इन दिनों कच्छ के विशाल बन्नी इलाके में वहां रहने वाले किसान एक नई सौर ऊर्जा परियोजना का विरोध कर रहे हैं. यह विरोध प्रदर्शन अब प्रशासन के साथ टकराव में बदल गया है. किसानों के इस प्रोटेस्ट के कारण एक नया सवाल उठने लगा है कि आखिर हरित ऊर्जा के नाम पर किस प्रकार की भूमि को खोना स्वीकार्य है?
अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस यानी 22 मई के दिन कच्छ का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर था. इस वक्त कच्छ के 16 गांवों के करीब 500 से ज्यादा पशुपालकों और अन्य ग्रामीणों ने इकट्ठा होकर NTPC की प्रस्तावित सौर ऊर्जा परियोजना के खिलाफ प्रदर्शन किया.
ग्रामीण और पर्यावरण संरक्षणवादी लोग मिलकर इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इस परियोजना के लिए जिस जमीन को चुनाव हुआ है वह जगह कई स्थानीय प्रजातियों का आश्रय स्थल है. इतना ही नहीं यह जगह प्रवासी पक्षियों को भी आकर्षित करती है. बन्नी के घास के मैदानों में स्थित छारी-ढांड आर्द्रभूमि संरक्षण अभ्यारण्य भी है जिसे जनवरी में रामसर संरक्षित स्थल घोषित किया गया था.
दरअसल रामसर स्थल अंतरराष्ट्रीय महत्व की ऐसी आर्द्रभूमियां (Wetlands) हैं, जिन्हें पर्यावरण संरक्षण के लिए 'रामसर कन्वेंशन' के तहत मान्यता दी गई है. ग्रामीणों का आरोप है कि आर्द्रभूमि के पास भारी मशीनरी के कारण इस पूरे इलाके में रहने वाले कई तरह के जैव प्रजातियों पर बुरा असर पड़ेगा. इस परियोजना के लिए जिस भूमि का सीमांकन किया जा रहा है, उसमें पारंपरिक बस्तियां, खेत, गांव के सार्वजनिक क्षेत्र और यहां तक कि कब्रिस्तान भी शामिल हैं.
NTPC ने 2023 में नखत्राणा तालुका के फुले गांव में सर्वे नंबर 60/भाग-1 में 578 हेक्टेयर सरकारी भूमि के आवंटन के लिए आवेदन किया था. सूत्रों के मुताबिक स्थानीय ग्रामीणों ने अभी तक इस परियोजना के लिए अपनी सहमति नहीं दी है जो परियोजना को साकार करने के लिए एक आवश्यक शर्त है.
फुले गांव के अलावा, ताल, लैयारी, मोतीचूर, बुरकल, छचला, भगड़िया, जटावीरा और शेरवा गांव के लोगों ने वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत इन्हीं घास के मैदानों पर 'सामुदायिक वन संसाधन' के दावे दायर किए हैं.
उप-विभागीय मजिस्ट्रेट के 2019 के रिकॉर्ड में चेतावनी दी गई थी कि वैज्ञानिक पारिस्थितिक मूल्यांकन के बिना रिजर्व के अंदर और आसपास औद्योगिक परियोजनाओं को मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए. बन्नी इलाके की अर्थव्यवस्था पशुपालन पर आधारित है. निवासियों का कहना है कि विवादित भूमि पर लगभग 3,000 मवेशी चरते हैं और स्थानीय दूध उत्पादन का 60 फीसद हिस्सा यहीं से आता है.
कच्छ के वन्यजीव फोटोग्राफर और संरक्षक अशोक चौधरी ने कहा, "परियोजना स्थल रामसर संरक्षित आर्द्रभूमि से लगभग 700 मीटर दूर है. इस चरागाह भूमि का उपयोग केवल एक गांव के जरिए नहीं किया जाता है बल्कि बाहरी गांवों के चरवाहे भी इस पर निर्भर हैं.” अशोक कई वर्षों से इस आंदोलन से जुड़े हुए हैं.
उन्होंने आगे बताया, “बिजली संयंत्र की सटीक जगह एक उथली समतल भूमि है, जहां मानसून के दौरान पानी जमा हो जाता है. पानी उतरने पर यहां खास तरह की घास उगती है, जिस पर स्थानीय ऊंट पलते-बढ़ते हैं. करीब 2,500 ऊंट यहां प्रजनन और बच्चे पैदा करने आते हैं.”
छारी-ढांड के 80 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र आर्द्र घासभूमि है. यह क्षेत्र कच्छ में पाई जाने वाली लगभग 300 पक्षी प्रजातियों में से 275 का घर है, जिनमें सारस, फ्लेमिंगो, पेलिकन्स, पेंटेड स्टॉर्क, स्पूनबिल्स, हैरियर और इंपीरियल ईगल शामिल हैं. हर साल सर्दियों में करीब 40,000 सामान्य सारस का इस क्षेत्र में बसेरा होता है. रूस और मध्य एशिया से 15-20 दिनों की उड़ान के बाद यहां कई सारी पक्षियां पहुंचते हैं.
पक्षी वैज्ञानिक डॉ. असद रहमानी ने 1981 से छारी-ढांड का अध्ययन किया है. उन्होंने चेतावनी दी है कि सौर पैनल रात में 'झील प्रभाव' (lake effect) पैदा करते हैं. इससे उड़ते हुए पक्षी भ्रम में पड़ जाते हैं और पैनलों से टकराकर मर जाते हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि ऊंची वोल्टेज वाली ट्रांसमिशन लाइनें (बिजली की लाइनें) खुद में पक्षियों के लिए बड़े खतरे हैं और इनसे पक्षियों की मौत आम बात है. स्थानीय निवासी यह भी बता रहे हैं कि इस परियोजना से किरो हिल नामक जगह को खतरा है. यह एक भू-वैज्ञानिक स्थल है. जहां जीवाश्म पाए जाते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि आर्द्रभूमि पृथ्वी की भूमि के 6 फीसद से भी कम भाग को कवर करती है लेकिन ये भूजल को रिचार्ज करती हैं. ये क्षेत्र अक्सर प्रदूषकों को फिल्टर करती हैं, बाढ़ को रोकती हैं और बाकी जंगलों की तुलना में सबसे ज्यादा कार्बन को अवशोषित करती है.
मरुस्थल की मौसमी आर्द्रभूमियां जैसे छारी-ढांड बेहद नाजुक होती हैं. एक साधारण बाड़ या बिजली की ट्रांसमिशन लाइन भी हजारों साल से चली आ रही जल-चक्र और जीव-जंतुओं के व्यवहार को हमेशा के लिए बदल सकती है.
स्थानीय विधायक प्रद्युम्न सिंह जडेजा के नेतृत्व में ग्रामीण इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं. गांववालों का कहना है कि वे लंबे समय तक सत्याग्रह करने और गुजरात हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.

