scorecardresearch

वैष्णो देवी यूनिवर्सिटी मामला दिखाता है कि अब J&K में पावर गेम बदल गया है?

जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस दिलाने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला कई मुद्दों पर BJP से टकराव करने से हिचकिचाते नजर आ रहे हैं

जम्मू-कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला   (Photo-X)
जम्मू-कश्मीर के सीएम उमर अब्दुल्ला (Photo-X)
अपडेटेड 19 जनवरी , 2026

जम्मू और कश्मीर की राजधानी श्रीनगर लंबे समय से सत्ता गलियारों का केंद्र रहा है. स्थानीय स्तर पर लिए जाने वाले हर फैसले में जम्मू-कश्मीर सरकार का अहम योगदान होता है. आमतौर पर केंद्र और राज्य सरकार के बीच कई अहम मुद्दों पर टकराव भी देखने को मिलता है. 

हालांकि, पिछले कुछ समय से इस ट्रेंड में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. हाल में श्री माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज की MBBS मान्यता रद्द किए जाने के मामले में विपक्षी पार्टी BJP के आक्रामक रुख के आगे राज्य सरकार की कथित तौर पर नरमी या सहमति दिखाई दी.

तमाम तरह के विवादों के बाद राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने रियासी जिले की कटरा तहसील में स्थित नवनिर्मित श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस (SMVDIME) की MBBS मान्यता रद्द कर दिया. यह फैसला हिंदुओं के लिए सभी सीटों के आरक्षण की मांग को लेकर 45 दिनों तक चले विरोध प्रदर्शनों के बाद लिया गया है.

सबसे पहले श्री माता वैष्णो देवी संघर्ष समिति ने इस मुद्दे पर विरोध शुरू किया, जो देखते ही देखते BJP या RSS समर्थक संगठनों के विरोध में तब्दील हो गया. नवंबर 2025 के अंत में इस मुद्दे पर राज्यभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ था. मेडिकल कॉलेज की मान्यता रद्द होने के बाद समिति के संयोजक सुखवीर मनकोटिया ने कहा था, “इसका श्रेय पूरे हिंदू समुदाय को जाता है. हम सभी एक नेक उद्देश्य के लिए एक साथ आए.”

इसके बाद 6 जनवरी को NMC ने अचानक निरीक्षण के दौरान कॉलेज के बुनियादी ढांचे, जिसमें शिक्षकों की संख्या आदि में कमियां निकालीं. इसी के आधार पर कॉलेज में MBBS की मान्यता रद्द कर दी गई. इस मेडिकल कॉलेज को पिछले ही साल सितंबर में NMC की मंजूरी मिली थी.

जम्मू में हिंदू संगठनों ने इस कॉलेज के पहले MBBS बैच में 42 कश्मीरी छात्रों को NEET (राष्ट्रीय चिकित्सा प्रवेश परीक्षा) के आधार पर प्रवेश दिए जाने का का विरोध किया था. यहीं से पूरा विवाद शुरू हुआ. कुल सीटें 50 थीं, जिसमें 42 पर कश्मीरी छात्रों को एडमिशन मिला था. हिंदू संगठनों ने मांग की थी कि इस कॉलेज को श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड से धनराशि मिलती है. ऐसे में कॉलेज की सभी सीटें हिंदुओं के लिए आरक्षित की जानी चाहिए.

जम्मू कश्मीर BJP ने आरक्षण की मांग करते हुए एक ज्ञापन उपराज्यपाल मनोज सिन्हा सौंपा था. इस मामले में अब्दुल्ला सरकार ने तर्क दिया कि SMVDIME एक गैर-अल्पसंख्यक संस्थान है. ऐसा इसलिए क्योंकि श्री माता वैष्णो देवी विश्वविद्यालय एक अस्थायी मेडिकल कॉलेज के रूप में भी कार्य करता था. इस कॉलेज को पिछले दो वर्षों में जम्मू-कश्मीर की 80 कनाल भूमि और 50 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता प्राप्त हुई थी.

34 एकड़ में फैले निर्माणाधीन SMVDIME पर कुल 350 करोड़ रुपये का खर्च होने का अनुमान है. इसमें अग्रणी नारायण सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल भी शामिल है, जो श्राइन बोर्ड के अधीन है.  जम्मू में अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIMS) के चालू होने से पहले इस क्षेत्र की गंभीर और विशेषीकृत स्वास्थ्य सेवाओं के लिए श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर आयुर्वेद संस्थान पर अत्यधिक निर्भरता थी.

NMC के जरिए इस कॉलेज की मान्यता रद्द होने के बाद यहां एडमिशन लेने वाले छात्र सदमे और निराशा से जूझ रहे हैं. यहां एडमिशन लेने वाले एक छात्र ने कहा, “हम अपनी ही दुनिया में खुश थे और आपस में हमारा अच्छा तालमेल था. हमारी कक्षाएं शुरू हो गई थी. प्रतिभाशाली शिक्षकों और असाधारण व्यावहारिक सुविधाओं के मार्गदर्शन में अध्ययन करने को लेकर हम खुश थे, लेकिन NEET परीक्षा पास करने के लिए किए गए अथक प्रयासों के बावजूद हमारा सपना टूट गया है.”

जम्मू-कश्मीर सरकार अब इन छात्रों को केंद्र शासित प्रदेश के अन्य मेडिकल कॉलेजों में अतिरिक्त सीटों के तहत एडमिशन देने पर विचार कर रही है. 7 जनवरी को इस मुद्दे पर सीएम अब्दुल्ला ने कहा, “लोग मेडिकल कॉलेज अपने यहां लाने के लिए संघर्ष करते हैं. यहां कुछ लोगों ने कॉलेज बंद करने के लिए संघर्ष किया. आपने जम्मू-कश्मीर के छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है और अगर यह विनाश आपको खुश करता है तो पटाखे फोड़िए. आपने धार्मिक आधार पर कॉलेज बंद करवा दिया है.”

मुख्यमंत्री अब्दुल्ला ने NMC मूल्यांकन में संस्थान के असफल होने के संबंध में इस कॉलेज के पदाधिकारियों और कुलाधिपति यानी उपराज्यपाल सिन्हा से भी मिलकर इस मामले में बात की. जम्मू-कश्मीर पर नजर रखने वालों के लिए यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर सत्ता समीकरण में आए बदलाव को उजागर करता है.

जिसमें BJP के दबदबे वाले जम्मू क्षेत्र में कई मुद्दों पर अब्दुल्ला भाजपा से टकराव से बचने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं. ऐसा शायद इसलिए भी क्योंकि वे जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस दिलाने के उद्देश्य को ध्यान में रख रहे हैं.
उदाहरण के तौर पर नायब तहसीलदार भर्ती में उर्दू भाषा अनिवार्य किए जाने के विरोध में BJP, बजरंग दल और अन्य समूहों के विरोध के कारण परीक्षा रद्द करनी पड़ी.

इसके बाद जम्मू में हुए विरोध प्रदर्शनों ने अब्दुल्ला सरकार को राष्ट्रीय स्तर की संतोष ट्रॉफी के लिए जम्मू-कश्मीर फुटबॉल टीम के चयनित खिलाड़ियों में कथित पक्षपात की जांच शुरू करने के लिए मजबूर किया, जिनमें से अधिकांश कश्मीरी खिलाड़ी थे. पूर्व मुख्यमंत्री और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने कहा, "यह जम्मू-कश्मीर राज्य के लोगों के जरिए भारत के साथ हाथ मिलाते समय लिए गए निर्णय से अलग है."  

वहीं, BJP ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताया है. जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विपक्ष के नेता सुनील कुमार शर्मा ने अब्दुल्ला पर इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने का आरोप लगाया है. शर्मा ने कहा, “हमारी चिंता सिर्फ इतनी है कि वहां (वैष्णो देवी मंदिर में) लोग वेदों और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए चढ़ावा चढ़ाते हैं. हम चाहते थे कि वहां एक गुरुकुल या वैदिक अनुसंधान केंद्र स्थापित हो.”

- कलीम गिलानी

Advertisement
Advertisement