अयोध्या में रामपथ पर हनुमानगढ़ी के सामने से निकलकर कारसेवकपुरम की ओर जाती एक संकरी सड़क कभी राम मंदिर आंदोलन की सबसे सक्रिय धुरी मानी जाती थी. डेढ़ किलोमीटर लंबे इस रास्ते के अंत में स्थित विश्व हिंदू परिषद (विहिप) का कार्यालय तीन दशक से अधिक समय तक उन रणनीतियों, बैठकों और निर्णयों का केंद्र रहा, जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन को आकार दिया.
रामायण मर्मज्ञ पंडित रामकिंकर उपाध्याय के रामायणम आश्रम से सटे इस परिसर में आज भी एक कमरा ऐसा है, जहां से राम मंदिर आंदोलन के लंबे इतिहास की अनेक परतें जुड़ी हुई हैं. यह कमरा श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का है. हाल के महीनों में राम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे में कथित अनियमितताओं और उससे जुड़ी जांच की खबरों ने चंपत राय को एक बार फिर सुर्खियों के केंद्र में ला खड़ा किया है.
ट्रस्ट के सबसे प्रभावशाली पदाधिकारियों में गिने जाने वाले चंपत राय की भूमिका को लेकर सवाल भी उठे हैं और उनके समर्थकों की ओर से उनका बचाव भी किया गया है. लेकिन इतना तय है कि राम मंदिर आंदोलन, रामजन्मभूमि मुकदमे, मंदिर निर्माण और मंदिर प्रबंधन की कहानी लिखी जाएगी तो चंपत राय उसका एक केंद्रीय पात्र होंगे.
समय के साथ कारसेवकपुरम से जुड़े चेहरे बदलते गए, लेकिन चंपत राय (80) वहीं बने रहे. वर्ष 1991 में संघ के क्षेत्रीय संगठन मंत्री के रूप में अयोध्या पहुंचे चंपत राय ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद तो उन्होंने लगभग स्थाई रूप से कारसेवकपुरम को ही अपना कार्यक्षेत्र बना लिया. उनके कक्ष में वर्षों तक रामजन्मभूमि मुकदमे से जुड़ी फाइलें, नक्शे, दस्तावेज और साक्ष्य भरे रहते थे. अदालत में सुनवाई के दौरान वकीलों को दस्तावेज उपलब्ध कराना, तथ्यों की पड़ताल करना और हर तारीख पर मौजूद रहना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था. यही कारण है कि उनके करीबी उन्हें प्यार से ‘रामलला का पटवारी’ कहकर पुकारते हैं.
रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में चली ऐतिहासिक सुनवाई के दौरान चंपत राय उन चुनिंदा लोगों में थे जो लगभग हर दिन अदालत में मौजूद रहे. विहिप के वरिष्ठ नेता ओमप्रकाश सिंघल के साथ उन्होंने मुकदमे की कानूनी तैयारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अदालत में पेश किए गए अनेक दस्तावेजों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के संकलन में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही. राम मंदिर आंदोलन में उनकी पहचान केवल एक संगठनकर्ता की नहीं रही. वे उन लोगों में शामिल रहे जिन्होंने आंदोलन के वैचारिक, कानूनी और प्रबंधन संबंधी पक्षों को एक साथ साधने का प्रयास किया. यही वजह रही कि फरवरी 2020 में केंद्र सरकार ने श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन के समय उन्हें महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई.
ट्रस्ट के गठन के बाद मंदिर निर्माण की रूपरेखा तय करने, निर्माण एजेंसियों के साथ समन्वय स्थापित करने, प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तैयारियों से लेकर देश-विदेश के श्रद्धालुओं और विशिष्ट अतिथियों से संवाद तक, हर महत्वपूर्ण प्रक्रिया में उनकी केंद्रीय भूमिका रही. 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के भव्य आयोजन के दौरान भी चंपत राय सबसे सक्रिय चेहरों में थे. हजारों अतिविशिष्ट अतिथियों को निमंत्रण भेजने, कार्यक्रमों की रूपरेखा तय करने और आयोजन की बारीक व्यवस्थाओं पर नजर रखने की जिम्मेदारी उन्होंने संभाली. उस दौर में उन्हें ट्रस्ट का अनौपचारिक प्रवक्ता भी माना जाता था. मीडिया के अधिकांश सवालों का जवाब वही देते थे और मंदिर निर्माण से जुड़े विवादों या जिज्ञासाओं पर ट्रस्ट का पक्ष रखते थे.
चंपत राय का जीवन किसी पारंपरिक धार्मिक नेता की तरह नहीं रहा है. उनका जन्म 18 नवंबर 1946 को बिजनौर जिले के नगीना कस्बे के एक साधारण बंसल परिवार में हुआ. पिता रामेश्वर प्रसाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे और परिवार में संघ की विचारधारा का वातावरण था. दस भाई-बहनों वाले परिवार में चंपत राय दूसरे नंबर पर थे. प्रारंभिक शिक्षा नगीना में हुई. बाद में उन्होंने मेरठ कॉलेज से बीएससी और वर्धमान कॉलेज, बिजनौर से एमएससी की पढ़ाई की. कुछ समय तक उन्होंने अध्यापन कार्य भी किया. रोहतक और धामपुर के कॉलेजों में फिजिक्स के लेक्चरर के रूप में उन्होंने काम किया. लेकिन शिक्षण का यह जीवन अधिक समय तक नहीं चला.
1980-81 के आसपास उन्होंने नौकरी छोड़ दी और स्वयं को पूरी तरह संघ कार्य के लिए समर्पित कर दिया. प्रचारक जीवन अपनाने का उनका निर्णय उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ. इसके बाद उनका अधिकांश समय संगठन विस्तार, वैचारिक गतिविधियों और हिंदू संगठनों के साथ काम करने में बीता.
आपातकाल का दौर भी उनके जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय है. वर्ष 1975 में वे धामपुर के आरएसएम कॉलेज में प्रवक्ता थे, जब उन्हें गिरफ्तार किया गया. परिवार के लोग बताते हैं कि गिरफ्तारी के समय माता-पिता ने उनका तिलक कर विदा किया था. लगभग डेढ़ वर्ष तक जेल में रहने के बाद वे और अधिक सक्रियता के साथ संघ कार्य में जुट गए. पश्चिमी उत्तर प्रदेश उनका शुरुआती कार्यक्षेत्र रहा. देहरादून, सहारनपुर और मेरठ में संगठन की जिम्मेदारियां निभाने के बाद 1986 में उन्हें विश्व हिंदू परिषद का प्रांत संगठन मंत्री बनाया गया. 1991 में वे अयोध्या पहुंचे और यहीं से उनका नाम राम मंदिर आंदोलन के साथ स्थाई रूप से जुड़ गया.
90 के दशक में जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था, तब चंपत राय विहिप नेता अशोक सिंघल की टीम के भरोसेमंद सदस्यों में शामिल थे. आंदोलन की रणनीति हो, कारसेवकों का समन्वय हो या विभिन्न संगठनों के बीच संवाद, चंपत राय हर स्तर पर सक्रिय दिखाई देते थे. मंदिर निर्माण की कहानी में भी उनका एक अलग अध्याय है. बताया जाता है कि अशोक सिंघल ने वर्षों पहले देश की प्रमुख निर्माण कंपनी एलएंडटी के वरिष्ठ अधिकारियों से राम मंदिर निर्माण में सहयोग का आग्रह किया था. जब मंदिर निर्माण का समय आया और विभिन्न कंपनियों ने अपने प्रस्ताव दिए, तब चंपत राय ने उसी पुराने संवाद को आगे बढ़ाया. आखिरकार एलएंडटी मंदिर निर्माण परियोजना का प्रमुख हिस्सा बनी. इस निर्णय को अशोक सिंघल की भावना के सम्मान के रूप में भी देखा गया.
राम मंदिर बनने के बाद चंपत राय की भूमिका आंदोलनकारी से प्रशासक की हो गई. अब उनके सामने चुनौती मंदिर निर्माण नहीं, बल्कि मंदिर प्रबंधन, श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या, दान व्यवस्था, सुरक्षा, विस्तार योजनाओं और ट्रस्ट की पारदर्शिता को लेकर थी. इसी दौर में उनके समर्थक और आलोचक दोनों सक्रिय दिखाई देते हैं. समर्थक उन्हें वह व्यक्ति बताते हैं जिसने जीवन के पांच दशक राम मंदिर आंदोलन को समर्पित कर दिए. आलोचक कहते हैं कि ट्रस्ट में निर्णय प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई और लगभग हर महत्वपूर्ण निर्णय में अंतिम प्रभाव उन्हीं का दिखाई देता था.
इसी पृष्ठभूमि में हाल में सामने आए चढ़ावा विवाद ने चंपत राय को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. जांच एजेंसियां और संबंधित संस्थाएं पूरे प्रकरण की पड़ताल कर रही हैं. विवाद के सामने आने के बाद स्वाभाविक रूप से सवाल ट्रस्ट की कार्यप्रणाली और निगरानी तंत्र पर उठे हैं. चूंकि महासचिव के रूप में चंपत राय लंबे समय से ट्रस्ट के संचालन का सबसे सक्रिय चेहरा रहे हैं, इसलिए बहस का केंद्र भी वही बन गए हैं.
हालांकि अभी तक किसी जांच में उनके सीधे-सीधे शामिल होने का नतीजा सामने नहीं आया है लेकिन जवाबदेही और प्रशासनिक निगरानी को लेकर चर्चाएं लगातार जारी हैं. दूसरी तरफ 80 वर्ष की उम्र पार कर चुके चंपत राय आज भी कारसेवकपुरम में उसी सादगी से रहते हैं, जिसके लिए वे जाने जाते हैं.
राम मंदिर आंदोलन के इतिहास में अनेक बड़े नाम दर्ज हैं, लेकिन कुछ लोग मंच पर कम और पर्दे के पीछे अधिक दिखाई देते हैं. चंपत राय उन्हीं में से एक हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि अब वे पर्दे के पीछे नहीं हैं. राम मंदिर बन चुका है, आंदोलन इतिहास बन चुका है और ट्रस्ट की कार्यप्रणाली वर्तमान का विषय है. ऐसे में चंपत राय का मूल्यांकन एक आंदोलनकारी के रूप में नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के रूप में हो रहा है जिसने आंदोलन को मंदिर तक पहुंचाया और अब मंदिर व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाली.

