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पुलिस भर्ती में आयु सीमा बढ़ाने को क्यों मजबूर हुई योगी सरकार?

लंबे समय से भर्ती में देरी से नाराज़ युवाओं को साधने के लिए योगी सरकार ने पुलिस भर्ती में एक बार तीन साल की आयु छूट दी लेकिन इसकी अपनी और चुनौतियां हैं

up police constable bharti
उत्तर प्रदेश में पुलिस विभाग के 32,679 पदों पर भर्ती होनी है
अपडेटेड 6 जनवरी , 2026

पूर्वी उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले के रहने वाले एक 25 वर्षीय युवा की बढ़ती उम्र यूपी पुलिस में शामिल होने के सपने पर सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ी हो गई थी. 2018 में जब यूपी पुलिस में PAC और जेल वार्डर की आखिरी बड़ी भर्ती हुई थी, तब वह पात्र था. इसके बाद उसने लगातार तैयारी की, शारीरिक दक्षता से लेकर लिखित परीक्षा तक की मेहनत जारी रखी. लेकिन भर्ती नहीं आई. 

जब दिसंबर 2025 में नई भर्ती निकली, तो वह सामान्य वर्ग के लिए तय 22 साल की ऊपरी आयु सीमा से बाहर हो चुका था. ऐसे हजारों नहीं, बल्कि लाखों युवा हैं, जिनकी तैयारी सालों से चल रही थी लेकिन भर्ती चक्र में देरी ने उन्हें “ओवरएज” बना दिया. यही वह पृष्ठभूमि है, जहां से आयु छूट की मांग ने जोर पकड़ा.

उत्तर प्रदेश में पुलिस भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए जनवरी 2026 का पहला हफ्ता लंबे इंतज़ार के बाद राहत लेकर आया. 32,679 पुलिस पदों पर चल रही सीधी भर्ती में अधिकतम आयु सीमा को लेकर उठा विवाद आखिरकार सरकार के फैसले पर आकर थमा. योगी आदित्यनाथ सरकार ने एक बार के लिए सभी वर्गों के अभ्यर्थियों को तीन साल की आयु छूट देने का आदेश जारी किया. यह फैसला सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं था, बल्कि इसके पीछे वर्षों की भर्ती देरी, युवाओं का दबाव और चुनावी साल की राजनीतिक ज़रूरतें साफ झलकती हैं. 

छूट का मतलब क्या है 

योगी सरकार के इस फैसले का सीधा असर आयु सीमा पर पड़ा. सामान्य वर्ग के पुरुष उम्मीदवारों के लिए ऊपरी आयु सीमा 18-22 से बढ़ाकर 18-25 साल कर दी गई. सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए यह 18-25 से बढ़कर 18-28 हो गई. ओबीसी, एससी और एसटी पुरुष उम्मीदवारों के लिए आयु सीमा 18-27 से बढ़कर 18-30 साल कर दी गई, जबकि इन वर्गों की महिलाओं के लिए यह 18-30 से बढ़कर 18-33 साल हो गई. 

इसका मतलब यह हुआ कि जो उम्मीदवार सिर्फ उम्र की वजह से बाहर हो चुके थे, वे फिर से इस भर्ती प्रक्रिया में शामिल हो सकते हैं. आवेदन की अंतिम तिथि 30 जनवरी तय की गई है, जिससे ऐसे उम्मीदवारों को तैयारी और आवेदन का पर्याप्त समय मिल सके.

सरकार का फैसला : मजबूरी या रणनीति?

सरकार के फैसले के पीछे पहली और सबसे बड़ी वजह भर्ती में लंबा अंतराल है. यूपी पुलिस में PAC और जेल वार्डन जैसे पदों पर आखिरी बड़ी भर्ती 2018 में हुई थी. इसके बाद करीब सात साल तक इन पदों पर नियमित भर्ती नहीं हो सकी. इस दौरान न सिर्फ उम्र बढ़ती गई, बल्कि युवाओं में यह भावना भी गहराती गई कि सिस्टम उनकी मेहनत की अनदेखी कर रहा है. 

दूसरी वजह लगातार बढ़ता दबाव था. 31 दिसंबर 2025 को जैसे ही भर्ती विज्ञप्ति जारी हुई, सोशल मीडिया पर आयु छूट की मांग तेज हो गई. धरना-प्रदर्शन हुए, ज्ञापन दिए गए. यह मुद्दा सिर्फ विपक्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सत्ता पक्ष के विधायकों ने भी इसे गंभीरता से उठाया. देवरिया सदर से BJP विधायक शलभ मणि त्रिपाठी और निषाद पार्टी के विधायक अनिल कुमार त्रिपाठी ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर साफ कहा कि सामान्य वर्ग के युवाओं पर भर्ती में देरी का सबसे ज्यादा असर पड़ा है. उनके मुताबिक, यह युवाओं की योग्यता नहीं, बल्कि सिस्टम की सुस्ती है, जिसने उन्हें आयु सीमा से बाहर कर दिया. तीसरी वजह राजनीतिक थी. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले युवा वर्ग को नाराज़ छोड़ना सरकार के लिए जोखिम भरा हो सकता था. खासतौर पर सामान्य वर्ग के युवाओं में पनप रहा असंतोष एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका था.

विधायकों ने कैसे बनाया दबाव 

31 दिसंबर को लिखे पत्र में विधायक शलभ मणि त्रिपाठी ने मुख्यमंत्री को याद दिलाया कि बड़ी संख्या में सामान्य वर्ग के युवा सिर्फ ऊपरी आयु सीमा की वजह से भर्ती से बाहर हो रहे हैं, जबकि वे वर्षों से पूरी लगन से तैयारी कर रहे हैं. उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि भर्ती में देरी सरकार और व्यवस्था की वजह से हुई है, लेकिन उसकी सज़ा उम्मीदवार भुगत रहे हैं. 

वहीं अनिल कुमार त्रिपाठी ने अपने पत्र में 2018 के बाद से भर्ती न होने का हवाला देते हुए कहा कि हजारों युवा अब आयु सीमा पार कर चुके हैं. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि जनता दरबारों में मुख्यमंत्री ने तीन साल की छूट का आश्वासन दिया था, लेकिन विज्ञप्ति में इसका जिक्र नहीं था. इन पत्रों के बाद सरकार पर भीतर और बाहर दोनों तरफ से दबाव बढ़ा. नतीजा यह हुआ कि 5 जनवरी 2026 को शासनादेश जारी कर आयु छूट लागू कर दी गई.

फैसले का असर क्या होगा

सरकारी आकलन के मुताबिक, इस फैसले से करीब 8 से 10 लाख अतिरिक्त अभ्यर्थी आवेदन कर सकते हैं. पहले जहां लगभग 30 लाख आवेदन आने का अनुमान था, अब यह संख्या 40 लाख के आसपास पहुंच सकती है. पिछले अनुभव भी इसी ओर इशारा करते हैं. जब कोरोना काल में सिपाही भर्ती में तीन साल की छूट दी गई थी, तब 60 हजार पदों के लिए करीब 48 लाख आवेदन आए थे. इस बार पदों की संख्या कम है, लेकिन आयु छूट की वजह से प्रतिस्पर्धा बेहद कड़ी होने की संभावना है. 

राजनीतिक विश्लेषक विनम्र वीर सिंह कहते हैं, “प्रशासनिक स्तर पर यह फैसला दोधारी तलवार की तरह है. एक तरफ सरकार यह कह सकती है कि उसने युवाओं के साथ न्याय किया. दूसरी तरफ आवेदन की संख्या बढ़ने से परीक्षा आयोजन, चयन प्रक्रिया और समयबद्ध नतीजों की चुनौती भी बढ़ेगी. हाल के वर्षों में परीक्षाओं में पेपर लीक और देरी जैसे मुद्दे सरकार के लिए सिरदर्द रहे हैं. इतनी बड़ी संख्या में आवेदनों को संभालना भर्ती बोर्ड के लिए आसान नहीं होगा.” 

हालांकि तीन साल की आयु छूट से लाखों युवाओं को राहत मिली है, लेकिन यह एक बार का उपाय है. असली सवाल यह है कि क्या भविष्य में भर्तियां समय पर होंगी. अगर अगले कुछ वर्षों में फिर लंबा अंतराल आया, तो यही मांग दोबारा उठेगी. विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को अब एक स्पष्ट और नियमित भर्ती कैलेंडर लागू करना होगा, ताकि हर बार आयु छूट जैसे अस्थायी फैसलों की जरूरत न पड़े.

चुनावी साल में इसके राजनीतिक मायने

यह फैसला ऐसे वक्त आया है, जब प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव का चुनावी माहौल धीरे-धीरे आकार लेने लगा है. उत्तर प्रदेश में युवा मतदाता बड़ी संख्या में हैं और सरकारी नौकरी का मुद्दा सीधे उनके जीवन से जुड़ा है. सरकार इस फैसले को “युवा हितैषी” कदम के रूप में पेश कर रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद सोशल मीडिया पर इसे युवाओं की मेहनत और उम्मीदों के सम्मान से जोड़कर देखा. वहीं विपक्ष इसे दबाव की जीत बता रहा है. समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि जनता के गुस्से के सामने सरकार को झुकना पड़ा और यह संघर्षरत उम्मीदवारों की एकता का नतीजा है. 

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला खासतौर पर सामान्य वर्ग के युवाओं को साधने की कोशिश है, जिनमें पिछले कुछ समय से नाराज़गी देखी जा रही थी. लखनऊ में ब्राह्मण समाज के BJP विधायकों और एमएलसी की डिनर मीटिंग के बाद इस फैसले का आना भी सियासी संकेत देता है.

यह फैसला बताता है कि सरकारी भर्ती सिर्फ नौकरी का सवाल नहीं, बल्कि सीधे तौर पर राजनीति और जनभावनाओं से जुड़ा मुद्दा है. आने वाले समय में सरकार इस राहत को स्थाई सुधार में बदल पाती है या नहीं, यही तय करेगा कि यह कदम सिर्फ चुनावी राहत था या वाकई सिस्टम में बदलाव की शुरुआत.

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