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यूपी में प्रियंका गांधी की ‘दूसरी पारी’ से कांग्रेस को क्यों हैं बड़ी उम्मीदें?

प्रियंका गांधी के जन्मदिन पर यूपी कांग्रेस ने 100 दिनों का एजेंडा लॉन्च कर संकेत दिया है कि वे यहां अब फिर पार्टी को लीड करने वाली हैं

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 13 जनवरी , 2026

लखनऊ के 10, मॉल एवेन्यू स्थित प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में 12 जनवरी की सुबह सामान्य नहीं थी. अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की महासचिव प्रियंका गांधी के 54वें जन्मदिन पर केक काटने का कार्यक्रम था, लेकिन माहौल किसी औपचारिक समारोह से ज्यादा राजनीतिक संदेश देने वाला दिख रहा था. 

यूपी कांग्रेस विधानमंडल दल की नेता आराधना मिश्रा “मोना” के पार्टी नेताओं के साथ लखनऊ पार्टी दफ्तर में केक काटा. लखनऊ से लेकर गोरखपुर, प्रयागराज, मेरठ और गाजियाबाद तक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे और एक सुर में “अगले सौ दिनों का एजेंडा” पेश कर रहे थे. 

सवाल स्वाभाविक है कि सौ दिनों की इस राजनीतिक कार्ययोजना के लिए प्रियंका गांधी का जन्मदिन ही क्यों चुना गया? कांग्रेस के भीतर इसे महज संयोग मानने को तैयार कम लोग हैं. पार्टी के रणनीतिकारों के मुताबिक, यह एक सोची-समझी कवायद है, जिसके जरिए यूपी कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि प्रियंका गांधी का प्रदेश से रिश्ता खत्म नहीं हुआ है. 

जन्मदिन से संदेश तक

यूपी कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, “प्रियंका जी का जन्मदिन केवल एक तारीख नहीं है. कार्यकर्ताओं के लिए यह भावनात्मक जुड़ाव का दिन है. सौ दिनों के एजेंडे को इससे जोड़ने का मतलब है कि हम संगठन और कैडर को यह याद दिलाना चाहते हैं कि नेतृत्व वही है, जिस पर वे भरोसा करते आए हैं.” 

प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में मौजूद युवा कार्यकर्ताओं से बात करने पर भी यही बात सामने आती है. एक युवा नेता ने कहा, “2019-22 के दौरान प्रियंका गांधी सड़कों पर दिखती थीं. धरना हो या गिरफ्तारी, वे आगे रहती थीं. उसके बाद जो खालीपन आया, वह आज भी महसूस होता है.” 

जनवरी 2019 में जब प्रियंका गांधी वाड्रा को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी का महासचिव बनाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई थी, तब पार्टी में नई उम्मीद जगी थी. लखीमपुर खीरी हिंसा के बाद किसानों के पक्ष में सड़क से लेकर प्रशासन तक टकराव, महिलाओं के मुद्दों पर “लड़की हूं, लड़ सकती हूं” अभियान और योगी सरकार पर आक्रामक हमले, उन्होंने खुद को यूपी कांग्रेस के फ्रंटफुट लीडर के तौर पर पेश किया. लेकिन मेहनत और आक्रामकता के बावजूद नतीजे पार्टी के पक्ष में नहीं आए. वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस महज दो सीटों और करीब दो फीसदी वोट शेयर पर सिमट गई. यह हार सिर्फ चुनावी नहीं थी, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी थी. राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर बीना राय कहती हैं, “प्रियंका गांधी का अभियान भावनात्मक और मुद्दा आधारित था, लेकिन कांग्रेस का संगठन जमीन पर कमजोर था. गठबंधन की राजनीति में भी पार्टी अकेली पड़ गई. हार का ठीकरा सिर्फ प्रियंका पर फोड़ना ठीक नहीं, लेकिन नेतृत्व की जिम्मेदारी से वह बच भी नहीं सकती थीं.”

हार के बाद दूरी और फिर वापसी के संकेत

चुनावी हार के बाद प्रियंका गांधी धीरे-धीरे यूपी के राजनीतिक परिदृश्य से गायब होती चली गईं. दिसंबर 2023 में उनकी जगह अविनाश पांडे को यूपी कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया. पार्टी के भीतर इसे प्रियंका के ‘बैकसीट’ लेने के तौर पर देखा गया. हालांकि पूरी तस्वीर इससे अलग थी. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रियंका गांधी ने रायबरेली में डेरा डालकर राहुल गांधी की जीत सुनिश्चित की और अमेठी में केएल शर्मा के लिए भी सक्रिय रहीं. इसके बाद खुद वायनाड से उपचुनाव जीतकर सांसद बनीं और संसद में अपने भाषणों से अलग पहचान बनाई. 

कांग्रेस के एक राष्ट्रीय नेता बताते हैं, “प्रियंका गांधी पूरी तरह गायब नहीं थीं. वे यूपी से रणनीतिक दूरी बनाकर राष्ट्रीय स्तर पर खुद को स्थापित कर रही थीं. अब जब लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन सुधरा है, पार्टी यूपी में फिर से जोखिम लेने की स्थिति में है.” 

यूपी कांग्रेस के सौ दिनों के एजेंडे का केंद्र “संविधान संवाद महापंचायत” है. अगले तीन महीनों में प्रदेश भर में करीब तीस बड़ी सभाएं करने की योजना है. इनमें संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, मनरेगा और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दे प्रमुख रहेंगे. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय के 10 जनवरी को जारी सर्कुलर के मुताबिक, मौजूदा और पूर्व सांसद, विधायक और वरिष्ठ नेता अपने-अपने क्षेत्रों में इस अभियान का नेतृत्व करेंगे. सहारनपुर में इमरान मसूद, प्रयागराज में उज्ज्वल रमन सिंह, मेरठ में राजीव शुक्ला, गाजियाबाद में सलमान खुर्शीद जैसे नाम इस सूची में शामिल हैं. कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि इन कार्यक्रमों में प्रियंका गांधी की मौजूदगी चयनित मौकों पर होगी. एक नेता के मुताबिक, “हर सभा में उनका जाना जरूरी नहीं है, लेकिन जहां वह जाएंगी, वहां संदेश साफ होगा कि पार्टी उन्हें यूपी के चेहरे के तौर पर आगे रख रही है.”

गठबंधन की राजनीति और सपा को संकेत

प्रियंका गांधी को आगे करने के पीछे एक और बड़ा कारण समाजवादी पार्टी के साथ समीकरण है.  2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने यूपी में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया. कांग्रेस अब चाहती है कि 2027 में भी यह गठबंधन बना रहे और पार्टी करीब सौ सीटों पर चुनाव लड़े. वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ गठबंधन के पीछे प्र‍ियंका गांधी का ही हाथ था.

पार्टी नेता बताते हैं कि प्र‍ियंका गांधी के सपा अध्यक्ष अखि‍लेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव के साथ बेहद अच्छे रिश्ते हैं. ऐसे में 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले सीटों के तालमेल में प्रियंका गांधी की भूमिका अहम हो सकती है. प्रो. बीना राय मानती हैं, “प्रियंका गांधी को आगे रखकर कांग्रेस सपा को यह संदेश दे रही है कि वह जूनियर पार्टनर बनकर चुनाव लड़ने के मूड में नहीं है. प्रियंका का चेहरा सीट बंटवारे की बातचीत में कांग्रेस की मोलभाव की ताकत बढ़ाता है.” अगर बात नहीं बनती, तो कांग्रेस के पास अकेले चुनाव लड़ने या नए सामाजिक समीकरणों के साथ प्रयोग करने का विकल्प भी रहेगा. कांग्रेस के ओबीसी विंग का ‘परिवर्तन प्रतिज्ञा’ अभियान इसी दिशा में एक संकेत माना जा रहा है.

संगठन में जान फूंकने की कोशिश

कांग्रेस के भीतर यह स्वीकार किया जाता है कि यूपी में संगठन आज भी उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है. सौ दिनों का एजेंडा संगठन को सक्रिय करने का पहला कदम माना जा रहा है. यूपी कांग्रेस विधायक दल की नेता आराधना मिश्रा कहती हैं, “प्रियंका जी को लेकर यह कहना कि वे वापस आ रही हैं, गलत है. वे कभी गई ही नहीं थीं. संगठन को जब भी उनकी जरूरत पड़ी, उन्होंने समय दिया है. कार्यकर्ताओं का मनोबल उनसे जुड़ा है.” एक जिला स्तर के नेता का कहना है, “जब प्रियंका गांधी का नाम आता है, तो कार्यकर्ता खुद-ब-खुद सक्रिय हो जाता है. प्रदेश में कांग्रेस के पास गांधी परिवार के बाहर कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जो योगी, अखिलेश या मायावती की सीधी टक्कर ले सके.” 

इसके बावजूद चुनौतियां कम नहीं हैं. 2022 की हार की यादें अभी ताजा हैं. संगठनात्मक कमजोरी, संसाधनों की कमी और जातीय समीकरणों में कांग्रेस की सीमित पकड़ आज भी बड़ी बाधा है. प्रो. राय मानती हैं, “प्रियंका गांधी की दूसरी पारी तभी सफल हो सकती है, जब वह केवल चेहरा न बनें, बल्कि संगठनात्मक फैसलों में भी निर्णायक भूमिका निभाएं. सिर्फ रैलियों और अभियानों से चुनाव नहीं जीते जाते.”

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