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यूपी की नदियों में चल रहीं बोट बार-बार क्यों डुबा रही लोगों को!

वृंदावन नाव हादसे ने उजागर की यूपी में अवैध मोटरबोट, बिना लाइसेंस संचालन, ओवरलोडिंग और सुरक्षा मानकों की अनदेखी; प्रशासनिक लापरवाही से श्रद्धालुओं की जान लगातार खतरे में पड़ रही है

रातभर चला रेस्क्यू ऑपरेशन!(Photo: PTI)
वृंदावन बोट हादसे के बाद चला राहत-बचाव कार्य
अपडेटेड 13 अप्रैल , 2026

धर्मनगरी मथुरा के वृंदावन में 10 अप्रैल को हुआ मोटरबोट हादसा एक अकेली त्रासदी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में नदी परिवहन व्यवस्था की गहरी अव्यवस्था, प्रशासनिक लापरवाही और अनियंत्रित पर्यटन दबाव का नतीजा है. केसीघाट और बंशीवट के बीच यमुना नदी में श्रद्धालुओं से भरी मोटरबोट पांटून पुल से टकराकर पलट गई. 

इस हादसे में अब तक 11 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोग लापता रहे. शुरुआती तौर पर इसे एक दुर्घटना बताया गया, लेकिन जैसे-जैसे परतें खुलीं, यह साफ हो गया कि यह हादसा दरअसल सिस्टम की कई विफलताओं का संगठित परिणाम था. 

10 अप्रैल की सुबह लुधियाना और हिसार से दो बसों में लगभग 130 श्रद्धालु वृंदावन पहुंचे थे. इनमें से 37 श्रद्धालु यमुना में मोटरबोट से भ्रमण के लिए निकले. आगरा मंडल के डीआईजी शैलेश पांडेय के अनुसार, केसीघाट और बंशीवट के बीच अचानक मोटरबोट लहराने लगी और पांटून पुल से टकराकर पलट गई. प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, टक्कर इतनी तेज थी कि नाव में बैठे लोग सीधे नदी में जा गिरे और चीख-पुकार मच गई. 

आसपास मौजूद लोगों ने शोर मचाया तो स्थानीय गोताखोर तुरंत यमुना में कूद पड़े और बचाव कार्य शुरू किया. पीएसी और पुलिस की टीम भी मौके पर पहुंची और 22 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया. कई घायलों को वृंदावन के रामकृष्ण मिशन अस्पताल और मांट के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया.

वृंदावन हादसा और लापरवाही की परतें

लेकिन इस घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठा कि आखिर यह हादसा हुआ कैसे? जांच में सामने आया कि जिस पांटून पुल से मोटरबोट टकराई, उसे रिवर फ्रंट परियोजना के तहत हटाया जा रहा था. यह काम बिना किसी पूर्व सूचना और बिना सुरक्षा इंतजाम के किया जा रहा था. मौके पर न तो कोई चेतावनी संकेत थे और न ही नदी में नावों की आवाजाही पर कोई रोक लगाई गई थी. एफआइआर में साफ तौर पर कहा गया कि ठेकेदार नारायण शर्मा ने नियमों की अनदेखी करते हुए पुल हटाने का काम शुरू किया और नावों का संचालन बंद नहीं कराया. वहीं मोटरबोट चला रहे नाविक पप्पू उर्फ दाऊजी निषाद पर आरोप है कि उन्होंने क्षमता से अधिक सवारियां बैठाईं और श्रद्धालुओं के मना करने के बावजूद नाव को आगे बढ़ाया. 

एसपी सिटी राजीव कुमार सिंह के अनुसार, दोनों के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है. हालांकि, घटना के बाद सामने आए कुछ बयानों ने कहानी को एक अलग दिशा भी दी. लुधियाना निवासी रोहित बहल, जो इस हादसे के प्रत्यक्षदर्शी हैं, उन्होंने नाविक की गलती से इनकार किया. उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें वह कहते नजर आते हैं कि पांटून पुल को बुलडोजर की मदद से खींचा जा रहा था और इसी दौरान वह नाव से टकरा गया. उनका कहना है कि नाविक ने लोगों को बचाने की पूरी कोशिश की थी. यह बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि पूरा दोष सिर्फ नाविक पर डालना शायद सही तस्वीर नहीं है.

फाइलों में दबे सुरक्षा नियम

इस पूरे मामले में प्रशासनिक जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं. यमुना रिवर फ्रंट परियोजना के निर्माण के दौरान सुरक्षा मानकों की खुली अनदेखी की जा रही थी. निर्माण स्थल पर न तो कोई चेतावनी बोर्ड लगाए गए थे और न ही प्रवेश निषेध के संकेत थे. मथुरा में सिंचाई विभाग के एग्जिक्यूटिव इंजीनियर नवीन कुमार का कहना है कि अगर परियोजना में कोई लापरवाही पाई जाती है तो कार्यदायी संस्था की जवाबदेही तय की जाएगी. लेकिन यह बयान भी इस सवाल का जवाब नहीं देता कि हादसे से पहले निगरानी क्यों नहीं की गई. 

दरअसल, यह समस्या सिर्फ एक परियोजना या एक हादसे तक सीमित नहीं है. मथुरा और वृंदावन में नाव संचालन की पूरी व्यवस्था ही बिखरी हुई है. यहां सैकड़ों मोटरबोट बिना लाइसेंस के चल रही हैं. नगर निगम के पास इनकी संख्या तक का सही रिकॉर्ड नहीं है. यमुना महारानी निषाद सेवा समिति के अध्यक्ष बाबूलाल निषाद के अनुसार, केसीघाट से जुगलघाट तक करीब 500 मोटरबोट संचालित हो रही हैं और इनमें से किसी के पास लाइसेंस नहीं है. उन्होंने बताया कि नाविकों ने एक साल पहले लाइसेंस के लिए आवेदन किया था, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई.

हाथ पर हाथ धरे बैठा है नगर निगम 

नगर निगम की निष्क्रियता का एक और उदाहरण सितंबर 2024 में पास किया गया वह प्रस्ताव है, जिसमें नाव संचालन को सुरक्षित बनाने के लिए 18 बिंदुओं को शामिल किया गया था. इसमें नाविकों का पंजीकरण, नावों की क्षमता निर्धारण, लाइफ जैकेट अनिवार्य करना और नियमित जांच जैसी बातें शामिल थीं. पार्षद नीलम गोयल का कहना है कि अगर यह प्रस्ताव समय पर लागू हो जाता तो शायद यह हादसा नहीं होता. वहीं पार्षद राजीव सिंह ने अधिकारियों पर लापरवाही का आरोप लगाया है. मथुरा के महापौर विनोद अग्रवाल का कहना है कि प्रस्ताव को बजट के लिए शासन को भेजा गया है और मंजूरी मिलने के बाद इसे लागू किया जाएगा. वास्तविकता यह है कि नियम कागजों तक सीमित हैं और जमीन पर स्थिति पूरी तरह अनियंत्रित है. नावों में न तो लाइफ जैकेट हैं और न ही अन्य सुरक्षा उपकरण. 

यात्रियों को कोई सुरक्षा निर्देश नहीं दिए जाते. नाविक अधिक कमाई के लालच में क्षमता से दोगुनी सवारियां बैठाते हैं. सात लोगों की क्षमता वाली नाव में 15-20 लोगों को बैठाना आम बात है. एक और चिंताजनक पहलू है जुगाड़ से बनी मोटरबोट. ये नावें किसी मानक कंपनी द्वारा नहीं बनाई जातीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर लोहे की चादर और मोटर पंप लगाकर तैयार की जाती हैं. इनकी गुणवत्ता और संतुलन पूरी तरह संदिग्ध होता है. कई नाविकों ने डबल डेकर मोटरबोट भी बना रखी हैं, जिनमें ऊपर बैठकर लोग सेल्फी लेते हैं और वीडियो बनाते हैं. इससे नाव का संतुलन और ज्यादा बिगड़ने का खतरा रहता है. 

श्रद्धालुओं की सुरक्षा भगवान भरोसे 

पर्यटन बढ़ने के साथ यह समस्या और गंभीर हो गई है. कोरोना काल के बाद वाराणसी, और मथुरा-वृंदावन में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है. मथुरा में पहले जहां सालाना करीब पांच करोड़ श्रद्धालु आते थे, अब यह संख्या दस करोड़ के आसपास पहुंच गई है. इस बढ़ती भीड़ को संभालने के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई, जिससे नावों पर दबाव बढ़ता गया.

यह हाल सिर्फ मथुरा तक सीमित नहीं है. वाराणसी में भी गंगा में नाव संचालन की स्थिति लगभग ऐसी ही है. 16 फरवरी में तुलसी घाट के पास दो नावों की टक्कर में एक नाव डूब गई थी. हालांकि पांच लोगों को बचा लिया गया, लेकिन यह घटना भी चेतावनी थी. गंगा में करीब 1500 नावें चल रही हैं, जिनमें से कई बिना वैध लाइसेंस के हैं. नावों के लिए लेन निर्धारित हैं, लेकिन उनका पालन नहीं होता. 

बड़ी मोटरबोट और क्रूज छोटे नावों की टक्कर आम बात है. वाराणसी में मार्च 2024 से नावों का पंजीकरण तक बंद है, जिससे स्थिति और बिगड़ गई है. नगर निगम के पास नावों का नियंत्रण लगभग खत्म हो चुका है. सहकारिता विभाग के रजिस्ट्रार योगेश कुमार के अनुसार, नाविकों के बीच मनमानी किराया वसूली और आपसी विवाद भी आम हैं. 

गंगा में नाव संचालन के लिए नियम तो बनाए गए हैं, लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा. वाराणसी में नाव चलाने वाले मुकेश निषाद बताते हैं, “हर हादसे के बाद प्रशासन सख्ती का दावा करता है, लेकिन कुछ ही दिनों में स्थिति फिर सामान्य हो जाती है. जल पुलिस अभियान चलाती है, लेकिन उसे नियमित बनाए रखने की कोई व्यवस्था नहीं है. यह अस्थाई कार्रवाई समस्या का स्थाई समाधान नहीं बन पाती.” सबसे बड़ी चिंता यह है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा पूरी तरह भगवान भरोसे है. लाखों लोग हर दिन इन नदियों में नाव से यात्रा करते हैं, लेकिन उनके लिए कोई ठोस सुरक्षा व्यवस्था नहीं है. न लाइफ जैकेट, न प्रशिक्षित नाविक, न आपातकालीन व्यवस्था- ऐसे में हर यात्रा जोखिम भरी है.

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