उत्तर प्रदेश में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद जारी हुई ड्राफ्ट वोटर लिस्ट ने सूबे की राजनीति में नया सियासी तूफान खड़ा कर दिया है. एक तरफ विपक्षी दल इसे जल्दबाजी, लापरवाही और संभावित साजिश करार दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय न सिर्फ आरोपों को खारिज कर रहा है, बल्कि सोशल मीडिया पर तीखे, व्यंग्यात्मक और असामान्य जवाब देकर बहस का रुख ही बदलता दिख रहा है.
6 जनवरी को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी होते ही यह साफ हो गया कि इस बार SIR सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रहने वाली. आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 2.89 करोड़ वोटरों के नाम ड्राफ्ट लिस्ट से बाहर हैं. इतने बड़े पैमाने पर नाम कटने की खबर सामने आते ही विपक्ष ने सवालों की झड़ी लगा दी. समाजवादी पार्टी (सपा), कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने अलग-अलग अंदाज में इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया.
सबसे पहले समाजवादी पार्टी ने सोशल मीडिया के जरिए मोर्चा खोला. पार्टी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने X पर एक रहस्यमयी पोस्ट लिखी, “लोग कहां चले गए?” यह एक पंक्ति कई सवालों को जन्म देने के लिए काफी थी. इसके बाद सपा की मीडिया सेल ने सीधे चुनाव आयोग और यूपी के CEO को घेरते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पुराने बयान का हवाला दिया. सपा का आरोप था कि मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि करीब 4 करोड़ वोटर लिस्ट से हटाए जा रहे हैं, इसके बाद आयोग सक्रिय हुआ और आनन-फानन में करीब 1 करोड़ नाम जोड़ दिए गए.
सपा ने पूछा कि ये एक करोड़ वोटर अचानक कहां से आए. क्या पहले बेईमानी हो रही थी या बाद में. या फिर चुनिंदा तरीके से प्रक्रिया को प्रभावित किया गया. पार्टी ने यह भी चेतावनी दी कि मामला कोर्ट गया तो इन सवालों का जवाब देना आसान नहीं होगा. कांग्रेस ने भी इसी सुर में सरकार और आयोग पर निशाना साधा, लेकिन उसकी भाषा ज्यादा राजनीतिक और भावनात्मक रही. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि लगभग 3 करोड़ वोटरों के नाम हटना एक बड़े राज्य में जल्दबाजी का नतीजा है. उनका आरोप था कि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और जटिल राज्य को भी उतना ही समय दिया गया जितना छोटे राज्यों को, जो अपने आप में संदेह पैदा करता है. उन्होंने इसे यूपी को कमजोर करने की साजिश बताते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाना राज्य के लोगों का अपमान है.
BSP ने भी आपत्तियां दर्ज कराईं, हालांकि उसका रुख अपेक्षाकृत संयमित रहा. दिलचस्प यह है कि ड्राफ्ट लिस्ट जारी होने के बाद दावों और आपत्तियों की प्रक्रिया शुरू होते ही पहले दिन सबसे ज्यादा आवेदन BJP की ओर से आए. आयोग के मुताबिक, पहले दिन कुल 128 दावे और आपत्तियां मिलीं, जिनमें से 103 BJP, 17 बसपा और सिर्फ 6 समाजवादी पार्टी से थीं. यह आंकड़ा भी सियासी बहस का हिस्सा बन गया.
इन तमाम आरोपों और राजनीतिक हमलों के बीच चुनाव आयोग और यूपी के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने रक्षात्मक चुप्पी साधने के बजाय खुलकर जवाब देना चुना. CEO कार्यालय ने सोशल मीडिया पर विस्तार से बताया कि नवंबर के दूसरे हफ्ते में राज्य स्तरीय बैठक में सभी राजनीतिक दलों को प्रक्रिया की जानकारी दी गई थी. उसी बैठक में समाजवादी पार्टी समेत अन्य दलों ने समयसीमा दो हफ्ते बढ़ाने का अनुरोध किया था, जिसे आगे भेजा गया. इन अतिरिक्त 15 दिनों में जिन वोटरों के नाम हटने थे, उनकी सूची बूथ लेवल एजेंटों (BLA) को दी गई.
CEO के मुताबिक, इसी अवधि में 8 से 9 लाख नए नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में जोड़े गए. आयोग ने यह भी साफ किया कि ड्राफ्ट लिस्ट जारी होने से पहले ही जोड़ने के लिए करीब 16 लाख फॉर्म-6 और हटाने के लिए लगभग 49 हजार फॉर्म-7 प्राप्त हो चुके थे. आयोग का कहना है कि पूरी प्रक्रिया नियमों के तहत, राजनीतिक दलों की भागीदारी में और पारदर्शी तरीके से की गई.
लेकिन इस बार आयोग का जवाब सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा. समाजवादी पार्टी द्वारा लगाए गए बार-बार के आरोपों पर तंज कसते हुए CEO UP ने Aesop’s Fables की मशहूर कहानी “The Boy Who Cried Wolf” का जिक्र कर दिया. यह उदाहरण आते ही बहस और तेज हो गई. आयोग ने संकेत दिया कि जिस तरह उस कहानी में एक लड़का बार-बार झूठा अलार्म बजाकर लोगों का भरोसा खो देता है, उसी तरह बार-बार बेईमानी के आरोप लगाने से उनकी गंभीरता खत्म हो जाती है. इस ‘भेड़िया’ वाली कहानी ने चुनाव आयोग की छवि को एक अलग ही अंदाज में पेश किया.
आमतौर पर बेहद औपचारिक और तकनीकी भाषा में बात करने वाला आयोग इस बार व्यंग्य और साहित्यिक संदर्भों के जरिए जवाब देता दिखा. समर्थकों का कहना है कि आयोग ने यह दिखाने की कोशिश की है कि हर बार शोर मचाने से सच्चाई नहीं बदलती, और अगर हर प्रक्रिया को साजिश कहा जाएगा तो असली समस्याओं पर भरोसा ही नहीं बचेगा.
विपक्ष इसे आयोग की गंभीरता पर सवाल के तौर पर देख रहा है. सपा नेताओं का कहना है कि संवैधानिक संस्था को आंकड़ों और तथ्यों से बात करनी चाहिए, न कि कथाओं और तंज से. उनका तर्क है कि जब करोड़ों वोटरों के नाम कटने जैसे गंभीर मुद्दे पर सवाल उठ रहे हों, तब ‘भेड़िया आया’ जैसी कहानी विपक्ष की चिंताओं को हल्का बताने की कोशिश है. दरअसल, SIR की प्रक्रिया अपने आप में जटिल और संवेदनशील है. इसका उद्देश्य फर्जी, मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट वोटरों को हटाना और योग्य मतदाताओं को जोड़ना होता है. लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां मतदाताओं की संख्या करोड़ों में है और सामाजिक-राजनीतिक समीकरण बेहद नाजुक हैं, वहां हर आंकड़ा राजनीतिक मायने ले लेता है.
ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी होना प्रक्रिया का अंतिम चरण नहीं है. इसके बाद दावे और आपत्तियों का लंबा दौर चलता है, जिसमें नाम जुड़ते भी हैं और गलत कटे नाम वापस भी आते हैं. चुनाव आयोग यही तर्क दे रहा है कि ड्राफ्ट लिस्ट को अंतिम सच की तरह पेश करना गलत है. आयोग का कहना है कि विपक्षी दलों को आरोप लगाने के बजाय अपने बूथ लेवल एजेंटों को सक्रिय करना चाहिए, ताकि वास्तविक वोटरों के नाम समय रहते जोड़े जा सकें. फिर भी, विपक्ष का सवाल अपनी जगह कायम है. उसका कहना है कि जब मुख्यमंत्री खुद करोड़ों नाम हटने की बात कहते हैं और बाद में आयोग करोड़ों नाम जोड़ने की जानकारी देता है, तो संदेह पैदा होना स्वाभाविक है.
यह बहस सिर्फ आंकड़ों की नहीं, भरोसे की भी है. फिलहाल, यूपी की सियासत में वोटर लिस्ट एक बार फिर केंद्र में है. सोशल मीडिया पर बहस तेज है, राजनीतिक दल अपने-अपने तर्क गिना रहे हैं और चुनाव आयोग अपनी प्रक्रिया का बचाव कर रहा है. ‘भेड़िया’ वाली कहानी इस पूरे विवाद का प्रतीक बन गई है, जहां एक पक्ष कह रहा है कि बार-बार शोर मचाया जा रहा है, और दूसरा पक्ष कह रहा है कि इस बार सच में खतरा है. आने वाले हफ्तों में जब दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और अंतिम वोटर लिस्ट सामने आएगी, तब यह साफ होगा कि यह विवाद सिर्फ सियासी शोर था या लोकतंत्र से जुड़े किसी गहरे सवाल का संकेत.
फिलहाल इतना तय है कि यूपी में SIR और ड्राफ्ट वोटर लिस्ट ने चुनाव आयोग को सीधे राजनीतिक रणभूमि के बीच ला खड़ा किया है, जहां हर जवाब, हर आंकड़ा और यहां तक कि हर कहानी भी सियासी अर्थ लेने लगी है.

