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प. बंगाल: ममता बनर्जी जब नौकरी से निकाले गए शिक्षकों से बात करने पहुंची तो क्यों हुआ बवाल?

सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद प. बंगाल में करीब 26 हजार शिक्षक और गैर-शिक्षक स्टाफ को अपनी नौकरी गंवानी पड़ी है. इन लोगों से बात करने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 7 अप्रैल को एक कार्यक्रम आयोजित किया था

ममता बनर्जी (फाइल फोटो)
ममता बनर्जी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 8 अप्रैल , 2025

ममता बनर्जी का 'आउटरीच प्रोग्राम' यानी जनता से सीधे जुड़ाव के लिए उनके पास पहुंचने का कार्यक्रम उनपर भारी पड़ता दिख रहा है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के कारण राज्य में नियुक्त हुए 26 हजार से ज्यादा शिक्षक और गैरशिक्षक स्टाफ को नौकरी गंवानी पड़ी है.

इन्हीं लोगों से संवाद के लिए ममता बनर्जी ने एक कार्यक्रम रखा था लेकिन यह इन लोगों के तूफानी प्रदर्शन का एक बड़ा मौका बन गया. इससे राज्य सरकार और पीड़ित शिक्षकों के बीच की गहरी दरारें उजागर हो गईं.

कोलकाता में 7 अप्रैल को आयोजित यह सभा एक अराजक और रोष भरे कार्यक्रम में बदल गई. प्रभावित शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों ने खुले तौर पर सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर अपना आक्रोश व्यक्त किया, जिसमें भर्ती में व्यापक अनियमितताओं के कारण लगभग 26,000 नियुक्तियां रद्द कर दी गई थीं.

इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और शिक्षा मंत्री ब्रत्य बसु तथा मुख्य सचिव मनोज पंत सहित अन्य लोग शामिल हुए थे. यह कार्यक्रम आश्वासन का मंच होना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय यह सार्वजनिक फटकार में बदल गया.

लेखक अबुल बशर, कवि सुबोध सरकार और कुलपति अमिया कुमार पांडा समेत कई वक्ताओं को मंच से उतार दिया गया क्योंकि उन्होंने मुख्यमंत्री की तारीफ़ में कविताएं पेश करने की कोशिश की. उनके बार-बार दिए गए आश्वासन कि "दीदी (ममता) आपका ख्याल रखेंगी" को भी लोगों ने तानों के शोर में दबा दिया.

दर्शकों में हाल ही में बर्खास्त किए गए शिक्षक शामिल थे, जो कविताओं के मूड में नहीं थे. यहां तक ​​कि खुद ममता के संबोधन को भी प्रदर्शनकारियों ने दो बार बाधित किया और सीएम को भी विरोध झेलना पड़ा. एक लंबे, जोशीले भाषण में, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना की, राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर साजिश रचने का आरोप लगाया और "योग्य उम्मीदवारों" के रूप में चयनित हुए लोगों की बहाली के लिए लड़ने की कसम खाई.

ममता ने कहा, "ऐसा मत सोचिए कि हमने इस फैसले को स्वीकार कर लिया है. आपके दुख से हमारा दिल दुख रहा है... इसी वजह से वे मुझे जेल में डाल सकते हैं. लेकिन मुझे इसकी परवाह नहीं है."

ममता ने दावा किया कि फैसले में उचित प्रक्रिया और पारदर्शिता का अभाव था. उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने योग्य और अयोग्य उम्मीदवारों की सूची भी नहीं दी है. उन्होंने राज्य को दोनों को अलग करने का मौका नहीं दिया. एक निर्दोष व्यक्ति को दंडित नहीं किया जा सकता."

मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि 2022 से ही एक "गंदा खेल" चल रहा है, जो कानूनी कार्यवाही के पीछे राजनीतिक मकसद साधने का इशारा करता है. मुख्यमंत्री ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, "उन्होंने 2022 से अपना खेल शुरू कर दिया है... आपको समझना होगा कि कौन मुखौटा पहने हुए है और कौन अपना असली चेहरा दिखा रहा है."

तमाम बयानबाजी के बावजूद, ममता प्रमुख कानूनी और प्रशासनिक कदमों पर टालमटोल करती और विरोधाभासी नजर आईं, और निकाले गए शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए आगे का रास्ता स्पष्ट रूप से बताने में विफल रहीं. आलोचकों का तर्क है कि उनके भाषण में ठोस कार्रवाई के बिंदुओं का अभाव था और यह आरोप-प्रत्यारोप और भावनात्मक अपीलों के बीच उलझा हुआ था.

सिर्फ़ मुख्यमंत्री ही नहीं, उनसे पहले कई वक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से सहमत होने से इनकार कर दिया. इससे सवाल उठे हैं कि किसी राज्य का संवैधानिक प्रमुख ऐसे बयानों की अनुमति कैसे दे सकता है जो अदालत की अवमानना ​​के बराबर हैं. बीजेपी के पुरुलिया सांसद ज्योतिर्मय सिंह महतो ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर "न्यायपालिका पर ममता द्वारा किए गए हमले के खिलाफ़ कार्रवाई" करने की अपील की.

संकट की जड़ पश्चिम बंगाल एसएससी (स्कूल सेवा आयोग) से जुड़े एक बड़े भर्ती घोटाले में है. कथित तौर पर हेरफेर की गई सूचियों और रिश्वत के ज़रिए हज़ारों शिक्षण और गैर-शिक्षण पदों को भरा गया, जिसके कारण कई जांच और कानूनी लड़ाइयां शुरू हुईं. कलकत्ता हाई कोर्ट ने शुरू में कई नियुक्तियां रद्द कर दी थीं और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा, और मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में "संस्थागत सड़ांध" का हवाला दिया गया और व्यवस्थागत भ्रष्टाचार के बारे में चिंता जताई गई. हालांकि, फैसले में वैध और अवैध नियुक्तियों की अलग-अलग सूची नहीं दी गई, जिससे अस्पष्टता की स्थिति बनी और हंगामा हुआ.

अपने पूरे भाषण में ममता ने कहा कि उन्होंने मनमाने ढंग से किसी को नौकरी से नहीं निकाला है. उन्होंने कहा, "मैंने कभी किसी को मनमाने ढंग से सज़ा नहीं दी और न ही किसी की नौकरी छीनी है." उन्होंने दावा किया कि सीपीआई(एम) के 34 साल के शासन के दौरान नौकरियां चिरकूटों (कागज़ के टुकड़ों) के ज़रिए दी जाती थीं.

ममता ने साजिश का संकेत देते हुए सीपीआई(एम), बीजेपी और यहां तक ​​कि न्यायपालिका को भी दोषी ठहराया. उन्होंने पूछा, "आप उन सभी को दागी कैसे कह सकते हैं? क्या इस फैसले के पीछे कोई खेल है?" अदालतों के लिए कानूनी सम्मान का दावा करने के बावजूद, उन्होंने एक साथ इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाया. उन्होंने कहा, "अगर कोई मुझे चुनौती देता है, तो मैं लड़ना जानती हूं... यह उन नकाबपोश लोगों की गलती है जिन्होंने आपके साथ खेला है."

ममता ने कहा कि बंगाल ने पहले ही कानूनी कदम उठाए हैं, जिसमें समीक्षा याचिका दायर करना और अदालत से स्पष्टीकरण मांगना शामिल है. उन्होंने अभिषेक मनु सिंघवी, कपिल सिब्बल, राकेश द्विवेदी, कल्याण बनर्जी और प्रशांत भूषण की एक मजबूत कानूनी टीम का नाम लेते हुए दावा किया कि वे योग्य शिक्षकों की बहाली के लिए बहस करेंगे.

पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन देकर अनुरोध किया है कि मौजूदा शिक्षकों को फिलहाल अपना काम जारी रखने की अनुमति दी जाए.

ममता ने प्रभावित शिक्षकों को यह कहकर भी प्रोत्साहित किया कि अगर उन्हें औपचारिक बर्खास्तगी नोटिस नहीं मिला है तो वे 'स्वेच्छा से' काम करना जारी रखें.  उन्होंने कहा, "आप अपना काम जारी रख सकते हैं. क्या आप बच्चों को नहीं पढ़ाएंगे? कोई आपको रोक नहीं सकता." यह बयान सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवहेलना के बारे में गंभीर कानूनी सवाल उठाता है.

जब शिक्षकों के एक समूह ने विरोध में चिल्लाते हुए पूछा कि "स्वैच्छिक सेवा" से उनका क्या मतलब है, तो उन्होंने यह कहकर मामले को शांत करने की कोशिश की कि उन्होंने कानूनी ढांचे के भीतर इन शब्दों का इस्तेमाल किया, जिससे और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई. उन्होंने दावा किया, "हम अदालत के निर्देश का पालन करेंगे", लेकिन कुछ मिनट बाद उन्होंने कहा, "अगर अदालत हमें स्पष्टीकरण नहीं देती है, तो मेरे दिमाग में कुछ योजना है."

ममता बनर्जी ने दो चरणों वाली योजना की रूपरेखा की बात की - पहला, योग्य शिक्षकों की नौकरियों की सुरक्षा करना और दूसरा, अयोग्य चिह्नित किए गए लोगों के खिलाफ सबूतों की समीक्षा करना. उन्होंने वादा किया कि अगर जरूरत पड़ी तो राज्य दो महीने के भीतर शिक्षकों को बहाल करेगा और करियर निरंतरता लाभ प्रदान करेगा. उन्होंने कहा, "अगर वंचित शिक्षक संघ से परामर्श करना चाहता है, तो मैं मुख्य सचिव और शिक्षा सचिव से उन्हें शामिल करने के लिए कहूंगी." उन्होंने कहा, "हमारा धर्म नौकरियां प्रदान करना है, उन्हें छीनना नहीं."

फिर भी, ममता के अंतिम लहजे में राजनीतिक आक्रामकता झलक रही थी, "यह मुझ पर और मेरी सरकार पर मानसिक हमला है, और मैं इसका मुंहतोड़ जवाब दूंगी. हम रॉयल बंगाल टाइगर की तरह केस लड़ेंगे!"

ममता ने खुद को न्याय के लिए योद्धा के रूप में पेश करने की कोशिश की, लेकिन उनके रुख की कानूनी विशेषज्ञों और विपक्षी नेताओं ने समान रूप से आलोचना की. उनका भाषण कई बार विरोधाभासी और विद्रोही था. ऐसा लग रहा था कि वह न्यायपालिका का सम्मान करने और राजनीतिक रूप से उसे कमज़ोर करने के बीच एक तार पर चल रही थीं.

बुनियादी मुद्दा, सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं की ईमानदारी, भावनात्मक अपीलों और राजनीतिक बदनामी के पक्ष में काफी हद तक दरकिनार कर दिया गया. इस मामले को गौर से अध्ययन करने वालों ने चेतावनी दी है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने या उसे कमजोर करने का कोई भी प्रयास संवैधानिक संकट का कारण बन सकता है.

- अर्कमय दत्ता मजूमदार

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