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इन 5 वजहों से छत्तीसगढ़ निकला कांग्रेस के हाथ से

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के पहले ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषक और एग्जिट पोल भी कांग्रेस को बीजेपी पर भारी बता रहे थे

एक चुनावी रैली के दौरान भूपेश बघेल
अपडेटेड 3 दिसंबर , 2023

छत्तीसगढ़ चुनाव के कुछ वक्त पहले से ही भूपेश बघेल की जीत लगभग तय मानी जा रही थी. वजह थी उनकी स्टार सीएम की छवि. अशोक गहलोत के बाद भूपेश बघेल ही एकमात्र ऐसे सीएम थे जिन पर कांग्रेस आंख मूंदकर दांव लगा सकती थी.

अशोक गहलोत तो फिर भी कुछ मामलों में पार्टी लाइन से बाहर चले जाते थे मगर भूपेश बघेल ऐसे नेता साबित हुए जिन्होंने हाईकमान के आदेश को कभी अनदेखा नहीं किया. तो फिर ऐसा क्या हुआ कि छत्तीसगढ़ जैसा मजबूत गढ़ भी कांग्रेस के हाथ से फिसलकर बीजेपी की गोद में जा गिरा?

जानिए 5 बड़े कारण -

महादेव ऐप का जंजाल और भ्रष्टाचार का साया

विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 'महादेव ऐप घोटाला' छत्तीसगढ़ के सियासी गलियारों में बम की तरह फटा था. ऑनलाइन सट्टेबाजी से जुड़े इस कांड में भूपेश बघेल का नाम जोड़े जाने पर छत्तीसगढ़ की सरकार पर भ्रष्टाचार का साया मंडराने लगा था. ईडी की तरफ से भी कहा गया कि ऐप के प्रमोटर्स ने मुख्यमंत्री को अब तक 508 करोड़ रुपए दिए और इस मामले में जांच होने की बात की. कहीं न कहीं इस तरह के इल्जाम ने सरकार पर जनता के विश्वास को हिलाने का काम किया. बीजेपी ने इस मामले को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और लगातार छत्तीसगढ़ सरकार पर भ्रष्ट होने के आरोप लगाती रही. 

भूपेश बघेल की छवि और बीजेपी की संगठनात्मक सफलता 

बिल्कुल ठीक पढ़ा आपने. भूपेश बघेल की छवि चुनावों के दौरान इतनी बड़ी हो गई कि संगठनात्मक कमियों पर न तो कहीं चर्चा हुई और शायद पार्टी ने भी इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. उम्मीदवारों और संगठन पर काम करने के बजाय पार्टी ने भूपेश बघेल पर ही ज्यादा भरोसा जताया जिसका खामियाजा पार्टी को नतीजों के रूप में भुगतना पड़ा.

ओबीसी पॉलिटिक्स में बीजेपी का दांव

इधर सबको लग रहा था कि 'बघेल फैक्टर' के सामने बीजेपी सिर नहीं उठा पाएगी लेकिन पार्टी ने बड़े करीने से अपने संगठन में फेरबदल किया. अरुण साव को राज्य का पार्टी प्रमुख बनाने के साथ ही पार्टी ने कांग्रेस की ओबीसी पॉलिटिक्स के खिलाफ बड़ा दांव चल दिया था. 2018 में कांग्रेस की सफलता के पीछे ओबीसी फैक्टर का अहम योगदान माना जाता है. अरुण साव छत्तीसगढ़ के साहू समुदाय से आते हैं जो राज्य की ओबीसी जनसंख्या में बड़ा हिस्सेदार है. जहां पूरे छत्तीसगढ़ में ओबीसी वोट 50 प्रतिशत है तो उसमें भी 15 प्रतिशत साहू समुदाय से ही आता है. 

धान की राजनीति 

छत्तीसगढ़ की राजनीति में धान एक बड़ा मुद्दा है. बड़ी वजहों में से एक ये है कि ये इकलौता ऐसा राज्य है जो किसानों से सीधा धान खरीदकर फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) को बेचता है. कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में 3200 रुपए प्रति क्विंटल में धान खरीदी का वादा किया जो कि फिलहाल 2460 रुपए के  मूल्य से कहीं ज्यादा है. वहीं भाजपा ने जहां एक ओर धान की कीमत 3100 रुपए करने की बात अपने घोषणापत्र में कही तो दूसरी ओर एक एकड़ जमीन में 21 क्विंटल धान की खरीदी का भी वादा किया. 

बीजेपी की इस 'गारंटी' पर किसानों के विश्वास की एक वजह किसान सम्मान निधि भी हो सकती है जिसके तहत हर 4 महीने में किसानों के खाते में 2000 रुपए आ रहे हैं. इस स्कीम ने गरीब किसानों में बीजेपी के लिए एक 'गारंटी' का भरोसा पैदा किया है. 

मोदी फैक्टर 

इस फैक्टर का इस्तेमाल बीजेपी हर चुनाव में करती है और कमोबेश हर चुनाव में पार्टी को इसका फायदा होता दिखता है. छत्तीसगढ़ में बीजेपी बिना सीएम फेस के उतरी और सभी नेता लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काम करने की बात पर अडिग रहे. अब नतीजों में रूप में पार्टी को इस 'मोदी फैक्टर' का फायदा साफ-साफ नजर आ रहा है. छत्तीसगढ़ की इस जीत के बाद बड़े आराम से ये कहा जा सकता है कि 2014 से शुरू हुई मोदी लहर आज भी चुनावों में कंपन पैदा करने में सक्षम है.

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