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योगी सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार : क्या है गणित, एक और डिप्टी सीएम की चर्चा क्यों छिड़ी?

कोर कमेटी बैठक के बाद योगी सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाएं तेज हैं. छह खाली पदों के साथ नए चेहरों की इंट्री, विभागों में फेरबदल और 2027 चुनावी संतुलन पर नजर है

योगी आदित्यनाथ अपने दो उपमुख्यमंत्रियों के साथ (फाइल फोटो)
अपडेटेड 2 जनवरी , 2026

लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर हलचल तेज है. योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर चर्चाएं सिर्फ कयास नहीं रह गई हैं, बल्कि इसके पीछे ठोस राजनीतिक और संगठनात्मक संकेत दिखने लगे हैं. 

30 दिसंबर को मुख्यमंत्री आवास पर हुई कोर कमेटी की बैठक को इन्हीं संकेतों की अहम कड़ी माना जा रहा है. इसमें नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की मौजूदगी और उसके तुरंत बाद उनका दिल्ली रवाना होना, पार्टी के भीतर चल रही तैयारियों की ओर इशारा करता है. 

BJP के सूत्रों का कहना है कि मकर संक्रांति के बाद कभी भी मंत्रिमंडल विस्तार का ऐलान हो सकता है, बशर्ते केंद्रीय नेतृत्व से अंतिम हरी झंडी मिल जाए. वर्तमान स्थिति की बात करें तो योगी मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री समेत कुल 54 मंत्री हैं, जबकि संवैधानिक रूप से अधिकतम 60 मंत्रियों की अनुमति है. यानी छह पद फिलहाल खाली हैं. 

इन छह पदों को भरने का सवाल सिर्फ संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है. पार्टी इसे 2027 के विधानसभा चुनाव और उससे पहले होने वाले पंचायत चुनावों की रणनीतिक तैयारी के तौर पर देख रही है. यही वजह है कि मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर क्षेत्रीय संतुलन, जातीय समीकरण और संगठनात्मक संदेश, तीनों पहलुओं पर बारीकी से मंथन हो रहा है. 

BJP के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि यह विस्तार सरकार के दूसरे चरण की दिशा तय करेगा. उनके मुताबिक, “यह सिर्फ नए चेहरे लाने की कवायद नहीं है, बल्कि यह तय करने की कोशिश है कि चुनावी साल में सरकार किन प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ेगी. कुछ विभागों का पुनर्गठन और कुछ मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा भी इसी का हिस्सा है.”

पश्चिमी यूपी का दबाव और राजनीतिक गणित

मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का नाम सबसे पहले लिया जा रहा है. इसकी बड़ी वजह यह है कि यह इलाका राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है. जाट, गुर्जर, त्यागी और मुस्लिम मतदाताओं का मिश्रण, साथ ही हाल के चुनावों में बदलते समीकरण BJP के लिए लगातार चुनौती बने रहे हैं. पार्टी नेतृत्व मानता है कि पश्चिमी यूपी को मजबूत संदेश दिए बिना 2027 की राह आसान नहीं होगी. इसी संदर्भ में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी का नाम सबसे आगे चल रहा है. 
संगठन की कमान संभालने से पहले वे पंचायती राज मंत्री रह चुके हैं और जाट समुदाय से आते हैं.  पार्टी सूत्रों का कहना है कि भूपेंद्र चौधरी को केंद्रीय संगठन में प्रमुखता से जगह दी जा सकती है या फिर उनकी योगी सरकार में वापसी हो सकती है, ताकि पश्चिमी यूपी के जाट मतदाताओं को यह संदेश दिया जा सके कि पार्टी उनके प्रतिनिधित्व को गंभीरता से ले रही है.

पश्चिमी यूपी से ही एक बड़े गुर्जर नेता अशोक कटारिया का नाम भी चर्चा में है. गुर्जर समाज की नाराजगी समय-समय पर सामने आती रही है और सपा पश्च‍िमी यूपी में तेजी के साथ गुर्जर समुदाय पर डोरे डालने में जुटी है. ऐसे में इस समुदाय से किसी मजबूत चेहरे को मंत्रिमंडल में जगह देना पार्टी के लिए संतुलन साधने का तरीका हो सकता है. लखनऊ से दिल्ली तक चल रही दावेदारी की इस दौड़ में पश्चिमी यूपी के कई विधायक और नेता सक्रिय लॉबिंग में जुटे हुए हैं. 

पूर्वी यूपी और क्षेत्रीय संतुलन

जहां पश्चिमी यूपी को लेकर दबाव है, वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी पार्टी के लिए जोखिम भरा हो सकता है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, दोनों ही पूर्वी यूपी से आते हैं. 

ऐसे में पार्टी के भीतर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए क्षेत्रीय असंतुलन को दूर किया जाएगा. BJP के एक रणनीतिकार का कहना है, “पूर्वी यूपी से नेतृत्व पहले से मजबूत है, इसलिए वहां से नए चेहरों की संख्या सीमित रखी जा सकती है. फोकस उन क्षेत्रों पर होगा, जहां पार्टी को राजनीतिक संदेश देने की ज्यादा जरूरत है.” हालांकि, पूर्वी यूपी के कुछ ओबीसी और दलित नेताओं के नाम भी संभावित सूची में बताए जा रहे हैं, ताकि सामाजिक संतुलन बना रहे.
 
जातीय समीकरण और आंकड़ों की राजनीति

योगी सरकार में मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा के साथ ही जातीय प्रतिनिधित्व को लेकर बहस भी तेज हो गई है. खासकर ब्राह्मण समाज को लेकर यह तर्क अक्सर सामने आता रहा है कि योगी सरकार में उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला. लेकिन आंकड़े इस दावे को पूरी तरह सही नहीं ठहराते. 

वर्तमान योगी मंत्रिपरिषद में 54 मंत्रियों में से सात ब्राह्मण हैं, जो कुल संख्या का लगभग 13 फीसदी है. राज्य की कुल आबादी में ब्राह्मणों की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी से थोड़ी अधिक मानी जाती है. इसी तरह ठाकुर समुदाय के भी सात मंत्री हैं. सीधे शब्दों में कहें तो योगी कैबिनेट में ब्राह्मण और ठाकुर संख्या के लिहाज से लगभग बराबरी पर हैं. बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय लखनऊ में इतिहास विभाग के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक सुशील पांडेय के मुताबिक BJP नहीं चाहती कि उच्च जातियों के इन दोनों प्रमुख स्तंभों में से कोई खुद को हाशिए पर महसूस करे. 
पांडेय कहते हैं, “ब्राह्मण और ठाकुर दोनों को बराबरी पर रखकर पार्टी ने आंतरिक संतुलन साधा है. इससे किसी एक वर्ग को यह कहने का मौका नहीं मिलता कि उसे जानबूझकर नजरअंदाज किया गया.” 

हालां‍कि BJP योगी सरकार में शामिल ब्राह्मण और ठाकुर समुदाय के मंत्रियों को बदलकर उनकी जगह इसी जाति के प्रभावी चेहरों को मंत्र‍िमंडल में शामिल कर सकती है लेकिन ब्राह्मण व ठाकुर मंत्रियों की कुल संख्या में कोई बदलाव नहीं होगा. इसी गणित के चलते रायबरेली से समाजवादी पार्टी के बागी विधायक मनोज पांडे को भी एक मजबूत दावेदार माना जा रहा है.

वैश्य समुदाय का प्रतिनिधित्व पांच मंत्रियों के जरिए है, जबकि भूमिहार समुदाय से दो मंत्री शामिल हैं. ओबीसी वर्ग की बात करें तो 20 मंत्री इस श्रेणी से आते हैं, जो कुल मंत्रिपरिषद का करीब 37 फीसदी है. यह आंकड़ा राज्य में ओबीसी आबादी की बड़ी हिस्सेदारी को देखते हुए राजनीतिक रूप से अहम माना जाता है. दलित समुदाय से सात मंत्री हैं, यानी लगभग 13 फीसदी प्रतिनिधित्व. पांडेय के मुताबिक, “ये आंकड़े दिखाते हैं कि BJP ने स्पष्ट रूप से ओबीसी-नेतृत्व वाले संगठनात्मक कोर की ओर कदम बढ़ाया है, लेकिन साथ ही ऊंची जातियों का संतुलन भी बनाए रखा है.”

तीसरे उपमुख्यमंत्री की अटकलें

मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा में सबसे दिलचस्प पहलू तीसरे उपमुख्यमंत्री की संभावित नियुक्ति को लेकर है. फिलहाल सरकार में दो उपमुख्यमंत्री हैं. केशव प्रसाद मौर्य ओबीसी वर्ग से आते हैं, जबकि बृजेश पाठक ब्राह्मण समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं. नए प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी भी ओबीसी वर्ग से हैं. 

ऐसे में पार्टी के भीतर यह विचार चल रहा है कि सामाजिक संतुलन के लिहाज से अनुसूचित जाति समुदाय से एक उपमुख्यमंत्री बनाया जाए. BJP के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, “दलित समाज का प्रतिनिधित्व सरकार में है, लेकिन अगर तीसरा उपमुख्यमंत्री इसी वर्ग से बनाया जाता है तो यह एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा. खासकर पंचायत और विधानसभा चुनाव से पहले.” इस लिहाज के मध्य और पूर्वी यूपी के तीन दलित नेताओं के नाम चर्चा में हैं. दलितों में पासी समुदाय के नेताओं पर दांव लगाए जाने की सबसे ज्यादा संभावना है. लोकसभा चुनाव में सपा ने पासी समाज के मतों में खासी सेंधमारी की थी. हालांकि, इस मुद्दे पर अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है. कुछ नेता मानते हैं कि उपमुख्यमंत्री की संख्या बढ़ाना प्रशासनिक तौर पर जरूरी नहीं, जबकि अन्य इसे राजनीतिक निवेश के तौर पर देख रहे हैं.

विभागों में बदलाव और प्रदर्शन का सवाल

मंत्रिमंडल विस्तार के साथ-साथ विभागों में फेरबदल की भी चर्चा है. सूत्रों के मुताबिक, कुछ ऐसे विभाग हैं जहां से लगातार गड़बड़ियों और विवादों की खबरें सामने आई हैं. वहीं कुछ विभागों में कर्मचारी आंदोलनों और प्रदर्शन का सिलसिला भी थमा नहीं है. ऐसे में पार्टी नेतृत्व इन विभागों के मंत्रियों के कामकाज की समीक्षा कर रहा है. BJP के एक नेता का कहना है, “यह तय है कि जिन मंत्रियों के विभागों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं रहा है, वहां बदलाव हो सकता है. सरकार अब चुनावी मोड में है और किसी भी तरह की नकारात्मक छवि से बचना चाहती है.” यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि उपमुख्यमंत्रियों के विभागों में आंशिक बदलाव हो सकता है, ताकि शासन की गति तेज की जा सके और चुनाव से पहले बड़े फैसलों को जमीन पर उतारा जा सके.

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