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यूपी में BJP ने किए 84 ऑब्ज़र्वर तैनात; क्या है इस माइक्रो मैनेजमेंट का गणित?

BJP ने अपने उत्तर प्रदेश के अपने 84 संगठनात्मक ज़िलों में ऑब्ज़र्वर नियुक्त किए हैं, जहां हाल ही में नए ज़िला अध्यक्ष बनाए गए थे

UP bjp president pankaj chaudhary mission 2027 west up
उत्तर प्रदेश BJP के अध्यक्ष पंकज चौधरी
अपडेटेड 23 जनवरी , 2026

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की घोषणा में एक साल से कम का समय रह गया है. इस लिहाज से सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने जमीनी स्तर पर अपनी तैयारियों की दिशा और गति, दोनों साफ कर दी हैं. ज़िला संगठन से लेकर सामाजिक समीकरणों तक, पार्टी नेतृत्व अब “चेहरा-केंद्रित” राजनीति से आगे बढ़कर “संगठन-पहले” मॉडल को मज़बूत करने में जुट गया है. पिछले महीने केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को यूपी BJP का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद ज़िलों में ऑब्ज़र्वरों की नियुक्ति इसी रणनीतिक बदलाव का पहला ठोस संकेत मानी जा रही है. 

पार्टी ने अपने 84 संगठनात्मक ज़िलों में ऑब्ज़र्वर नियुक्त किए हैं, जहां हाल ही में नए ज़िला अध्यक्ष बनाए गए थे. इन ऑब्ज़र्वरों की भूमिका सिर्फ निगरानी तक सीमित नहीं है. उन्हें ज़िला-स्तरीय पदाधिकारियों, सांसदों, विधायकों और एमएलसी की कोर टीमों के बीच तालमेल बैठाने, गुटबाज़ी पर लगाम लगाने और एक जैसी रणनीति को ज़मीन पर लागू कराने की जिम्मेदारी दी गई है. पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के शब्दों में, “ऑब्ज़र्वर संगठन की आंख और कान होते हैं. वे सुनिश्चित करते हैं कि ज़िला इकाई किसी व्यक्ति या गुट के हिसाब से नहीं, बल्कि पार्टी लाइन के हिसाब से काम करे.” 

BJP नेतृत्व मानता है कि 2024 के लोकसभा चुनावों में सीटों की संख्या 62 से घटकर 33 रह जाना सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दों का असर नहीं था, बल्कि संगठनात्मक ढिलाई और सामाजिक संदेश की कमजोरी भी इसकी वजह बनी. यही कारण है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद ऑब्ज़र्वरों को ज़िलों में भेजने की योजना बनाई गई है. मतदाता सूचियों में नामों की कमी, खासकर उन वर्गों में जिन्हें पार्टी अपना परंपरागत समर्थक मानती रही है, नेतृत्व के लिए चिंता का विषय रही है.

पंकज चौधरी की नियुक्ति के साथ ही यह संदेश भी गया कि पार्टी अब यूपी में लंबे समय तक खिंचने वाली दुविधाओं के दौर से बचना चाहती है. चौधरी पिछले कुछ दिनों से क्षेत्रीय नेतृत्व से फीडबैक लेने के लिए लगातार दौरे कर रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 84 ज़िलों में ऑब्ज़र्वरों की तैनाती उनके इस इरादे को दिखाती है कि वे जल्दी संगठनात्मक नियंत्रण स्थापित करना चाहते हैं, ताकि 2027 की लड़ाई समय से पहले शुरू की जा सके. 

इस संगठनात्मक कवायद के साथ-साथ BJP के भीतर चल रही जातीय राजनीति भी चर्चा के केंद्र में है. खासकर ब्राह्मण राजनीति को लेकर उठ रहे सवालों के बीच आंकड़े एक अलग ही कहानी कहते हैं. यूपी BJP की संगठनात्मक सूची पर नज़र डालें तो 45 प्रमुख पदाधिकारियों में से नौ ब्राह्मण हैं, यानी करीब 20 फीसदी. राज्य में ब्राह्मण आबादी के अनुमानित 11 फीसदी के मुकाबले यह प्रतिनिधित्व लगभग दोगुना है. योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट में भी 54 मंत्रियों में से सात ब्राह्मण हैं, यानी करीब 13 फीसदी.

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि ये आंकड़े उस दावे को कमजोर करते हैं कि BJP सरकार ओर संगठन में ब्राह्मणों को हाशिये पर डाल दिया गया है. एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक, “राम मंदिर आंदोलन के दौर से ही ब्राह्मण BJP की वैचारिक और संगठनात्मक रीढ़ रहे हैं. सवाल प्रतिनिधित्व का नहीं, अपेक्षाओं और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के प्रबंधन का है.” आंकड़ों के लिहाज़ से देखें तो यूपी BJP के 45 संगठनात्मक पदाधिकारियों में से सात ठाकुर समुदाय से हैं, यानी करीब 15 फीसदी. योगी कैबिनेट में भी ठाकुरों की संख्या सात ही है. 

ब्राह्मण और ठाकुर प्रतिनिधित्व में यह लगभग बराबरी BJP की उस रणनीति की ओर इशारा करती है, जिसमें दोनों उच्च जाति स्तंभों को संतुलन में रखा जाए, ताकि कोई भी खुद को अलग-थलग महसूस न करे. ऊंची जातियों से इतर, वैश्य और भूमिहार समुदायों की भी संगठन और सरकार दोनों में मौजूदगी है. संगठन में सात वैश्य और दो भूमिहार पदाधिकारी हैं, जबकि कैबिनेट में पांच वैश्य और दो भूमिहार मंत्री हैं. लेकिन असली संगठनात्मक प्रभुत्व ओबीसी नेतृत्व के हाथों में है. राज्य इकाई के 45 पदाधिकारियों में 12 ओबीसी हैं, जिनमें खुद प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह शामिल हैं. योगी मंत्रिपरिषद में 20 ओबीसी मंत्री हैं, जो कुल संख्या का करीब 37 फीसदी है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि ओबीसी नेतृत्व वाला यह संगठनात्मक कोर BJP को सामाजिक संतुलन साधने में मदद करता है. एक राजनीतिक समाजशास्त्री राजेश्वर कुमार के मुताबिक, “यह सिर्फ संख्या का सवाल नहीं है. अध्यक्ष और संगठन महामंत्री जैसे संस्थागत रूप से मजबूत पदों पर ओबीसी नेताओं की मौजूदगी पार्टी को लंबे समय के लिए एक अलग सामाजिक आधार देती है.” 

इसी सामाजिक समीकरण के भीतर दलित राजनीति BJP के लिए अगला बड़ा फोकस बनकर उभर रही है. संगठनात्मक स्तर पर आठ दलित पदाधिकारी हैं, यानी करीब 18 फीसदी प्रतिनिधित्व. यह राज्य में एससी आबादी के अनुमानित 21 फीसदी से थोड़ा कम है, लेकिन राजनीतिक संदेश के लिहाज़ से अहम है. योगी कैबिनेट में भी सात दलित मंत्री हैं, जो कुल मंत्रियों का लगभग 13 फीसदी है. दलितों पर यह ध्यान ऐसे वक्त में जा रहा है, जब समाजवादी पार्टी अपने पीडीए यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक फॉर्मूले को और आक्रामक तरीके से आगे बढ़ा रही है. 

BJP के रणनीतिकार मानते हैं कि मौजूदा प्रतिनिधित्व पूरी तरह वोटों में तब्दील नहीं हो पाया है, खासकर गैर-जाटव दलितों और पहली बार वोट देने वालों के बीच. यही वजह है कि संगठन और सरकार, दोनों स्तरों पर दलित चेहरों को और प्रतिनिधित्व देने पर विचार हो रहा है. पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, “दलित चेहरे को आगे बढ़ाना सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं होगा. पोर्टफोलियो का महत्व, राजनीतिक हैसियत और ज़मीनी काम, सब पर ध्यान दिया जाएगा.” जानकारी के मुताबिक, बोर्ड और कॉर्पोरेशन में नियुक्तियों से लेकर नगर निकायों में नामांकन तक, दलित प्रतिनिधित्व एक अहम कसौटी होगा.

महिलाएं BJP की दूसरी बड़ी प्राथमिकता बनकर उभरी हैं. पार्टी का आकलन है कि उज्ज्वला, पीएम आवास, मिशन शक्ति जैसी योजनाओं ने महिला मतदाताओं के बीच सकारात्मक माहौल बनाया है, लेकिन इसे संगठनात्मक स्तर पर और मजबूत करने की जरूरत है. ज़िला और मंडल स्तर पर महिला पदाधिकारियों की संख्या बढ़ाने, उन्हें निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने और पंचायत चुनावों में आगे लाने पर गंभीरता से विचार हो रहा है. 

हालांकि, यह पूरी रणनीति ज़मीनी चुनौतियों से मुक्त नहीं है. कानपुर, मुरादाबाद जैसे जिलों में BJP नेताओं के बीच चल रहे अंदरूनी विवाद पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं. कानपुर में संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल की कमी की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं. मुरादाबाद में भी स्थानीय नेतृत्व के बीच खींचतान ने पार्टी के अभियान को कमजोर किया है. एक वरिष्ठ BJP नेता स्वीकार करते हैं, “ऑब्ज़र्वर इसलिए ज़रूरी हैं, क्योंकि कई ज़िलों में संगठन और जनप्रतिनिधि अलग-अलग दिशा में काम कर रहे हैं. अगर इसे अभी नहीं संभाला गया, तो चुनाव के वक्त नुकसान तय है.” 

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