
कटिहार जिले के डूमर के रहने वाले उमेश शर्मा मोतियाबिंद की सर्जरी के बाद लगने वाले काले चश्मे के साथ भागलपुर के बरारी घाट के पास जमीन पर उकड़ू बैठे मिलते हैं. वे आंख के डॉक्टर से जांच करवाकर अपने गांव लौटने की तैयारी में हैं. दो हफ्ते पहले जब उन्होंने मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराया था तो वे अपने बेटे के साथ बस से आधा-पौन घंटा में आ गए थे. मगर अब चेकअप के लिए आने में उनकी हालत खराब हो गई है.
दरअसल इस बीच 3-4 मई की दरम्यानी रात भागलपुर से कोसी और सीमांचल को जोड़ने वाले विक्रमशिला सेतु का एक स्लैब गिर गया और पुल से होकर आवागमन बंद हो गया. ऐसे में उमेश पहले बस से नवगछिया आए फिर ऑटो से महादेवपुर घाट (जिसे स्थानीय लोग हाई लेबुल कहते हैं) और फिर वहां से सरकारी जहाज से भागलपुर के बरारी घाट पहुंचे.

लगभग तीन से चार घंटे में उमेश किसी तरह भागलपुर पहुंच तो गए मगर डॉक्टर को दिखाकर उसी रोज लौट नहीं पाए. रात एक परिचित के घर ठहरे और सुबह छह बजे से सरकारी जहाज के इंतजार में बैठे हैं जो मेंटेनेंस के कारण लेट हो रहा है.
दो घंटे का सफर दो दिन में पूरा करने की तकलीफ सिर्फ उमेश शर्मा के हिस्से ही नहीं आई है. भागलपुर जिले के नवगछिया अनुमंडल समेत कोसी और सीमांचल क्षेत्र के सात जिलों के लाखों लोग इस पुल के गिरने से प्रभावित हुए हैं. भागलपुर उस इलाके का सबसे बड़ा बाजार और इलाज का बड़ा केंद्र है जिसके कारण वहां के लोग रोजाना बड़ी संख्या में इधर आते रहे हैं.
बरारी घाट पर ऐसे लोग बड़ी संख्या में नजर आते हैं. इनमें सरकारी नौकरी करने वाले शादी-ब्याह के मौके पर दूर-दराज से गांव लौट रहे परिवार छोटे दुकानदार रोगी और अदालत व जिला प्रशासन के काम से आए लोग शामिल हैं. पुरुष महिलाएं बुजुर्ग और बच्चे सभी यहां मौजूद हैं. इनमें कई लोग मोटर लगी नावों पर सवार होकर यात्रा कर रहे हैं तो कई उस सरकारी जहाज का इंतजार कर रहे हैं जो दिन में दो शिफ्ट चलता है. यह जहाज एक साथ एक हजार से अधिक यात्रियों को अपेक्षाकृत सुरक्षित और मुफ्त यात्रा करवाता है.
इन सब लोगों की सामान्य जिंदगी अब मुसीबतों से भर गई है. खासकर वे महिलाएं जो गंगा पार के गांवों में स्कूल अस्पताल या अन्य सरकारी दफ्तरों में काम करती हैं उन्हें रोज अपने ऑफिस में या फील्ड पर पहुंचने में काफी वक्त लग रहा है. उनकी यह यात्रा मुसीबत और खतरों से भरी है. ये महिलाएं सरकारी कर्मी होने की वजह से अपना नाम जाहिर नहीं करना चाहतीं.
इस पुल के गिरने से गंगा नदी में बरारी घाट और महादेवपुर घाट के बीच फिर से 2001 से पहले वाली जल परिवहन सेवा शुरू हो गई है. यह सेवा रोजाना तकरीबन 12 से 14 हजार यात्रियों को नदी पार करा रही है. सरकारी जहाज की दो-दो फेरियों के अलावा तकरीबन 75 नावें भी लगातार यात्रियों को ढो रही हैं.

हालांकि सरकार ने अपनी तरफ से इस जल परिवहन की सेवा को सुचारू और सुरक्षित करने के भरपूर प्रयास किए हैं मगर खतरा अभी भी बना हुआ है. इन 12 हजार यात्रियों में लगभग सभी 45 से 50 मिनट के इस सफर को बिना लाइफ जैकेट के पूरा कर रहे हैं. इस संवाददाता को सिर्फ एक महिला शिक्षिका रश्मि मिलीं जिन्होंने 1200 रुपए खर्च करके अपने पैसे से लाइफ जैकेट खरीदी थी. वे उसे पहनकर आई थीं.
लाइफ जैकेट के अलावा दूसरा खतरा नदी में अनियंत्रित परिवहन का है. जहां नाव खुलती है वहां गंगा की धारा पतली सी है और फिर वह घूमकर मुख्यधारा के पास जाती है. इस बीच लगातार नावें आती और जाती हैं जिससे उनके आपस में टकराने का खतरा बना रहता है. बीते दिन इसी तरह एक नाव सरकारी जहाज से टकरा गई थी हालांकि कोई दुर्घटना नहीं हुई.
तीसरा खतरा मौसम का है जो इन दिनों कभी भी बदल रहा है. अगर दिन में धूप खिली रहती है तो यात्रियों को लू लगने का डर रहता है. वहीं अचानक बारिश होने पर भीगने और बिजली गिरने का भी खतरा है क्योंकि नावों और जहाज दोनों में छत नहीं है. यात्री लगभग एक घंटे की यात्रा खुले आकाश के नीचे करते हैं.
इन परिस्थितियों में यात्री जब घाट पर पहुंचते हैं तो परेशानहाल दिखते हैं. महादेवपुर घाट पर उन्हें कुछ दूर पैदल भी चलना पड़ता है. बरारी घाट में सरकार की तरफ से अस्थाई यात्री शेड सूचना केंद्र हेल्थ कैंप और जीविका दीदी की रसोई आदि की व्यवस्था की गई है. नाव और जहाज का परिचालन सुबह 5 से शाम 5 बजे तक किया गया है. ऐसे में रात के वक्त जो यात्री बच गए हैं उनके लिए कैंप की व्यवस्था भी है.
इनके अलावा आपदा प्रबंधन प्राधिकारी के स्वयंसेवक लगातार सक्रिय रहते हैं. वे नावों को मैनेज कर रहे हैं उनका लोड तय कर रहे हैं और निगरानी रखते हैं कि किसी नाव में क्षमता से अधिक यात्री सवार न हों. इसके अलावा एनडीआरएफ की बोट उस जगह पैट्रोलिंग भी करती रहती है. सरकार ने नावों के लिए किराया भी तय कर दिया है. प्रति यात्री 50 रुपए और 12 साल से छोटे बच्चों का किराया 20 रुपए है. इसके अलावा मोटरसाइकिल और साइकिल का किराया क्रमशः 50 और 20 रुपए है.
हालांकि यह अस्थाई व्यवस्था है. जब पुल सामान्य स्थिति में था तो इससे रोजाना बसों ऑटो रिक्शा कार और बाइक से तकरीबन एक लाख लोग भागलपुर आते थे. इस पुल से हर घंटे 300 वाहन गुजरते थे. अब बड़ी संख्या में लोग असुविधा की वजह से काम टाल रहे हैं. सड़क मार्ग से वैकल्पिक रास्ता लगभग 140 किमी अधिक है और उस रास्ते में भी खूब जाम लग रहा है. सुल्तानगंज और कहलगांव जैसे इलाकों से भी लोग नावों पर आ-जा रहे हैं.

पुल टूटने से भागलपुर का बाजार बुरी तरह प्रभावित हुआ है. यह शहर कोसी और सीमांचल के इलाके के लिए थोक मंडी रहा है. लोग यहां से कपड़े टाइल्स मोबाइल अनाज और दूसरी चीजें ले जाते थे. ईस्टर्न चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष शरद सलारपुरिया बताते हैं कि व्यापार में 50 फीसदी की गिरावट है. खतरा यह है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो भागलपुर के बदले दुकानदार सिलीगुड़ी या किसी और मंडी की तरफ शिफ्ट हो जाएंगे.
वहीं दियारा के इलाके से आने वाला दूध और सब्जियां भी अब नहीं आ रहीं. कोसी और सीमांचल के इलाके में जो भी सरकारी और निजी कंस्ट्रक्शन का काम होता था उसके लिए इसी रास्ते से बालू और गिट्टी जाती थी वह भी बंद है. यानी यह संकट कई स्तरों पर है.
हालांकि सरकार का दावा है कि पुल के क्षतिग्रस्त हिस्से पर बेली ब्रिज बनाकर वह जल्द परिवहन सुचारू करने की तैयारी में है. मगर बेली ब्रिज बनने के बाद भी इस पुल पर सिर्फ दो और चार पहिया वाहन ही जा सकेंगे. इसके अलावा जांच से पता चला है कि 4.4 किमी लंबे इस पुल पर 13 जगहों पर और ऐसी ही स्थिति है. ऐसे में इस रास्ते से बसों और ट्रकों का चलना जल्द शुरू होने की उम्मीद नहीं है.
इसके समानांतर एक और पुल बन रहा है. सरकार ने कंस्ट्रक्शन कंपनी को दिसंबर 2026 तक उसे पूरा करने का निर्देश दिया है. हालांकि पुल अभी जिस स्थिति में है उसका इस साल पूरा हो पाना मुमकिन नहीं लगता. ऐसे में इस रूट पर स्थिति सामान्य होने में अभी काफी वक्त लगने वाला है.
इस पूरे मसले पर बात करते हुए भागलपुर के डीएम नवल किशोर चौधरी कहते हैं, "हमने सभी नाविकों से कह दिया है कि वे लाइफ जैकेट की व्यवस्था जल्द से जल्द कर लें. राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) की बोटें लगातार पेट्रोलिंग कर रही हैं और नाविकों को ओवरलोडिंग करने से रोक रही हैं. मौसम के संकट को ध्यान में रखकर हम जल्द दूसरे जहाजों को बुलवा रहे हैं. सरकारी जहाज पर दूध और सब्जी की ढुलाई मुफ्त कर दी गई है. हमें उम्मीद है कि एक महीने में बेली ब्रिज बन जाएगा और फिर चार पहिया वाहन पुल से गुजरने लगेंगे. पुल के क्षतिग्रस्त हिस्से को भी हम तीन महीने में ठीक करने की कोशिश करेंगे ताकि स्थिति सामान्य हो सके."

