को छोड़कर कभी इस घटनाक्रम का जिक्र नहीं किया.
राजस्थान की सियासत में 25 सितंबर 2022 वह दिन था, जब अशोक गहलोत के समर्थक विधायकों ने कांग्रेस आलाकमान की ओर से भेजे गए पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन द्वारा बुलाई गई बैठक का बहिष्कार कर दिया था. यह बैठक विधायकों की राय जानने के लिए बुलाई गई थी, मगर 82 विधायकों ने सचिन पायलट की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी के विरोध में विधानसभाध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी को अपना इस्तीफा दे दिया था.
देखा जाए तो मानेसर प्रकरण अशोक गहलोत के खिलाफ था, मगर 25 सितंबर 2022 का प्रकरण सीधे तौर पर आलाकमान के आदेशों की अवमानना था. फिर भी मानेसर प्रकरण को बार-बार सामने लाना गहलोत की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए वे यह जताने की कोशिश करते हैं कि सियासत में कुछ घटनाएं कभी पूरी तरह इतिहास नहीं बन पातीं.

