scorecardresearch

BJP में संगठन की मजबूती के लिए नितिन नवीन को क्यों याद आ गया चरखा?

BJP का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार अपने शहर पटना पहुंचे नितिन नवीन ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि चरखे के बाना की तरह अब पार्टी संगठन में रंग भरना है

Nitin Nabin
BJP अध्यक्ष नितिन नवीन (फाइल फोटो)
अपडेटेड 11 फ़रवरी , 2026

राजधानी पटना का वह बापू सभागार था, जहां BJP के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे. वे राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद 10 फरवरी को पहली दफा अपने शहर पटना पहुंचे और पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनके सम्मान में अभिनंदन समारोह का आयोजन किया था. 

इस मौके पर बोलते हुए उन्हें अचानक चरखे की याद आ गई. उन्होंने कहा, “भारतीय जनता पार्टी का होरीजॉन्टल ग्रोथ (विस्तार) तो हुआ है, अब कार्यकर्ताओं को पार्टी की वर्टिकल ग्रोथ (ऊपर की तरफ बढ़ाना) भी करना है. आपने चरखा देखा होगा. चरखा में ताना और बाना दोनों होता है. उसके ताने में आप होरीजॉन्टल ग्रोथ देख सकते हैं और उसमें जो बाना होता है, उसके जरिये नक्शा गढ़ना होता है, नए-नए डिजाइन, नए स्वरूप को लाना होता है. यानी आने वाले समय में आपको इसी तरह BJP के वर्टिकल ग्रोथ पर काम करना होगा.”
 
अपने पार्टी संगठन में गहराई लाने के लिए उन्होंने चरखे का उदाहरण क्यों दिया, यह सवाल बिहार के राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बनने लगा. खासतौर पर इसलिए भी कि महज डेढ़ महीने पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत का वह बयान काफी चर्चा में आया था, जब उन्होंने कहा था, “सिर्फ चरखा चलाकर आजादी मिली हो, ऐसा नहीं है.” हालांकि सवाल यह भी उठे कि जिस ताना-बाना का उदाहरण उन्होंने दिया है, वह चरखे में नहीं होता, वह करघे में होता है.
 
करघे में कपड़ों की बुनाई के लिए दो तरह के धागों का इस्तेमाल होता है. पहला ताना जो कि जैसा उन्होंने बताया होरीजॉन्टल यानी क्षैतिज होता है, दूसरा धागा जो भरनी के जरिये गतिशील होता है, और कई दफा ऊपर से भी नीचे आता है, उसे बाना कहते हैं. मगर उससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर उन्होंने इस प्रतीक का सहारा क्यों लिया?
 
बाकीपुर विधानसभा से विधायक नितिन नवीन जब इस यात्रा के दौरान बिहार विधानसभा पहुंचे तो इंडिया टुडे ने उनसे यह सवाल पूछा. उन्होंने तत्काल तो इसका जवाब नहीं दिया, मगर बाद में पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय मयूख के जरिये जवाब भिजवाया.
 
उनका कहना था, “BJP ने 14 करोड़ लोगों को जोड़कर संगठन का विस्तार तो कर लिया है. मगर अभी उसमें रंग भरने का काम बाकी है. इसी वजह से चरखे का उदाहरण लिया गया. अभी हमें प्रशिक्षण के जरिये इन 14 करोड़ BJP कार्यकर्ताओं में रंग भरना है और डिजाइन बनाना है. प्रशिक्षण के जरिये. हम कार्यकर्ताओं का सम्यक विकास करना चाहते हैं.”
 
जब उनसे यह पूछा गया कि चरखा ही क्यों, यह तो गांधी जी का हथियार रहा है? इस पर उन्होंने कहा, “क्या गांधी जी हमारे पूज्य नहीं हैं? क्या उन पर कुछ खास लोगों का कब्जा है?”
 
हालांकि विरोधी दल के लोग नितिन नवीन के इस उदाहरण से सहमत नहीं थे. राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रवक्ता जयंत जिज्ञासु कहते हैं, “देश की आजादी में बड़े प्रतीक के रूप में गांधी ने चरखे का प्रयोग किया था. यह श्रमणशील लोगों की मेहनत का प्रतीक रहा. मुझे लगता है नितिन जी या उनके वैचारिक प्रमुख भागवत जी जब चरखे का उल्लेख करते हैं, तो वे इससे इतर कोई दूसरी ही बात करते हैं. अलग-अलग तरह की बातें कर लोगों को भ्रमित करना उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा है. वे श्रमिकों को तो अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, मगर अमेरिका के साथ ऐसी डील कर रहे हैं, जिससे हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था चौपट हो जाने वाली है.”
 
जयंत आगे यह भी कहते हैं कि BJP धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करती रही है लेकिन अब ये प्रतीक घिसने लगे हैं तो नया प्रतीक लेकर आए हैं जिससे नए वर्गों, खासकर श्रमिकों को अपने साथ जोड़ सकें. 
 
दरअसल चरखे का जिक्र आते ही गांधी का जिक्र आना स्वभाविक है. ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि गांधी ने चरखे का इस्तेमाल क्या कांग्रेस को आगे बढ़ाने के लिए किया था? नितिन नवीन के इस प्रतीक और गांधी के प्रयोग में कितनी साम्यता है? यह समझने के लिए जब हमने गांधी विचारक और खादी अभियानी चिन्मय मिश्र से बातचीत की तो उन्होंने कहा, “चरखा आजादी का औजार जरूर रहा है मगर कभी-भी राजनीतिक अस्त्र नहीं रहा. गांधी का विचार किसी दल को आगे बढ़ाने का नहीं था, पूरे राष्ट्र को जोड़ने का था. वे चरखे के जरिये पूरे राष्ट्र को जोड़ने की कोशिश कर रहे थे और समाज का ताना-बाना बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे थे.”

मिश्र आगे अपनी चिंता जाहिर करते हुए यह भी कहते हैं कि आज राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जोड़ने से ज्यादा जरूरी है देश के बिखरते ताने-बाने को जोड़ना. साथ ही उन्होंने याद दिलाया, “नितिन नवीन ने वैसे प्रतीक गलत चुन लिया है. ताना-बाना करघे में होता है, चरखे में नहीं.”  
  
इन सभी विरोधी तर्कों से इतर असल सवाल यही है कि आखिर BJP अपने कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने औऱ संगठन को मजबूत करने के लिए चरखे का नया प्रतीक सामने लेकर क्यों आई है.  जैसा जयंत कहते हैं कि क्या सचमुच पार्टी के धार्मिक प्रतीक पुराने पड़ने लगे हैं?

इस मसले पर जब हमने टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र से पूछा तो उन्होंने कहा, “चरखा उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक था, इस प्रतीक का इस्तेमाल पार्टी की सांगठनिक मजबूती के लिए नहीं हो सकता. दरअसल भारत विविधताओं से भरा देश है. इसमें अलग-अलग वर्ग को लुभाने के लिए अलग-अलग प्रतीकों को और खासकर चरखे जैसे लोकप्रिय प्रतीकों को पकड़ते हैं. वैसे नितिन जिस ताने-बाने की बात करते हैं, उसका जिक्र को कबीर ने किया था. जो खुद बुनकर थे. उन्होंने सामाजिक समरसता के प्रतीक के तौर पर ताने-बाने का जिक्र किया था. तो असल सवाल यह होना चाहिए कि क्या नितिन नवीन भी इस तरह सोचते हैं?”

Advertisement
Advertisement