झारखंड विधानसभा के कुल 81 सदस्यों में कांग्रेस के 16 विधायक हैं और पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के साथ सत्ता में साझेदार है. इन 16 विधायकों में चार को मंत्री भी बनाया गया है. लेकिन बीते अरसे को देखें तो लगता है कि बाकी बचे 12 विधायकों की इन चार मंत्रियों से ठनी रहती है. विधायकों का आरोप है कि पार्टी के मंत्री उनकी नहीं सुनते. कभी बंद कमरे में तो कभी सदन में, ये आपस में ही एक दूसरे पर उंगली उठाते रहते हैं.
झारखंड विधानसभा का हालिया शीतकालीन सत्र 11 दिसंबर को खत्म हुआ है. इस दौरान सदन में सबसे अजीब स्थिति कांग्रेसी कोटे के मंत्रियों के लिए रही. पार्टी के विधायकों ने ही अपने मंत्रियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने दुमका जिले के हंसडीहा अस्पताल में 25 करोड़ के सामान की चोरी का मामला उठाया था. जिस पर कांग्रेस कोटे के स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी ने कहा कि प्रदीप यादव ने सदन को दिग्भ्रमित किया है. जांच में केवल 60 लाख रुपए का सामान चोरी होने की बात सामने आई है.
यही नहीं, मंत्री ने स्पीकर से प्रदीप यादव के सवाल को कार्यवाही से हटाने का आग्रह किया और यादव पर सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया. डॉ इरफान के बचाव में कांग्रेसी मंत्री दीपिका पांडेय ने भी प्रदीप यादव के आचरण पर सवाल उठाए. इसी बहस के दौरान मंत्री इरफान अंसारी ने प्रदीप यादव को प्रदीप जी कहकर संबोधित किया. तिस पर तमतमाते हुए प्रदीप यादव ने कहा कि, ‘’मैं सदन में हूं और मुझे माननीय विधायक कहकर संबोधित किया जाए.’’
झारखंड में हेमंत सोरेन की अगुवाई वाली सरकार दावा करती है कि पूरे राज्य में थैलेसीमिया के मरीजों को मुफ्त में ब्लड मुहैया कराया जा रहा है. सदन की कार्रवाई के दौरान प्रदीप यादव ने स्वास्थ्य मंत्रालय पर आरोप लगाया कि थैलेसीमिया के मरीजों के लिए मुफ्त में ब्लड उपलब्ध नहीं कराया जा रहा और उनके पास सबूत हैं कि एक पीड़ित को निजी अस्पताल में 51 हजार रुपए देकर ब्लड खरीदना पड़ा.
सत्र शुरू होने से पहले यानी 4 दिसंबर को कांग्रेस विधायक दल की एक बैठक हुई थी. तीन दिन बाद कथिततौर पर इस बैठक का एक ऑडियो लीक हो गया. इसमें कांग्रेसी विधायक ममता देवी ने आरोप लगाया था कि उन्होंने अपने क्षेत्र में एक नर्सिंग कॉलेज के लिए अनुमति मांगी थी और इसके लिए पांच लाख रुपए भी दिए थे. लेकिन काम नहीं हुआ. जवाब में इरफान अंसारी ने यहां भी आरोप को सिरे से खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि वे ऐसा 'गंदा' काम नहीं करते.
मामले ने तूल पकड़ा और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा कि पूरे मामले की जांच होनी चाहिए. आरोप बहुत ही गंभीर हैं. वहीं BJP विधायक नवीन जायसवाल ने कहा कि कांग्रेस के विधायक जब पैसा देकर काम नहीं करा पा रहे हैं, तब आम आदमी की स्थिति के बारे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.
इधर बवाल बढ़ने पर कांग्रेस के विधायक अनूप सिंह लीपापोती करते नजर आए. उन्होंने कहा, "मैं भी विधायक दल की बैठक में शामिल था. जहां तक मुझे याद है, ममता देवी ने मंत्री इरफान अंसारी पर नहीं, बल्कि पैसा लेने वाले पर आरोप लगाया. बल्कि उन्होंने तो मंत्री को पूरी स्थिति से अवगत कराया है. अगर कहीं गलत होगा तो मंत्री को तो पूरी स्थिति से अवगत कराना होगा न. हमें तो जांच करनी चाहिए कि पैसा किसने लिया.”
वहीं प्रदीप यादव के साथ सदन में हुई बहस को लेकर उन्होंने कहा, “विधायक को सदन में सवाल पूछने का पूरा अधिकार है, इसमें कोई गलती नहीं है. लेकिन विधायक दल का नेता होने के नाते प्रदीप यादव को पहले पार्टी अनुशासन को प्राथमिकता देनी चाहिए थी. अगर कोई बात थी तो मंत्री को अलग बुलाकर कहा जा सकता था. सदन में इस तरह का व्यवहार सही संदेश नहीं देता.”
अनूप सिंह के मुताबिक यह मामला निश्चित तौर पर पार्टी आलाकमान तक जाएगा. मुख्य सचेतक होने के नाते वे अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे.
कांग्रेस में आपसी तालमेल क्यों नहीं दिख रहा
विधायक दल की बैठक बंद कमरे में होती है. यहां विधायकों, प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी के कुछ पदाधिकारियों के अलावा कोई मौजूद नहीं रहता, लेकिन कांग्रेस में आपसी टकराव और खुन्नस का आलम यह है कि यहां हुई बातचीत का ऑडियो लीक कर दिया गया. इस लीक ऑडियो को दोनों पक्षों में से किसी ने न तो स्वीकार किया न ही खारिज किया.
एक विधायक नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, "पार्टी के मंत्री अपने आप को इतना बड़ा समझने लगे हैं कि उन्हें किसी काम के बारे में कहना मुश्किल हो गया है. वे अपने करीबियों के अलावा किसी की सुन ही नहीं रहे हैं. जिला स्तर के कार्यकर्ताओं की शिकायतें तो और भी ज्यादा हैं. यही हाल पिछले कार्यकाल में भी था.”
यह स्थिति उस अपील के ठीक उलट है, जो कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार बनने के बाद हेमंत सोरेन से की थी. बीते 6 मई को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पार्टी की विस्तारित कार्यसमिति की बैठक में शामिल होने रांची आए थे. यहां उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा, "मैंने हेमंत जी से साफ कहा है कि हमारे कार्यकर्ताओं को भी महसूस होना चाहिए कि उनकी सरकार है." पिछली सरकार में कांग्रेस के विधायकों और कार्यकर्ताओं को इस बात की बहुत अधिक शिकायत थी कि उनकी बात प्रखंड स्तर के अधिकारी तक नहीं सुनते.
हालांकि यह कोई कोई पहला मौका नहीं है जब कांग्रेसी नेताओं में आपसी टकराव के हालात बने हों. कांग्रेस के मंत्री और विधायक सत्ता में सहयोगी JMM के लिए भी असहज स्थिति पैदा करते रहे हैं. जून में ही कांग्रेसी विधायक और राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कैबिनेट या कॉर्डिनेशन कमेटी में चर्चा किए बगैर हेमंत सोरेन को सीधे तौर पर चिट्ठी लिखकर यह कह डाला कि राज्य में हरिजन की आबादी 50 लाख से अधिक है, लेकिन उनके हालात आदिवासियों से भी बदतर है. उन्होंने मांग की थी कि इनके लिए अनुसूचित जनजाति आयोग का गठन होना चाहिए.
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश इन मामलों पर पार्टी का स्टैंड स्पष्ट करते हुए कहते हैं, "यह बात गंभीर है कि विधायक आपस में ही टकरा रहे हैं. यह सहज स्थिति नहीं है. पार्टी के संज्ञान में पूरा मामला आया है. हम विधायकों और मंत्रियों से बात कर रहे हैं. मैं व्यक्तिगत तौर पर पूरे मामले को देख रहा हूं. कोशिश है कि ऐसी स्थिति दुबारा उत्पन्न न हो.’’

