पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) की तरफ से जिला निर्वाचन अधिकारियों (DEOs), निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (EROs) और सहायक निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (AEROs) को जारी एक पत्र ने राज्य में पहले से ही चुनाव आयोग (EC) और तृणमूल कांग्रेस के बीच जारी तनातनी को और बढ़ा दिया है.
असामान्य ढंग से सख्त भाषा के इस्तेमाल वाला पत्र 27 अगस्त को जारी किया गया, जिसमें जिला अधिकारियों को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत उनकी वैधानिक जिम्मेदारियां याद दिलाई गई हैं और मतदाता सूची में सुधार-संशोधन से जुड़े कामों के बंटवारे को लेकर सख्त प्रतिबंध लगाए गए हैं.
अधिनियम की धारा 13ए का हवाला देते हुए सीईओ ने लिखा है, “चुनाव आयोग के निरीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण के अधीन मुख्य निर्वाचन अधिकारी राज्य में सभी मतदाता सूचियों की तैयारी, संशोधन और सुधार की निगरानी करेंगे.” पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि जिला निर्वाचन अधिकारी धारा 13एए(3) का पालन करने के लिए बाध्य हैं, जिसके मुताबिक उनके लिए “जिले में मतदाता सूचियों की तैयारी और संशोधन से संबंधित सभी कार्यों का समन्वय और निरीक्षण” करना आवश्यक है. इसी तरह धारा 13बी और 13सी के तहत ईआरओ व एईआरओ उन्हें सौंपी गई विधानसभा सूचियां तैयार करने और संशोधित करने के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार होंगे.
इस निर्देश में सबसे ज्यादा जोर इस बात पर है कि किसी तरह की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी. सीईओ ने अधिनियम की धारा 31(1) का हवाला देते हुए आगाह किया कि आधिकारिक कार्यों के निर्वहन के प्रति जवाबदेह कोई भी अधिकारी यदि अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा तो उसे “कारावास और जुर्माने से दंडित किया जाएगा.” साधारण शब्दों में कहें तो पत्र में ये निर्देश दिया गया है कि ईआरओ और एईआरओ “अपनी किसी भी वैधानिक जिम्मेदारी या कार्य को किसी अन्य अधिकारी या व्यक्ति के हवाले नहीं करेंगे और किसी भी परिस्थिति में अपनी ईआरओनेट लॉगिन आईडी और ओटीपी किसी भी डेटा एंट्री ऑपरेटर या किसी अन्य अधिकारी या व्यक्ति के साथ साझा नहीं करेंगे.”
हालांकि, आईटी से जुड़े कार्यों में सिस्टम मैनेजर, सहायक सिस्टम मैनेजर और सरकारी कर्मचारी सहायता कर सकते हैं लेकिन आदेश में ऐसी सहायता केवल “गृह एवं एचए विभाग से वेतन पाने वालों” या उनकी अनुपस्थिति में ग्रुप सी और उससे ऊपर के स्थायी सरकारी कर्मचारियों तक ही सीमित रखी गई है.
पत्र में इस पर भी जोर दिया गया है कि “बूथ स्तरीय अधिकारी बीएलओ (BLOs) क्षेत्र स्तरीय जांच में किसी तरह छूट नहीं ले सकते और न ही इसे ऐसे ही छोड़ सकते हैं. भौतिक सत्यापन प्रक्रिया एक अनिवार्य पहलू है. जिला निर्वाचन अधिकारियों से कहा गया है कि “पूरी सख्ती के साथ इन निर्देशों के अक्षरशः पालन” सुनिश्चित करें, और इसमें किसी भी तरह के उल्लंघन को “बेहद गंभीरता से” लिया जाएगा और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और लागू सेवा नियमों के तहत दंडात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है.
ये पत्र आने से छह दिन पहले 21 अगस्त को पश्चिम बंगाल सरकार ने चुनाव आयोग को बताया था कि उसने मतदाता सूची में अनियमितताओं के आरोपी चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया है. हालांकि, प्रशासन ने प्राथमिकी दर्ज करने से इन्कार कर दिया था, क्योंकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ऐसी किसी कार्रवाई के पक्ष में नहीं थीं.
इससे पूर्व, चुनाव आयोग ने बरुईपुर पूर्व और मोयना में कथित तौर पर जाली दस्तावेजों के साथ 127 मतदाताओं का पंजीकरण करने के आरोप में पांच कर्मियों- दो ईआरओ, दो एईआरओ और एक डेटा एंट्री ऑपरेटर- के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था. राज्य के मुख्य सचिव मनोज पंत ने कहा कि मामले की जांच जारी है. साथ ही, इस पर भी जोर दिया कि ईमानदार अधिकारियों के खिलाफ कठोर कदम अनुचित है.
वैधानिक जिम्मेदारियां याद दिलाने की वजह से नहीं, बल्कि सीईओ के निर्देश की भाषा असामान्य रूप से सख्त होने की वजह से इस मामले ने राजनीतिक ध्यान आकृष्ट किया. सीईओ कार्यालय के सूत्रों ने खुद माना कि ये “अपनी तरह का पहला” आदेश है. ये पूछे जाने पर कि क्या इस समय ऐसे निर्देश का बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन समीक्षा (SIR) से कोई संबंध है, एक अधिकारी ने जोर देकर कहा-“सिर्फ SIR नहीं, बल्कि ईआरओ और एईआरओ के साल भर चलने वाले कार्यों के संबंध में इसे जारी किया गया है. इसका मतलब है कि केवल सरकारी कर्मचारी ही ईआरओनेट पर काम कर सकते हैं.”
सूत्र ने विस्तार से समझाया कि असल में व्यावहारिक स्तर पर इसका क्या मतलब है. सूत्र ने कहा, “आमतौर पर एक ऑपरेटर लॉगिन होता है जिसके माध्यम से कई कार्य किए जाते हैं. सरकारी ऑपरेटरों की कम संख्या के कारण, अक्सर संविदा कर्मचारी नियुक्त किए जाते रहे हैं लेकिन अब, ये काम करने की अनुमति केवल सरकारी ऑपरेटरों को ही होगी. संविदा कर्मचारी फॉर्म का निपटान नहीं कर सकते थे; वो केवल डेटा के डिजिटाइजेशन जैसे काम करते थे. लेकिन ताजा आदेश के माध्यम से उस पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है.”
इस सख्त रुख का प्रशासनिक स्तर पर तात्कालिक असर भी नजर आएगा. वर्षों से चुनावी मशीनरी स्थायी कर्मचारियों की कमी के कारण तमाम कार्यों के लिए संविदा कर्मचारियों पर निर्भर रही है. उनकी भूमिका मुख्यतः डेटा डिजिटाइजेशन तक सीमित थी, जबकि नाम शामिल करने या हटाने जैसे संवेदनशील कार्य सरकारी अधिकारियों के जिम्मे होते थे. डेटा एंट्री पर भी पाबंदी लगाने वाले नए निर्देश से चुनावी प्रक्रिया में अस्थायी कर्मचारियों के लिए कोई खास जगह नहीं रह जाएगी.
राजनीतिक संदर्भ में इस आदेश के निहितार्थ और भी ज्यादा गहरे हैं. बंगाल के राजनीतिक दल, खासकर तृणमूल कांग्रेस, अक्सर चुनाव आयोग पर केंद्र की सत्ताधारी व्यवस्था के अनुकूल नियम तय करने का आरोप लगाते रहे हैं, जबकि राज्य की अपनी नौकरशाही अक्सर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने को लेकर सवालों के घेरे में रही है. एक दूसरे पर संदेह के ऐसे माहौल में असामान्य तौर पर सब कुछ पूरी तरह सरकारी कर्मचारियों के विशेष नियंत्रण में रहने पर जोर दिए जाने को केंद्रीय सत्ता के दखल और मतदाता सूची प्रबंधन में खामियों को दूर करने के एक उपाय के तौर पर देखा जा रहा है.
चुनाव आयोग की बात करें तो बहुत कुछ दांव पर है. मतदाता सूची की विश्वसनीयता भारतीय चुनावों में सबसे विवादास्पद मुद्दा रहा है. लगभग हर राज्य में फर्जी मतदाता, गलत तरीके से नाम हटाने और राजनीति प्रेरित हेराफेरी के आरोप सामने आते रहते हैं. तेजी से ध्रुवीकरण होने वाली राजनीति के कारण बंगाल में ऐसे विवाद उठना स्वाभाविक ही रहा है. ऐसे में सीईओ का यह आदेश केंद्रीकृत जिम्मेदारी निर्धारित करने, निगरानी व्यवस्था को चौकस बनाने और गड़बड़ियों की गुंजाइश को कम करने वाली कवायद का हिस्सा नजर आता है.
फिर भी, राजनीतिक दलों के लिए ये निर्देश एक नया हथियार साबित हो सकता है. SIR से ठीक पहले इस कवायद को निश्चित तौर पर राजनीति के चश्मे से देखा जाएगा. अमूमन जमीनी स्तर पर वर्कफोर्स का एक बड़ा हिस्सा रहे संविदा कर्मचारियों को हटाने से चुनाव आयोग पर पूरी प्रक्रिया धीमी करने या भागीदारी सीमित करने का आरोप लग सकता है. राजनीतिक हलकों में पहले ही इस पर सुगबुगाहट तेज हो गई है कि ये कदम उन जिलों में नामांकन की गति प्रभावित कर सकता है जहां मैनपॉवर पहले से ही कम है.
अब इसे चाहे प्रक्रियागत कड़ाई के तौर पर देखा जाए या फिर कोई राजनीतिक पैंतरेबाजी कहा जाए, सीईओ का ये पत्र पूर्व में अपनाई जाने वाली प्रक्रियाओं से स्पष्ट तौर पर काफी भिन्न है. इसमें आपराधिक दायित्व रेखांकित करने, अपना काम किसी और को सौंपने के प्रति आगाह करने और “सख्त अनुपालन” पर जोर देने के लिए जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया है, वो केवल प्रशासनिक शब्दजाल भर नहीं है बल्कि ये दिखाता है कि आयोग इस मामले में कितना गंभीर है. जैसा कि एक जानकार कहते हैं- बंगाल में चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ दल के बीच जंग का एक नया मोर्चा खुल गया है, जो रैलियों या प्रेस वार्ताओं से नहीं बल्कि मतदाता सूचियों के तकनीकी लेकिन बेहद अहम पहलू से जुड़ा है.