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सिल्क्यारा टनल में फंसे मजदूरों की दिमागी सेहत पर एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

उत्तरकाशी के सिल्क्यारा टनल में 17 दिनों तक फंसे रहे 41 मजदूर जब बाहर निकले तो सबसे पहले उनके शारीरिक स्वास्थ्य की जांच हुई लेकिन एक्सपर्ट कहते हैं कि ऐसे मुश्किल हालात में रहे लोगों की मानसिक सेहत पर खास ध्यान देने की जरूरत होती है

सिल्क्यारा टनल से मजदूरों को निकालकर अस्पताल ले जाया गया
सिल्क्यारा टनल से मजदूरों को निकालकर अस्पताल ले जाया गया
अपडेटेड 30 नवंबर , 2023

उत्तरकाशी के सिल्क्यारा टनल में 41 मजदूर 17 दिनों तक फंसे रहे. इन 17 दिनों में टनल के भीतर और बाहर एक ही बेचैनी थी कि कैसे ये 41 लोग इससे बाहर आएं. इंटरनेट की दुनिया में ख़बरों की चहल-पहल थी. कहीं टनल पर एक्सप्लेनर लिखे जा रहे थे. कहीं मजदूरों की जिंदगी की कहानी सुनाई जा रही थी. सुरंग में लोगों के फंस जाने और फिर रेस्क्यू ऑपरेशन का किस्सा भी बुना जा रहा था. देखते ही देखते गूगल पर ट्रेंड हुआ थाईलैंड टनल हादसा.

जून, 2018 में थाईलैंड के थाम लुआंग गुफा में एक फुटबॉल टीम के बच्चे और उनके असिस्टेंट कोच इकापॉल चंथावॉन्ग फंस गए. ये जूनियर एसोसिएशन फुटबॉल टीम थी जो प्रैक्टिस में जुटी थी. टीम के सभी खिलाड़ियों की उम्र 11 से 18 साल के बीच थी. थाइलैंड और म्यांमार के बॉर्डर पर दोई नांग पहाड़ के नीचे करीब 10 किलोमीटर लंबी गुफा में 12 खिलाड़ी और 1 कोच पहुंच गए. थोड़ी ही देर बाद बारिश शुरू हो गई. गुफा में पानी भर गया. सभी लोग गुफा में फंस गए.

फास्ट फॉरवर्ड, इन 13 लोगों को गुफा से बाहर निकालने में 2 हफ्तों का वक्त लगा था. 10 हज़ार लोगों की टीम काम में लगी थी. 6 से ज्यादा देशों के टनल और रेस्क्यू एक्सपर्ट मौके पर मौजूद थे. कट टू 2023. उत्तरकाशी के सिल्क्यारा टनल में 41 मजदूर फंस गए. 17 दिन बाद बाहर आए. बाहर आए तो उन्हें प्राथमिक जांच के बाद ऋषिकेश एम्स ले जाया गया. जहां उन्हें डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया. मजदूरों की बीपी से लेकर ऑक्सीजन लेवल तक की जांच हुई. उत्तरकाशी के सीएमओ डॉ. आरसीएस पंवार ने बयान दिया है कि इन मजदूरों के मानसिक स्वास्थ्य की काउंसिलिंग भी हुई है.

टनल से बाहर निकले मजदूरों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ फोन पर बातचीत में कहा कि वे बिल्कुल ठीक हैं, उन्हें कोई समस्या नहीं है. लेकिन क्या वाकई ये सभी मजदूर ठीक हैं? या टनल से बाहर निकलने, अपने परिवार से दोबारा मिलने की खुशी उन्हें ठीक होने का एहसास करा रही है? क्या ये शोर खत्म होते ही टनल के भीतर बीते 17 दिन उनके लिए किसी भयावह सपने की तरह सामने आएंगे?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन पर मजदूरों से बातचीत की
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फोन पर मजदूरों से बातचीत की

मणिपाल हॉस्पिटल, गुरुग्राम की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट श्वेता शर्मा मानती हैं, “आने वाले दिनों में इन मजदूरों के सामने ये समस्या खड़ी होगी. इसकी इन्टेन्सिटी कम-ज्यादा हो सकती है. लेकिन उनके दिमाग में ये घटना डर के रूप में बैठी रहेगी. जिसके लिए जरूरी है कि कायदे से काउंसिलिंग कराई जाए.”

श्वेता कहती हैं, “जब ये मजदूर टनल में बंद थे तो इन्हें लाइट नहीं मिल रही थी. शुरू में इन्हें बहुत उम्मीद नहीं रही होगी कि ये बाहर निकल पाएंगे.ऐसे में दो चीजें होती हैं- आप पैनिक हो जाते हैं या फिर एकदम शांत हो जाते हैं. दोनों ही स्थिति खतरनाक है.” क्या आने वाले दिनों में मजदूरों पर इसका असर दिख सकता है? श्वेता का जवाब है, “अगले 6 महीने तक बहुत ध्यान रखना होगा इन पर. मजदूरों में पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) देखने को मिलेगा. जिसकी वजह किसी भी खतरे को लेकर उनका रिएक्शन पहले से अलग होगा.”

अंधेरा या फिर कोई बंद जगह इन मजदूरों के लिए ट्रिगर का काम करेगा, जिससे उन्हें पैनिक अटैक आ सकता है. हालांकि आईआईटी पटना के साइकॉलिजकल एक्सपर्ट आदित्य साहू इसे अलग ढ़ंग से देखते हैं. आदित्य कहते हैं, “ऐसी स्थिति मानसिक सेहत के लिए बेहद खतरनाक होती है. लेकिन सिल्क्यारा टनल में एक साथ 41 मजदूर थे इसलिए ये खतरा कम है. अगर एक या दो लोग फंसे होते तो दिक्कत ज्यादा होती.” आदित्य मानते हैं, “41 लोग एक साथ फंसे थे. इन सभी का व्यवहार अलग-अलग होगा. ऐसे में कुछ लोग होंगे जो बेहद डरे होंगे. तो कुछ लोग ऐसे होंगे जो थोड़े शांत और स्थिर किस्म के होंगे. इस तरह के लोगों की लीडरशिप क्वालिटी यहां काम आई होगी. इन लोगों ने अन्य मजदूरों को संभाला होगा.”

मजदूरों ने प्रधानमंत्री से फोन पर बातचीत में कहा कि वो टनल में टहलते थे, योग करते थे. ये सारी चीजें इसलिए ताकि ध्यान बंटा रहे और पैनिक ना हो. श्वेता शर्मा कहती हैं, “साइकोलॉजिकल समस्याओं को लेकर हम बहुत कम जागरुक हैं, इसलिए हम समझ नहीं पाते. लेकिन इन मजदूरों ने जिस स्थिति का सामना किया है वो आगे ट्रिगर कर सकती है.” अब बारी इस समस्या से निपटने की. एक्सपर्ट तो क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से काउंसिलिंग की बात करते हैं. ऐसा नहीं होने पर कुछ प्रैक्टिस हैं जिन्हें ये मजदूर खुद भी फॉलो कर सकते हैं.

श्वेता शर्मा समाधान बताती हैं, “हमें इन मजदूरों को टनल से निकालने के बाद आराम देना चाहिए था, इतने मीडिया और तमाम बातचीत से बचना चाहिए था ताकि वे अपने सेन्स को फील करते. अब उनके परिवार के लोगों से ये सपोर्ट मिलना चाहिए कि अगर मजदूर उस हादसे के बारे में बात करना चाहता है तो उसे बोलने दें और पूरी तरह खुद को अभिव्यक्त करने दें.”

17 दिन का वक्त कम नहीं होता. जान चली जाने वाली हालत में 17 दिन गुजारना एक ऐसे हादसे की तरह है जिसे भूल पाना मुश्किल काम है. ऐसे में परिवार की जिम्मेदारी है कि मजदूरों से बातचीत करें, उनके कम्फर्ट के मुताबिक. जिससे उनके मन में घर कर चुका 17 दिनों का डर कम हो सके.

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