जब 3 मई की रात बिहार के भागलपुर में गंगा नदी पर बना विक्रमशिला सेतु आंशिक रूप से ढह गया तो नदी में सिर्फ कंक्रीट नहीं गिरा, बल्कि जनविश्वास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी बह गया. हालांकि इसे 'ढांचागत असफलता’ बताया गया है.
बिहार हाल के वर्षों में कई पुलों के ढहने का गवाह रहा है और ऐसी घटनाओं का सिलसिला अब परिचित हो गया है- देर रात हादसा. तुरंत प्रशासनिक प्रतिक्रिया. यातायात का डाइवर्जन (मार्ग परिवर्तन). जांच के आदेश. इंजीनियरों का निलंबन और फिर, एक बड़ा वादा : मरम्मत, पुनर्निर्माण और सामान्य स्थिति की बहाली.
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भारतीय सेना और सीमा सड़क संगठन (BRO) से मदद मांगी है. अधिकारियों ने आश्वासन दिया है कि पिलर (स्तंभ) सुरक्षित हैं और नुकसान को कुछ महीनों में ठीक कर दिया जाएगा. हालांकि प्रशासनिक प्रतिक्रिया उस असहज प्रश्न को नहीं छिपा सकती: एक महत्वपूर्ण पुल जो दक्षिण बिहार को कोसी और सीमांचल क्षेत्रों से जोड़ने वाली जीवनरेखा है उस बिंदु तक कैसे पहुंचा जहां उसका ढहना तयशुदा लग रहा था?
मार्च में, पुल के नीचे की एक सुरक्षा दीवार टूटने की खबरें आई थीं, जिससे संरचना की मजबूती को लेकर आशंकाएं पैदा हुई थीं. तब भागलपुर प्रशासन ने डर को दूर किया था और माइक्रो एसेसमेंट का वादा किया था. टीमें भेजी गईं. सलाह मांगी गई. और फिर भी, पुल का एक हिस्सा ढह गया.
पुल ढहने के बाद सरकार ने "चेतावनी के संकेतों को नजरअंदाज करने" के लिए दो इंजीनियरों को निलंबित कर और जांच के आदेश देकर तुरंत कार्रवाई की. लेकिन ऐसी कार्रवाइयां अक्सर सार्थक जवाबदेही के बजाय प्रशासनिक औपचारिकता के रूप में काम करती हैं. गहरा मुद्दा प्रणालीगत है: बिहार के बुनियादी ढांचे के ईकोसिस्टम में रखरखाव, निरीक्षण और जिम्मेदारी की संस्कृति.
विक्रमशिला सेतु की घटना कोई अकेली घटना नहीं है. पिछले दो वर्षों में राज्य में एक दर्जन से अधिक पुल आंशिक या पूर्ण रूप से ढह चुके हैं. कुछ निर्माणाधीन थे, कुछ नए बने थे, और कुछ दशक पुराने थे. हर हादसे की अपनी सफाईयां थीं- डिजाइन में खामियां, खराब सामग्री, भारी बारिश, नदी का व्यवहार, ठेकेदार की लापरवाही. लेकिन कुल मिलाकर, वे एक ऐसे पैटर्न की ओर इशारा करती हैं जो महज संयोग नहीं हो सकता.
पैटर्न यह है: बुनियादी ढांचा बनाया तो जाता है लेकिन उसी गंभीरता के साथ उसका रखरखाव नहीं किया जाता. चेतावनी के संकेतों को नोट किया जाता है लेकिन उन पर तत्परता से कार्रवाई नहीं की जाती. जिम्मेदारी पथ निर्माण विभाग, बिहार राज्य पुल निर्माण निगम, ठेकेदारों और सलाहकारों के बीच बिखरी हुई है. लेकिन जब आखिरकार कोई पुल गिरता है तो जवाबदेही सुविधापूर्वक कुछ निलंबित अधिकारियों तक सिमट जाती है.
इस चक्र के गंभीर परिणाम होते हैं. जनता के लिए एक पुल इस बात की गारंटी की तरह है कि राज्य जो बनाता है, उसे बना सकता है, उसका रखरखाव कर सकता है और उसकी रक्षा कर सकता है. जब वह टूटता है तो यह नागरिकों के शासन के प्रति नजरिए को ही बदल देता है. अगर चेतावनियों के बावजूद एक पुल गिर सकता है तो और क्या-क्या अनदेखा किया जा रहा है? अगर नियमित निरीक्षण ऐसी विफलताओं को नहीं रोक सकते तो सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली प्रणालियों में क्या विश्वास बचेगा?
विक्रमशिला सेतु न तो निर्माणाधीन परियोजना थी और न ही इसका अभी-अभी उद्घाटन हुआ था. यह एक स्थापित और भारी उपयोग वाला पुल था. और फिर भी यह इस तरह विफल रहा जो इसके धीरे-धीरे कमजोर होते जाने और निरीक्षण में लापरवाही के संकेत देता है.
आधिकारिक स्पष्टीकरण कि पिलर सुरक्षित हैं और केवल एक हिस्सा गिरा है, तकनीकी आश्वासन तो देता है. लेकिन लोगों के लिए इसका कोई खास महत्व नहीं है. उनके लिए महत्वपूर्ण यह है कि एक टूटा हुआ पुल अब यात्रा के लंबे वैकल्पिक रास्तों, आर्थिक व्यवधान और अनिश्चितता के लिए मजबूर कर रहा है.
बिहार इन संकटों पर जो प्रतिक्रिया देता है, उसमें भी एक उभरता हुआ पैटर्न है: राज्य के बाहर की एजेंसियों पर निर्भरता. सेना या बीआरओ (BRO) से मदद मांगने से पुनर्निर्माण में तेजी आ सकती है, लेकिन यह संस्थागत क्षमता पर भी सवाल उठाता है. बाहरी दखल के माध्यम से बुनियादी ढांचे की आपातकालीन मरम्मत, राज्य की अपनी इंजीनियरिंग और प्रशासनिक मशीनरी की तैयारी के बारे में क्या कहती है?
इसका उत्तर, फिर से प्रणालीगत कमजोरी में निहित है. नौकरशाह और इंजीनियर इस श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. वे सेफ्टी एसेसमेंट पर हस्ताक्षर करते हैं, रखरखाव के कार्यक्रमों को मंजूरी देते हैं और शुरुआती चेतावनियों का जवाब देते हैं. जब विक्रमशिला पुल को लेकर चिंताएं जताई गई थीं, तो उन्हें जोखिम के संभावित संकेतों मानना उनकी जिम्मेदारी थी. यहीं जवाबदेही को और कड़ा किया जाना चाहिए.
दो इंजीनियरों को निलंबित करना कहानी का अंत नहीं हो सकता. जांच में निर्णय लेने की पूरी श्रृंखला की जांच होनी चाहिए: मुद्दा किसने उठाया, किसने इसकी समीक्षा की, क्या सिफारिशें की गईं, उन सिफारिशों को निवारक कार्रवाई में क्यों नहीं बदला गया और विफलता के लिए आखिरकार कौन जिम्मेदार है.
एक और कड़वे सच का सामना करने की भी जरूरत है. बुनियादी ढांचे की विफलताएं अक्सर इसलिए बनी रहती हैं क्योंकि इसके परिणाम सीमित होते हैं. इंजीनियरों का तबादला या निलंबन हो सकता है और कुछ मामलों में उन्हें चुपचाप बहाल भी कर दिया जाता है. ठेकेदारों को अस्थाई रूप से ब्लैक-लिस्ट किया जा सकता है. नौकरशाही की जिम्मेदारी उनकी पोस्टों के क्रम और प्रक्रिया के कारण कम हो जाती है. इस प्रकार, सिस्टम बिना किसी बुनियादी बदलाव के विफलता को स्वीकार कर लेता है.
इसे बदलना होगा. अगर दो वर्षों में बार-बार पुलों का ढहना निरीक्षण और जवाबदेही तंत्र के संरचनात्मक सुधार के लिए प्रेरित नहीं करता है, तो समस्या संस्थागत है. बिहार में इंजीनियरिंग विशेषज्ञता की कमी नहीं है. इसमें मानकों को लागू करने, रखरखाव में निरंतरता और चेतावनियों को तत्काल समझने वाली संस्कृति की कमी है.
आने वाले महीनों में, पुल की मरम्मत हो ही जाएगी. तात्कालिक संकट दूर हो जाएगा. लेकिन जब तक राज्य निरीक्षण, जवाबदेही और प्रणालीगत उपेक्षा के गहरे मुद्दों का सामना नहीं करता, तब तक अगला पुल गिरना कोई हैरानी नहीं बल्कि एक सिलसिले की अगली कड़ी होगा.
साल 2001 में बना विक्रमशिला सेतु ने दो दशकों से अधिक समय से पूरे क्षेत्रों का आर्थिक और सामाजिक भार उठाया है. एक तरफ भागलपुर, बांका और झारखंड; दूसरी तरफ कटिहार, पूर्णिया, सहरसा और मधेपुरा. यह बिल्कुल उसी प्रकार का बुनियादी ढांचा है जो निरंतर सतर्कता की मांग करता है.

