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झारखंड में एक हाथी ले चुका 17 लोगों की जान! वन विभाग कुछ कर क्यों नहीं पा रहा?

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में इस हाथी ने सिर्फ एक हफ्ते के भीतर ग्रामीणों के ऊपर 12 बार हमला किया है

सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 8 जनवरी , 2026

सारंडा जंगल झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में पड़ते हैं.  इस पूरे इलाके में इन दिनों दांत वाले एक हाथी का आतंक फैला हुआ है. इस बेकाबू हाथी ने 6 दिसंबर की रात बावड़िया गांव में पुआल में सो रहे एक परिवार पर हमला कर 5 लोगों सहित कुल छह लोगों को कुचल कर मार डाला. इनमें चार बच्चे भी शामिल हैं.

जिस परिवार पर हाथी ने हमला किया वे यहीं रह रहे थे

हाथी का आतंक सिर्फ एक घटना का नतीजा नहीं है. यह हाथी कोल्हान और चाईबासा फॉरेस्ट डिवीजन की सात फॉरेस्ट रेंज में बीते 7 दिनों के भीतर 12 बार लोगों पर हमले कर चुका है. इनमें अब तक कुल मिलाकर 17 ग्रामीण अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि 10 लोग घायल हैं. यह हाथी 110 किलोमीटर के दायरे में एक सर्कुलर मूवमेंट कर रहा है. जंगल में रह रहे आदिवासी रात-रातभर आग जला कर खुद की और अपने घरों की रखवाली करने को मजबूर हैं. 

इन 17 मौतों के बाद अब जाकर वन विभाग ने हाथी को ट्रैंकुलाइज (बेहोश करना) कर दूसरी जगह शिफ्ट करने का फैसला किया है.  लेकिन अब तक उसकी सटीक लोकेशन ट्रैक नहीं की जा सकी है. इन घटनाओं के बाद बंगाल से आई हाथी हरकारा टीम, स्थानीय वनकर्मी और ओडिशा से वाइल्ड लाइफ सेंचुरी की टीम इलाके में तैनात की गई है. रिलायंस फाउंडेशन की पशु पुनर्वास संस्था वनतारा से भी संपर्क किया गया है, लेकिन अभी तक वहां से कोई जवाब नहीं मिला है.

इन हमलों का पैटर्न बेहद खतरनाक है. हाथी सिर्फ रात में निकलता है और दिन निकलते ही जंगल में छिप जाता है. रात में एक घटना को अंजाम देने के बाद वह रुकता नहीं, आगे बढ़ता जाता है. रास्ते में पड़ने वाले वनग्रामों की झोपड़ियां, खलिहान ही उसके मुख्य निशाने बन रहते हैं. 

इन सब के बीच असल सवाल यह है कि क्या झारखंड वन विभाग के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो इन परिस्थियों से निपटने के लिए बनाई गई हो. जबकि इस तरह की घटना राज्य में पहले भी हो चुकी हैं. क्या वजह है कि राज्य वन विभाग को दूसरे राज्यों या फिर वनतारा जैसी संस्थाओं से मदद की दरकार पड़ गई.

प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) पारितोष उपाध्याय कहते हैं, "हमारे पास ट्रैंकुलाइज करने के लिए जरूरी उपकरण तो हैं, लेकिन  हाथी को दूसरी जगह ले जाने के लिए हैवी व्हीकल नहीं है. इसके लिए हमने आगरा की SOS संस्था से संपर्क किया है. वे हमारी मदद के लिए आ रहे हैं. हालांकि हमने वनतारा से भी संपर्क किया है, लेकिन दूरी अधिक होने की वजह से शायद वे जल्दी न आ पाएं.”

हाथी के हमलों में जिन लोगों के परिजनों की मौत हुई है, वन विभाग उन्हें राहत के तौर पर मुआवजा भी देता है, हालांकि उसकी प्रक्रिया लंबी होती है और उसे पूरा होने में एक महीने से अधिक का वक्त लग सकता है.

बावड़ियां गांव में हाथी के हमले में मारे गए लोगों के शव पोस्टमार्टम के लिए ले जाए जाते हुए
बावड़ियां गांव में हाथी के हमले में मारे गए लोगों के शव पोस्टमार्टम के लिए ले जाए जाते हुए

आखिर हाथी ऐसा क्यों कर रहा है 

राज्य पूर्व PCCF एल.आर. सिंह के मुताबिक मेल हाथी जब एडल्ट होता है, तब उसके अंदर टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन का स्तर बहुत ज्यादा होता है. उसे हर्ड यानी हाथियों का झुंड अपने ग्रुप से बाहर कर देता है. ऐसे में उसका इस तरह का व्यवहार सामान्य बात है. इसके अलावा इस दौरान हाथी के कान के पास से टेंपोरल ग्लैंड से एक लिक्विड गिरता है. इस लिक्विड की गंध बहुत तेज होता है. जंगलों में लोग इसे जमा करके हाथी भगाने का काम भी करते हैं. इसकी गंध से झुंड में जा रहे हाथियों को लगता है कि यहां कोई सिंगल हाथी जिसका टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन तेज है, और वह आसपास से गुजर रहा है. ऐसे में वे भी भाग जाते हैं. 

एक एडल्ट हाथी डेढ़ से दो महीने तक इस हालत में रहता है. इस दौरान वह बिना किसी वजह के भी हिंसक व्यवहार करता है. सारंडा के अंदर अभी जो हाथी हमला कर रहा है उससे बचने का एकमात्र उपाय है कि उसे ट्रैंकुलाइज (बेहोश) किया जाए. या फिर जंगल के अंदर भगाया जाए जहां इसे कोई फीमेल हाथी मिल जाए और ये मेट कर सके. सिंह के मुताबिक चूंकि ट्रैंकुलाइज करके भी हाथी को ज्यादा दिन एक बाड़ेनुमा जगह में नहीं रख सकते तो ऐसे में उसे जंगल के भीतर भगाना ही अंतिम उपाय है. 

क्या हाथी की जान लेना भी विकल्प है? एलआर सिंह एक घटना का जिक्र करते हैं. वे बताते हैं, "साल 2018 में साहेबगंज जिले में एक ऐसा ही मामला सामने आया था और एक हाथी ने 15 लोगों को मार दिया था. चूंकि वह इलाका पहाड़िया आदिवासियों का था. हाथी की दहशत से बड़ी संख्या में आदिवासी पहाड़ों से नीचे उतर कर आंदोलन करने लगे थे. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मैंने हैदराबाद से शूटर बुलाए थे. फिर उस हाथी को मारने का आदेश देना पड़ा था.”

हालांकि सिंह के मुताबिक दुर्लभतम मामलों में ही ऐसे फैसले लिए जाते हैं क्योंकि हाथी को मारने की अनुमति सिर्फ PCCF ही दे सकते हैं. उसमें भी हाथी को आईडेंटिफाई करके लिखित आदेश देना होता है. इसके लिए उसके पग मार्क (पैरों के निशान) के आधार पर निशानदेही होती है और फिर आखिरी फैसला होता है.

बीते 18 सालों में 1270 लोगों की हुई है मौत 

PCCF परितोष उपाध्याय की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक पिछले 18 सालों के दौरान झारखंड में हाथियों के हमलों में करीब 1270 लोगों की जान गई है. इस दौरान लगभग 150 हाथी भी अपनी जान गंवा चुके हैं. झारखंड में फिलहाल 550 से 600 के करीब हाथी हैं. इनमें एक ग्रुप पलामू में सक्रिय है, दूसरा झारखंड के दक्षिणी छोटानागपुर में सक्रिय है.  उनके अनुसार हाथी आबादी वाले क्षेत्रों में लगातार आ रहे हैं, इसलिए इंसान और हाथियों का संघर्ष तेज हो गया है. खासकर जंगल से सटे आबादी वाले इलाकों में हाथी दिन भर जंगल में रहते हैं, लेकिन रात के समय आबादी वाले इलाकों में पहुंच जाते हैं. 

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