
ऐसा माना जाता है कि देश में ज्यादातर मुसलमान भाजपा के खिलाफ वोट करते हैं और उनकी पहली पसंद इस बार इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार हैं.
मगर बिहार में इंडिया गठबंधन के कम से कम चार ऐसे उम्मीदवार हैं, जिन्हें वोट करने को लेकर मुसलमान दुविधा में हैं. आइए जानते हैं, ये उम्मीदवार कौन-कौन हैं.
1. सुमन कुमार महासेठ (झंझारपुर)
इंडिया गठबंधन की तरफ से विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) ने इन्हें झंझारपुर की सीट से अपना प्रत्याशी बनाया है. सुमन महासेठ आरएसएस कार्यकर्ता हैं और लंबे समय तक भाजपा में रहे. भाजपा के टिकट पर वे विधान परिषद् का चुनाव लड़कर जीतते भी रहे. एक बार पहले भी इन्होंने चुनाव लड़ने के लिए भाजपा छोड़ दी थी. मगर अप्रैल, 2023 में भाजपा में वापस आ गए. इनकी उम्मीदवारी को लेकर मुसलमान सशंकित हैं. इन्हें उम्मीदवार बनाये जाने के बाद से आरएसएस की वर्दी में इनकी तसवीर लगातार सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. झंझारपुर में पूर्व राजद (राष्ट्रीय जनता दल) नेता गुलाब यादव भी बसपा से चुनावी मैदान में हैं. मुसलमान मतदाता यह भी सोच रहे हैं कि क्या वे गुलाब यादव को वोट दें?

2. दीपक यादव (वाल्मीकिनगर)
इस सीट से राजद ने दीपक यादव को टिकट दिया है. तिरुपति शुगर मिल के एमडी दीपक यादव मार्च, 2024 तक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सदस्य थे. उन्होंने मार्च में पीएम मोदी के चंपारण आगमन को लेकर भी जोर-शोर से अभियान चलाया था. भाजपा द्वारा कराये गये यदुवंशी महासम्मेलन में भी अपने समर्थकों के साथ पटना पहुंचे थे. मगर वाल्मीकिनगर से पार्टी द्वारा टिकट न मिलने की संभावना को देखते हुए उन्होंने भाजपा से त्यागपत्र दे दिया और सात अप्रैल को राजद में शामिल हो गये. हालांकि दीपक यादव उग्र हिंदुत्ववादी नहीं हैं, फिर भी भाजपा की पृष्ठभूमि को देखते हुए मुसलमान मतदाता उन्हें वोट देने से हिचक रहे हैं. वहां से जदयू उम्मीदवार सुनील कुमार एनडीए की तरफ से मैदान में हैं.

3. अजय निषाद (मुजफ्फरपुर)
अजय निषाद 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में मुजफ्फरपुर से भाजपा के टिकट पर जीते. इस बार भाजपा ने उन्हें टिकट न देकर राजभूषण चौधरी को उम्मीदवार बनाया तो उन्होंने पार्टी छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया. कांग्रेस ने उन्हें मुजफ्फरपुर से अपना उम्मीदवार बनाया है. मुसलमानों की अजय निषाद से नाराजगी इस बात को लेकर है, कि कोरोना के वक्त उन्होंने कहा था - कोरोना फैलाने वाले मुसलमानों से आतंकियों जैसा व्यवहार करना चाहिए. इसलिए जब उन्हें टिकट दिया गया तो मुजफ्फरपुर की सड़कों पर उनका खूब विरोध हुआ. मगर बाद में उन्होंने अपने इस बयान के लिए सार्वजनिक माफी मांगी. हालांकि मुसलमानों ने उनके प्रति अपना मन कितना साफ किया है, यह देखने वाली बात होगी.
4. आकाश कुमार सिंह (महाराजगंज)
कांग्रेस के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह के पुत्र आकाश कुमार सिंह कांग्रेस के ही टिकट से महाराजगंज से उम्मीदवार हैं. मुसलमानों की उनको लेकर नाराजगी इस बात को लेकर है, क्योंकि उन्होंने सीएए कानून का सार्वजनिक समर्थन किया था. सीएए कानून को लेकर मुसलमानों का रुख हमेशा विरोध वाला रहा है. हालांकि इनके अलावा चंद्रहास चौपाल भी पहले भाजपा में रहे हैं. लेकिन 2020 के विधानसभा चुनाव के वक्त ही वे राजद में आ गये थे, इसलिए उनका ऐसा विरोध नहीं है, जैसा इन चारों उम्मीदवारों का है.

एक फेसबुक यूजर साकिब इन चारों उम्मीदवारों के बारे में एक पोस्ट में कहते हैं, "इनके बदले एनडीए (भाजपा की अगुवाई वाला गठबंधन) के उम्मीदवारों को वोट देना ठीक है. क्योंकि एनडीए वाले तो सार्वजनिक रूप से मुस्लिम विरोधी हैं. चोला बदलने वाले नफरतियों को वोट देना किसी तरह ठीक नहीं."
वहीं बिहार में मुसलमानों की ऐतिहासिक विरासत पर काम करने वाले उमर कहते हैं, "यह बिल्कुल सही बात है. मैं तो कहता हूं, इनके साथ-साथ जहानाबाद में भी राजद के बदले जदयू उम्मीदवार को वोट दिया जाये. क्योंकि राजद के उम्मीदवार का जैसा इतिहास रहा है, वह जीतेगा तो कब्रिस्तान की जमीन पर कब्जा करेगा."
उमर कहते हैं कि एक तो राजद ने मुसलमानों को बहुत कम टिकट दिये और फिर इंडिया गठबंधन ऐसे लोगों को उम्मीदवार बना रहा है. सीएए-एनआरसी आंदोलन में सबसे अधिक जेल जाने वाले बिहार के युवा हैं. वे अभी तक जेल में हैं. मगर तथाकथित सेकुलर पार्टियों ने एक बार भी नहीं कहा कि अगर सरकार बनी तो सीएए-एनआरसी विरोधी आंदोलन की वजह से जेल में बंद युवाओं को छोड़ा जायेगा.
दरअसल, बिहार में युवा मुसलमानों का एक बड़ा तबका ऐसा है जो इंडिया गठबंधन को वोट देने के लिए खुद को मजबूर नहीं महसूस करता. वो चाहता है अगर हम आपको वोट करते हैं तो आप हमारा सम्मान करें. हमें टिकट दें, हमारे मुद्दे उठायें. ऐसे मुसलमान युवा इन उम्मीदवारों का लगातार विरोध कर रहे हैं.
इनमें सबसे अधिक विरोध वीआईपी उम्मीदवार सुमन महासेठ का हो रहा है. हालांकि वीआईपी के प्रवक्ता इस मसले पर कहते हैं कि अगर कोई दूसरी विचारधारा का व्यक्ति अपनी सोच छोड़ हमारे साथ आता है, तो यह हमारे विचार की जीत है. हमें उसका स्वागत करना चाहिए. मगर लोग उनकी बातों से कितने सहमत हैं, यह मतदान के वक्त ही समझ आयेगा.

