उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन की चर्चा कोई नई नहीं है, लेकिन जैसे ही कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे ने BSP के लिए INDIA गठबंधन के दरवाज़े खुले होने की बात कही, यह बहस फिर से केंद्र में आ गई कि आखिर यूपी में कांग्रेस को BSP की जरूरत क्यों महसूस हो रही है. वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक जमीन पर हलचल अभी से साफ दिखने लगी है.
कांग्रेस औपचारिक तौर पर भले ही पंचायत चुनाव अकेले लड़ने की तैयारी में हो, लेकिन बड़े चुनावों के लिए उसकी रणनीति कहीं अधिक व्यावहारिक नजर आती है. पांडे का बयान ऐसे वक्त आया है जब कांग्रेस संगठन सृजन अभियान के जरिए खुद को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रही है और एक साथ सभी 403 विधानसभा सीटों पर नजर रखने की बात कर रही है. यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस की सीमाएं और मजबूरियां दोनों सामने आती हैं.
सबसे पहला और अहम कारण है कांग्रेस का कमजोर जनाधार. पिछले तीन दशकों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का सामाजिक आधार लगभग सिमट चुका है. 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर करीब 2.5 फीसदी रहा. यह आंकड़ा सिर्फ हार नहीं, बल्कि राजनीतिक हाशिये पर चले जाने का संकेत है.
इसके उलट BSP का वोट शेयर आज भी दो अंकों के आसपास बना हुआ है. 2022 में लगभग 13 फीसदी और 2024 के लोकसभा चुनाव में करीब 9 फीसदी वोट शेयर यह बताने के लिए काफी है कि सीटें न जीतने के बावजूद BSP चुनावी गणित बिगाड़ने और बनाने दोनों की ताकत रखती है. कांग्रेस जानती है कि इतने कमजोर आधार के साथ वह BJP जैसी मजबूत और संसाधन-संपन्न पार्टी को सीधे चुनौती नहीं दे सकती.
दूसरा बड़ा कारण है दलित वोट बैंक. राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं और इस वर्ग में BSP का प्रभाव आज भी सबसे ज्यादा संगठित रूप में मौजूद है. कांग्रेस के पास दलितों में न तो वैसा नेतृत्व है और न ही वैसी सांगठनिक पकड़, जो BSP दशकों से बनाए हुए है. जाटव दलितों के साथ-साथ BSP ने गैर-जाटव दलितों के बीच भी अपनी जड़ें जमाई हैं. BJP ने पिछले कुछ वर्षों में गैर-जाटव दलितों और गैर-यादव OBC को साधने की रणनीति अपनाई है, लेकिन इसके बावजूद BSP का कोर दलित आधार पूरी तरह शिफ्ट नहीं हुआ है. कांग्रेस के लिए यह आधार अपने दम पर खड़ा करना फिलहाल असंभव जैसा है, इसलिए BSP उसके लिए एक स्वाभाविक सहारा बनती है.
तीसरा पहलू मुस्लिम मतों का है. उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट आमतौर पर उस पार्टी या गठबंधन के साथ जाता है जिसे BJP को हराने की सबसे मजबूत स्थिति में देखा जाता है. 2024 के लोकसभा चुनाव में SP-कांग्रेस गठबंधन को इसका फायदा मिला और BJP को राज्य में बड़ा झटका लगा. लेकिन विधानसभा चुनावों में तस्वीर ज्यादा जटिल होती है. BSP भले ही खुलकर मुस्लिम राजनीति न करे, लेकिन उसका वोट शेयर कई सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं के रुझान को प्रभावित करता है. कांग्रेस को यह समझ है कि अगर BSP अलग रहती है तो विपक्षी वोटों का बंटवारा होगा, जिसका सीधा फायदा BJP को मिलेगा.
चौथा कारण है कांग्रेस का हालिया गठबंधन अनुभव. समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस ने 2017 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव लड़े. 2017 का प्रयोग बुरी तरह असफल रहा, लेकिन 2024 में नतीजे अपेक्षाकृत बेहतर रहे और BJP पहली बार दूसरे नंबर पर खिसक गई. इस अनुभव ने कांग्रेस को यह सिखाया कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में गठबंधन के बिना प्रभावी मौजूदगी संभव नहीं है. हालांकि, कांग्रेस यह भी जानती है कि सिर्फ SP पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा, खासकर तब जब BJP लगातार सामाजिक इंजीनियरिंग को धार दे रही है. ऐसे में BSP का जुड़ना विपक्षी मोर्चे को और व्यापक बना सकता है.
इतिहास भी कांग्रेस के फैसलों पर असर डालता है. 1996 में BSP के साथ गठबंधन कांग्रेस के लिए एक सबक बन गया था. उस समय कांग्रेस ने केवल 125 सीटों पर चुनाव लड़ा और बाकी मैदान BSP के लिए छोड़ दिया. नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस संगठन जमीनी स्तर पर कमजोर पड़ता चला गया और कार्यकर्ताओं के पास करने को कुछ नहीं बचा. बाद में BSP ने कांग्रेस का साथ छोड़कर BJP के साथ सरकार बना ली. कांग्रेस के भीतर आज भी यह स्मृति मौजूद है, इसलिए पार्टी इस बार किसी भी संभावित समझौते में खुद को पूरी तरह हाशिये पर नहीं रखना चाहती. यही वजह है कि संगठन सृजन और सभी 403 सीटों पर फोकस जैसी बातें बार-बार दोहराई जा रही हैं.
इसके बावजूद, कांग्रेस को यह भी अहसास है कि अकेले चलने की जिद उसे और कमजोर कर सकती है. पंचायत चुनावों में अकेले उतरना संगठन को परखने का जरिया हो सकता है, लेकिन विधानसभा चुनाव एक अलग ही स्तर की लड़ाई है. BJP की चुनावी मशीनरी, संसाधन और सामाजिक गठजोड़ के सामने कांग्रेस का मौजूदा ढांचा अपर्याप्त है. BSP का साथ मिलने पर कांग्रेस न सिर्फ वोट शेयर के लिहाज से मजबूत होगी, बल्कि उसे एक मनोवैज्ञानिक बढ़त भी मिलेगी कि विपक्ष बिखरा हुआ नहीं है.
BSP की अपनी मजबूरियां भी कांग्रेस को उम्मीद देती हैं. मायावती सार्वजनिक तौर पर 2027 का चुनाव अकेले लड़ने की बात करती रही हैं और 2007 की पूर्ण बहुमत वाली जीत को आदर्श के रूप में पेश करती हैं. लेकिन बदले हुए राजनीतिक हालात में वैसी सफलता दोहराना आसान नहीं है. BJP की पकड़, मीडिया मैनेजमेंट और सामाजिक समीकरण 2007 से बिल्कुल अलग हैं. BSP का हालिया संगठनात्मक सक्रियता, बूथ स्तर पर तैयारी और आकाश आनंद को आगे लाने की कोशिश यह संकेत देती है कि पार्टी खुद को फिर से प्रासंगिक बनाए रखना चाहती है. ऐसे में कांग्रेस के साथ सीमित या रणनीतिक समझौता BSP के लिए भी पूरी तरह असंभव विकल्प नहीं है.
कांग्रेस के लिए एक और अहम वजह है INDIA गठबंधन की राजनीति. राष्ट्रीय स्तर पर BJP के खिलाफ एकजुट विपक्ष का संदेश देना कांग्रेस की रणनीति का हिस्सा है. अगर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में विपक्षी दल आपस में बंटे दिखते हैं, तो इसका असर राष्ट्रीय नैरेटिव पर भी पड़ता है. BSP को खुले तौर पर गठबंधन के लिए आमंत्रित करना कांग्रेस की इसी रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है, ताकि यह दिखाया जा सके कि BJP विरोधी खेमे में बातचीत के दरवाजे बंद नहीं हैं.
हालांकि रास्ता आसान नहीं है. SP-BSP-कांग्रेस जैसे तीन-तरफा गठबंधन की यादें 2019 के लोकसभा चुनाव से जुड़ी हैं, जहां वोट ट्रांसफर की समस्या और आपसी अविश्वास खुलकर सामने आया था. सामाजिक आधारों का पूरी तरह एक-दूसरे में न घुल पाना भी बड़ी चुनौती है. यही वजह है कि कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर कोई समझौता होता भी है, तो वह सीमित और बेहद व्यावहारिक होगा, न कि भावनात्मक या वैचारिक.
फिलहाल इतना साफ है कि कांग्रेस को यूपी में प्रासंगिक बने रहने के लिए BSP की जरूरत इसलिए है क्योंकि उसके पास खुद का मजबूत सामाजिक आधार नहीं बचा है. दलित वोट, चुनावी गणित और BJP के खिलाफ प्रभावी मोर्चा बनाने की मजबूरी कांग्रेस को BSP की ओर देखने के लिए मजबूर करती है. अविनाश पांडे का बयान इसी राजनीतिक यथार्थ का सार्वजनिक स्वीकार है. मायावती क्या फैसला लेंगी, यह भविष्य बताएगा, लेकिन इतना तय है कि BSP के बिना उत्तर प्रदेश की 2027 की लड़ाई में कांग्रेस की राह बेहद कठिन रहने वाली है.

