scorecardresearch

बंगाल में SIR ने कैसे BJP के मतुआ वोट-बैंक को खतरे में डाल दिया है?

बंगाल में जिन हाशिए के समुदायों को साथ लेकर BJP ने अपना दायरा बढ़ाया था, अब फाइनल वोटर लिस्ट के बाद उसी वोट-बैंक के खिसकने का खतरा मंडरा रहा है

पश्चिम बंगाल में SIR के खिलाफ प्रोटेस्ट
पश्चिम बंगाल में SIR के खिलाफ प्रोटेस्ट
अपडेटेड 5 मार्च , 2026

पश्चिम बंगाल में 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) के बाद फाइनल वोटर लिस्ट जारी होने से राज्य के उन हिस्सों में एक नई राजनीतिक अनिश्चितता पैदा हो गई है, जो कभी BJP के लिए चुनावी रूप से एकदम सुरक्षित माने जाते थे. जिन विधानसभा क्षेत्रों में सबसे ज्यादा नाम काटे गए हैं या जांच के दायरे में रखे गए हैं, अगर उन पर करीब से गौर करें तो एक ऐसा पैटर्न दिखता है जिसके बड़े राजनीतिक मायने हैं.

सबसे ज्यादा नाम कटने वाले टॉप 10 विधानसभा क्षेत्रों में से नौ पर 2021 के विधानसभा चुनाव में BJP ने जीत दर्ज की थी: डाबग्राम-फुलबाड़ी (16,491), बगदाह (15,303), शांतिपुर (8,048), बनगांव उत्तर (7,926), राणाघाट दक्षिण (7,126), राणाघाट उत्तर पूर्व (6,404), राणाघाट उत्तर पश्चिम (6,704), चकदाह (5,864) और सिलीगुड़ी (5,240).

ये सीटें दक्षिण बंगाल और नदिया-उत्तर, 24 परगना बेल्ट में BJP की बड़ी कामयाबी का एक बहुत अहम हिस्सा थीं. इन टॉप 10 में से केवल हाबरा (5,587) सीट ही तृणमूल कांग्रेस (TMC) बचा पाई थी, जहां से ज्योतिप्रिय मल्लिक जीते थे.

हालांकि, तब से लेकर अब तक इस इलाके में BJP की पकड़ पहले ही कुछ कमजोर हो चुकी थी. बाद में हुए उपचुनावों में बगदाह और शांतिपुर सीटें TMC के खाते में चली गईं, जबकि BJP के टिकट पर राणाघाट दक्षिण जीतने वाले मुकुट मणि अधिकारी सत्ताधारी TMC में शामिल हो गए.

इन झटकों के बावजूद, इस इलाके को लगातार BJP का गढ़ ही माना जाता रहा है, और 2024 के लोकसभा चुनावों में इसके प्रदर्शन ने इस बात पर मुहर भी लगाई. उस चुनाव में, BJP ने हाबरा समेत लगभग इन सभी विधानसभा क्षेत्रों में अच्छी-खासी बढ़त हासिल की थी. इस प्रदर्शन से ऐसा लगा कि 2021 के बाद हुई बगावत और उपचुनावों की हार से उपजी चिंताएं अब शांत हो गई हैं. लेकिन जो 'स्थिरता' उस वक्त दिख रही थी, वह अब फाइनल वोटर लिस्ट से पैदा हुई अनिश्चितता के बिल्कुल उलट खड़ी है.

SIR प्रक्रिया की राजनीतिक संवेदनशीलता इन क्षेत्रों के सामाजिक ताने-बाने में छिपी है. इन 10 में से कम से कम सात विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां मतुआ समुदाय का दबदबा है या उनका भारी प्रभाव है. पिछले एक दशक में यह समुदाय बंगाल में BJP के सबसे भरोसेमंद वोट-बैंक में से एक बनकर उभरा है. 2014 के बाद से इस बेल्ट में पार्टी के उभार का सीधा कनेक्शन मतुआ वोटों के एकजुट होने से रहा है, जिसकी बुनियाद नागरिकता, कानूनी मान्यता और सांस्कृतिक समावेश के वादों पर टिकी है.

लेकिन, वोटर लिस्ट की इस प्रशासनिक जांच ने समुदाय के भीतर पुरानी चिंताओं को फिर से हवा दे दी है. मतुआ परिवारों में अक्सर एक जिले से दूसरे जिले में जाने, पुराने कागजातों की कमी और शरणार्थी इतिहास जैसी बातें आम हैं, जो उनके लगातार वोटर रजिस्ट्रेशन से भी पुरानी हैं. ये वजहें उन्हें वोटर लिस्ट रिवीजन के दौरान नाम कटने, आपत्तियों और वेरिफिकेशन से बाहर होने के मामले में सबसे ज्यादा कमजोर बनाती हैं.

बगदाह, बनगांव उत्तर, राणाघाट के तीनों हिस्सों और चकदाह जैसी सीटों पर, अगर मतुआ वोटर्स की भागीदारी में थोड़ी सी भी रुकावट आती है, तो इसके बहुत बड़े राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं. 2021 में इन कई सीटों पर BJP की जीत कोई एकतरफा नहीं थी, बल्कि यह लगभग पूरी तरह से मतुआ वोटों के एकजुट होने पर टिकी थी. इन इलाकों में पार्टी के पास इतनी ही ताकत वाला कोई दूसरा सामाजिक गठबंधन नहीं है, इसलिए इस बेस में किसी भी तरह की सेंधमारी चुनाव में बहुत भारी पड़ सकती है.

इस बढ़ती बेचैनी को भांपते हुए, विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने मतुआ समुदाय को भरोसा दिलाने की कोशिश की. 1 मार्च को अधिकारी ने कहा कि मतुआ वोटर्स को वोटर लिस्ट से नाम कटने को लेकर डरने की कोई जरूरत नहीं है. जिनके पास नागरिकता के पक्के कागजात नहीं हैं, उन्होंने उन लोगों से नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत अप्लाई करने की अपील की. अधिकारी का तर्क था कि नागरिकता मिलने के बाद वोटर बनने की योग्यता पर उठने वाले सवाल अपने आप खत्म हो जाएंगे.

अधिकारी ने कहा कि CAA के तहत पहले ही करीब 91,000 अर्जियां आ चुकी हैं और दावा किया कि कुछ सौ मामलों को छोड़कर, लगभग सभी को मंजूरी मिल जाएगी. उन्होंने कहा कि एक बार नागरिकता मिल जाने पर, अप्लाई करने वाले लोग अपने आप वोटिंग राइट्स के हकदार हो जाएंगे. इन बातों का मकसद चिंताओं को शांत करना तो था ही, लेकिन इससे यह भी साफ हो गया कि इस बेल्ट में BJP की राजनीतिक रणनीति अभी भी नागरिकता से जुड़े वादों पर ही कितनी ज्यादा टिकी हुई है.

वहीं दूसरी तरफ, TMC के लिए यह नया घटनाक्रम एक बड़ा रणनीतिक मौका है. स्थानीय प्रशासनिक नेटवर्क पर गहरी पकड़ और बूथ-लेवल के मजबूत संगठन के दम पर, सत्ताधारी पार्टी वोटर वेरिफिकेशन की इस प्रक्रिया को अपने पक्ष में मोड़ने और इस प्रशासनिक अनिश्चितता को एक राजनीतिक संदेश में बदलने के लिए कहीं ज्यादा बेहतर स्थिति में है. 2021 के बाद हाबरा को बचाए रखने और बगदाह व शांतिपुर को वापस छीनने की TMC की कामयाबी ने पहले ही दिखा दिया है कि चुनावी उथल-पुथल के वक्त मजबूत संगठन की क्या अहमियत होती है.

आंकड़ों से परे, SIR की यह प्रक्रिया BJP के सामने एक बड़ा 'नैरेटिव' का चैलेंज भी खड़ी करती है. पार्टी ने लगातार खुद को मतुआ समुदाय के सम्मान और अधिकारों के 'राजनीतिक रक्षक' के तौर पर पेश किया है. अब अगर ऐसा कोई भी मैसेज जाता है कि नाम कटने या लंबे वेरिफिकेशन का सबसे ज्यादा शिकार मतुआ वोटर्स ही हो रहे हैं, तो BJP के इस दावे की हवा निकल सकती है.

विडंबना देखिए. बंगाल में जिन हाशिए के समुदायों को साथ लेकर एक पार्टी ने अपना दायरा बढ़ाया था, आज उसी पार्टी को इस बात का डर सता रहा है कि वोटर लिस्ट के रिवीजन की एक कवायद उसके सबसे भरोसेमंद बेस को ही कमजोर कर सकती है. SIR के बाद जारी हुई यह फाइनल वोटर लिस्ट भले ही प्रशासनिक कार्रवाई का हिस्सा हो, लेकिन इसके राजनीतिक असर कतई निष्पक्ष नहीं रहने वाले.

जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की तरफ बढ़ रहा है, मतुआ-बहुल इन सीटों पर सबकी पैनी नजर रहेगी. जो इलाका कभी BJP का सबसे सुरक्षित चुनावी किला लगता था, वह अब धीरे-धीरे कमजोर होता दिख रहा है, और इसकी वजह विपक्ष की कोई लहर नहीं, बल्कि यह अनिश्चितता है कि वोटर लिस्ट में अब किसका नाम बचा है और किसका कट गया है.

Advertisement
Advertisement