वर्ष 2017 में जब केंद्र की सरकार ने देशभर में लाल बत्ती पर रोक लगाने का फैसला किया, तो इसे वीआईपी संस्कृति पर सख्त प्रहार माना गया था. संशोधित नियमों के तहत 1 मई 2017 से सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स में बदलाव लागू हुआ और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों से लेकर मंत्रियों और अफसरों तक की गाड़ियों से लाल बत्ती हट गई.
यह फैसला केंद्र सरकार ने 19 अप्रैल 2017 को लिया था. उससे पहले सुप्रीम कोर्ट भी 2014 और 2015 में लाल बत्ती को स्टेटस सिंबल बताते हुए इसकी सूची सीमित करने के निर्देश दे चुका था. संदेश साफ था, सड़क पर पद नहीं, नियम चलेगा.
करीब नौ साल बाद उत्तर प्रदेश की सड़कों पर तस्वीर कुछ बदली हुई जरूर दिखती है, लेकिन सवाल वही है. अब पारंपरिक लाल बत्ती कम दिखती है, उसकी जगह बहुरंगी फ्लैशर, एलईडी स्ट्रिप, अंडाकार और तिकोने आकार की लाइटें तेजी से नजर आ रही हैं. कई गाड़ियों की ग्रिल, बोनट, डैशबोर्ड और नंबर प्लेट के आसपास ये लाइटें फिट हैं. दावा यही कि ये इमरजेंसी सिग्नलिंग डिवाइस हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत बताती है कि इनका इस्तेमाल अक्सर नियमित सरकारी या निजी आवागमन में हो रहा है.
यूपी के एक पूर्व एडिशनल ट्रांसपोर्ट कमिश्नर बताते हैं, “मल्टीकलर लाइट की इजाजत सिर्फ एम्बुलेंस, फायर टेंडर और पुलिस इमरजेंसी रिस्पॉन्स यूनिट जैसी गाड़ियों को थी. अब जिन अधिकारियों को इसकी कोई ऑपरेशनल जरूरत नहीं, वे भी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं. यह 2017 के नोटिफिकेशन की भावना के खिलाफ है.” उनके मुताबिक तकनीकी तौर पर इन्हें “बीकन” (जिन गाडि़यों पर चमकती हुई लाल नीली बत्ती लगी होती है) नहीं कहा जा सकता, लेकिन मकसद वही है, ट्रैफिक क्लियर कराना और रौब दिखाना.
संशोधित नियम 108 के तहत केंद्र ने स्पष्ट किया था कि इमरजेंसी और डिजास्टर मैनेजमेंट ड्यूटी पर लगी गाड़ियों को ही मल्टीकलर लाल, नीली और सफेद लाइट की अनुमति होगी. नोटिफिकेशन में यह भी साफ लिखा गया कि जब वाहन तय ड्यूटी पर न हो, तब इन लाइटों का इस्तेमाल नहीं होगा. आपदा प्रबंधन, रक्षा, पैरामिलिट्री ऑपरेशन, आग, भूकंप, बाढ़, लैंडस्लाइड, साइक्लोन, सुनामी या रासायनिक और जैविक आपदाओं जैसे विशेष हालात में ही यह अनुमति लागू मानी गई. लेकिन एक वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट, जिन्होंने नाम न छापने की शर्त रखी, कहते हैं कि जमीनी स्तर पर नियम और व्यवहार में बड़ा फर्क है. उनके मुताबिक थानेदार से लेकर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और तहसीलदार से लेकर अन्य प्रशासनिक अफसर तक, रोजमर्रा के आवागमन में इन लाइटों का इस्तेमाल करते दिखते हैं. कुछ मामलों में निजी गाड़ियों पर भी फ्लैशर लगे हैं. उनका कहना है कि एनफोर्समेंट ड्यूटी के नाम पर ट्रांसपोर्ट विभाग के भीतर भी कई गाड़ियां मल्टीकलर लाइट के साथ चल रही हैं, जबकि नोटिफिकेशन में ऐसी कोई अलग श्रेणी दर्ज नहीं है.
मई 2017 के नोटिफिकेशन में एक सख्त पहचान प्रणाली का भी प्रावधान था. हर राज्य के ट्रांसपोर्ट विभाग को हर साल उन अधिकारियों की सूची सार्वजनिक नोटिस के जरिए जारी करनी थी, जिन्हें इमरजेंसी ड्यूटी के लिए मल्टीकलर लाइट की अनुमति है. साथ ही ऐसी गाड़ियों की विंडस्क्रीन पर विभागीय अधिकृत स्टिकर अनिवार्य था. हालांकि जब इस बारे में एडिशनल ट्रांसपोर्ट कमिश्नर (एनफोर्समेंट) संजय सिंह से पूछा गया, तो उन्होंने केंद्र के नोटिफिकेशन को स्वीकार किया, लेकिन यह भी कहा कि उन्हें ऐसे किसी ऑथराइजेशन स्टिकर सिस्टम की वर्तमान स्थिति की जानकारी नहीं है. उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता कि विभाग में अभी ऐसा कोई सिस्टम चल रहा है.”
राज्य स्तर पर वीआईपी संस्कृति पर रोक की कोशिशें भी हुईं. 11 जून 2024 को मुख्यमंत्री योगी ने स्पष्ट निर्देश दिए कि प्रदेश में वीवीआईपी कल्चर नहीं चलेगा और निजी गाड़ियों पर लगे प्रेशर हॉर्न, हूटर और नीली-लाल बत्ती तत्काल हटाई जाए. निर्देश के बाद पूरे प्रदेश में अभियान चला और करीब एक महीने में लगभग 5000 गाड़ियों का चालान हुआ. कई जिलों में जनप्रतिनिधियों और पुलिस के बीच टकराव की खबरें भी आईं. लेकिन कुछ ही समय में यह अभियान धीमा पड़ गया और सड़कों पर फिर वही दृश्य लौट आया.
बहराइच में 16 जून 2024 की घटना इसका उदाहरण बनी. मिहींपुरवा के तत्कालीन नायब तहसीलदार असलान-उर-रशीद के निजी वाहन से ट्रैफिक पुलिस ने फ्लैशर लाइट उतरवा दी. वीडियो वायरल हुआ, राजस्व प्रशासनिक संघ और लेखपाल संघ आंदोलन में कूद पड़े. विवाद बढ़ा तो तत्कालीन एसपी वृंदा शुक्ल ने ट्रैफिक इंचार्ज को अयोध्या ड्यूटी पर भेज दिया, जबकि नायब तहसीलदार का तबादला कानपुर नगर कर दिया गया. सवाल उठा कि कार्रवाई नियम के आधार पर हुई या दबाव के कारण संतुलन साधा गया;
9 नवंबर 2025 को बाराबंकी में एक निजी कार पर ‘विश्व हिंदू रक्षा परिषद प्रदेश मंत्री’ का पदनाम और छत पर लाल-नीली बत्ती के साथ वीडियो वायरल हुआ. लोगों ने कार्रवाई की मांग की. 27 नवंबर 2025 को मुरादाबाद में एक लग्जरी कार पर ‘मजिस्ट्रेट’ और ‘उत्तर प्रदेश सरकार’ लिखकर फ्लैशर और हूटर के साथ रील बनाते चार युवकों का वीडियो सामने आया. पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया. ये घटनाएं बताती हैं कि समस्या सिर्फ अफसरों तक सीमित नहीं, बल्कि युवाओं के बीच भी यह एक तरह का स्टेटस प्रतीक बन चुकी है.
लखनऊ के लालबाग जैसे बाजारों में कार एसेसरीज की दुकानों पर 600 से 1300 रुपये तक में लाल-नीली फ्लैशर लाइट आसानी से मिल जाती है. बोनट, ग्रिल, नंबर प्लेट या डैशबोर्ड पर लगाने वाली अलग-अलग डिजाइन की लाइटें खुलेआम बिक रही हैं. हजारों निजी वाहन ऐसे दिख जाते हैं जिन पर पुलिस जैसा लोगो, लाल-नीली पट्टी या ‘पुलिस’ लिखी प्लेट लगी होती है.
कुछ लोग रौब जमाने के लिए डैशबोर्ड पर पुलिस की टोपी रखकर चलते हैं ताकि टोल या पार्किंग पर छूट मिल सके. यातायात विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ नियम उल्लंघन का मामला नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा से भी जुड़ा प्रश्न है. जब असली एम्बुलेंस या फायर टेंडर आ रहे हों और आसपास पहले से कई गाड़ियां फ्लैशर चला रही हों, तो आम लोग भ्रमित हो सकते हैं. इससे प्रतिक्रिया में देरी हो सकती है, जिसका असर जानलेवा भी हो सकता है.
सरकार का पक्ष यह है कि नियम स्पष्ट हैं और उल्लंघन पर कार्रवाई का प्रावधान मौजूद है. मोटर व्हीकल एक्ट के तहत अनधिकृत सिग्नलिंग डिवाइस, हूटर या गलत नंबर प्लेट पर जुर्माना और जब्ती की कार्रवाई हो सकती है. पुलिस अधिकारियों का कहना है कि समय-समय पर अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन संसाधन और प्राथमिकताएं सीमित हैं. असल चुनौती नियमों को लागू करने को लेकर निरंतरता की है. जब अभियान चलता है तो हजारों चालान होते हैं, लेकिन अभियान खत्म होते ही स्थिति पहले जैसी हो जाती है. विभागीय समन्वय की कमी भी सामने आती है. अगर ट्रांसपोर्ट विभाग अधिकृत सूची सार्वजनिक नहीं करता और पुलिस के पास वास्तविक समय में सत्यापन का तंत्र नहीं है, तो फील्ड में भ्रम की स्थिति बनती है.
विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि अधिकृत इमरजेंसी वाहनों के लिए यूनिक क्यूआर कोड आधारित डिजिटल स्टिकर जारी किए जाएं, जिन्हें स्कैन कर तुरंत सत्यापन हो सके. साथ ही बाजार में अनधिकृत फ्लैशर की बिक्री पर भी नियंत्रण जरूरी है. जब तक आपूर्ति खुली रहेगी, मांग खत्म नहीं होगी.
करीब एक दशक पहले जिस प्रतीक को हटाकर बराबरी का संदेश देने की कोशिश हुई थी, वह नए रूप में लौटता दिख रहा है. फर्क इतना है कि अब लाल बत्ती की जगह बहुरंगी एलईडी स्ट्रिप, फ्लैशर लाइट ने ले ली है.

