उत्तर प्रदेश का संभल जिला एक बार फिर चर्चा में है. पिछले साल हुए दंगे और उसके बाद आई जांच रिपोर्ट ने न सिर्फ स्थानीय प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए हैं, बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति को झकझोर दिया है. दंगों के दौरान हुई हिंसा, प्रशासनिक चूक और राजनीतिक दलों की बयानबाजी अब राज्य की सियासत में बड़ा मुद्दा बन चुकी है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग ने 28 अगस्त को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संभल में नवंबर 2024 में हुई हिंसा पर अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी. यह रिपोर्ट दो हिस्सों में तैयार की गई है.
पश्चिमी यूपी के जिले संभल में विवाद पिछले साल 19 नवंबर से शुरू हुआ, जब हिंदू याचिकाकर्ताओं ने संभल जिला अदालत में एक मुकदमा दायर किया था. इसमें दावा किया गया था कि शाही जामा मस्जिद हरिहर मंदिर के ऊपर बनाई गई थी. उसी दिन अदालत के आदेश पर एक सर्वेक्षण किया गया था और तब से संभल का माहौल तनावपूर्ण हो गया.
24 नवंबर, 2024 को, दूसरे सर्वेक्षण के दौरान हिंसा भड़क उठी जब प्रदर्शनकारी मस्जिद के पास इकट्ठा हुए. इस मस्जिद के बारे में माना जाता है कि इसका निर्माण सन 1529 में हुआ था. जब यहां भीड़ इकट्ठी हुई तो उसकी पुलिस के साथ झड़प शुरू हो गई. इसी दौरान पथराव और आगजनी की घटनाएं भी सामने आईं और चार लोगों की मौत हो गई. इस घटना में कुछ पुलिसकर्मी और आम लोग भी घायल हुए.
संभल, जो कभी अपने हस्तशिल्प और सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता था, अचानक देशभर की सुर्खियों में आ गया. बाद के दिनों में, पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई शुरू की और कम से कम 96 आरोपियों को गिरफ्तार किया. इनमें तीन हत्या के संदिग्ध और तीन महिलाएं शामिल थीं. समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद जियाउर्रहमान बर्क और मस्जिद समिति के प्रमुख ज़फर अली के साथ-साथ 2,700 से अधिक अज्ञात संदिग्धों पर भी हिंसा के सिलसिले में मामला दर्ज किया गया
संभल में हुए दंगे की तह तक जाने के लिए यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने न्यायमूर्ति अरोड़ा की अध्यक्षता में आयोग का गठन 28 नवंबर, 2024 को किया गया था. इसमें सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी (1979 बैच) अरविंद कुमार जैन और पूर्व आईएएस अधिकारी (1989 बैच) अमित मोहन प्रसाद भी शामिल थे. इसके सदस्यों ने पिछले साल 1 दिसंबर से कई बार संभल का दौरा किया है. उस दिन उन्होंने पहली बार कोट गर्वी और शाही जामा मस्जिद सहित हिंसा प्रभावित इलाकों का दौरा किया था और गवाहों के बयान दर्ज किए थे.
आयोग को न सिर्फ दंगे की असली वजहें तलाशनी थीं, बल्कि पिछले तीन दशकों के सांप्रदायिक इतिहास और जनसांख्यिकीय बदलावों का भी अध्ययन करना था. आठ महीने की जांच, गवाहों के बयान और हजारों पन्नों के दस्तावेज़ खंगालने के बाद आयोग ने 28 अगस्त 2025 को मुख्यमंत्री को अपनी रिपोर्ट सौंपी. यह रिपोर्ट जैसे ही सार्वजनिक हुई, उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई.
रिपोर्ट ने साफ-साफ कहा कि प्रशासन और पुलिस के स्तर पर गंभीर लापरवाही हुई. लोकल इंटेलिजेंस ने पहले ही चेतावनी दी थी कि मस्जिद परिसर में तनाव की आशंका है, लेकिन जिला प्रशासन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. पर्याप्त पुलिस बल तैनात नहीं किया गया. हिंसा भड़कने के बाद कार्रवाई देर से हुई. कई सीसीटीवी फुटेज समय पर जब्त नहीं की गईं. आयोग ने यह भी दर्ज किया कि कई राजनैतिक तत्वों ने भीड़ को भड़काने में अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई. स्थानीय नेताओं के भाषणों और मौजूदगी ने स्थिति को और खराब किया.
रिपोर्ट का सबसे विस्फोटक हिस्सा है जनसांख्यिकीय बदलाव का जिक्र. आयोग ने बताया कि 1947 में संभल की आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी करीब 45 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 15-20 प्रतिशत रह गई है. लगातार दंगों, असुरक्षा और प्रशासनिक उदासीनता की वजह से हिंदू समुदाय ने यहां से पलायन किया. कई परिवारों ने आयोग के सामने गवाही दी कि उन्हें धमकियां मिलीं, उनका कारोबार ठप हुआ और धीरे-धीरे उन्होंने शहर छोड़ दिया. ये निष्कर्ष जैसे ही सार्वजनिक हुए, प्रदेश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की बहस छिड़ गई.
आयोग ने सोशल मीडिया की भूमिका को भी उजागर किया. दंगे के दौरान 150 से ज्यादा फर्जी अकाउंट से भड़काऊ वीडियो और संदेश फैलाए गए. इनमें पुराने दंगों की तस्वीरें भी शामिल थीं. अफवाहें इतनी तेजी से फैलीं कि पुलिस का नियंत्रण टूट गया. आयोग ने साइबर पुलिस को भी लापरवाह ठहराया और सिफारिश की कि डिजिटल मॉनिटरिंग को आधुनिक तकनीक से लैस किया जाए. दंगों का आर्थिक असर भी गहरा रहा. कई दुकानदारों ने आयोग को बताया कि हर त्यौहार पर उन्हें डर लगता है कि कहीं उनकी दुकानें निशाना न बन जाएं. व्यापार पर मंडराता यह साया स्थानीय अर्थव्यवस्था को तोड़ रहा है. पीड़ित परिवारों की शिकायत रही कि मुआवजा बंटवारे में पक्षपात हुआ. कई परिवार आज भी राहत शिविरों में हैं और कई की एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई.
संभल दंगे पर आई जांच रिपोर्ट ने जैसे ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपी गई, वैसे ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई. रिपोर्ट ने साफ कहा कि प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही हुई और दशकों से चल रहे जनसांख्यिकीय बदलाव ने सांप्रदायिक तनाव को गहरा किया. इन दोनों बिंदुओं ने विपक्ष को सरकार के खिलाफ गोलाबंदी का मौका दिया है. सपा, कांग्रेस और बसपा ने रिपोर्ट का हवाला देकर सरकार को कटघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया है.
समाजवादी पार्टी (सपा) अध्यक्ष अखिलेश यादव का बयान आया कि बीजेपी सरकार कानून-व्यवस्था की रक्षा करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है और संभल की रिपोर्ट इसका पुख्ता सबूत है. उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी जानबूझकर ऐसे हालात बनने देती है ताकि दंगे हों और उसका राजनीतिक लाभ चुनाव में लिया जा सके. कांग्रेस ने भी यही आरोप लगाया और प्रियंका गांधी ने कहा कि रिपोर्ट यह साबित करती है कि बीजेपी की राजनीति सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर टिकी है.
बसपा की प्रतिक्रिया थोड़ी अलग रही. पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने कहा कि बीजेपी और सपा दोनों ही दलों ने अपने-अपने दौर में दंगों से लाभ उठाया है. बीएसपी ने इसे सामाजिक न्याय की राजनीति से जोड़कर पेश किया और कहा कि सबसे ज्यादा नुकसान हमेशा दलित, पिछड़े और गरीब तबकों को होता है. छोटे दलों, खासकर मुस्लिम नेतृत्व वाली पार्टियों ने रिपोर्ट को मुस्लिम समुदाय के खिलाफ इस्तेमाल की जा रही सरकारी रणनीति का हिस्सा बताया. ओवैसी और एआईएमआईएम के नेताओं ने कहा कि हर बार दंगे की जिम्मेदारी मुसलमानों पर थोप दी जाती है, जबकि असलियत इससे कहीं अधिक जटिल है.
बीजेपी रिपोर्ट को अपना नैरेटिव गढ़ने में इस्तेमाल कर रही
बीजेपी की रणनीति विपक्ष से बिल्कुल उलट है. पार्टी रिपोर्ट को एक “चेतावनी” की तरह पेश कर रही है. बीजेपी नेताओं का कहना है कि आयोग ने सच्चाई उजागर कर दी है कि दशकों से संभल और पश्चिम यूपी के कई जिलों में हिंदुओं का पलायन हुआ है और इस पर पिछली सरकारों ने आंखें मूंद लीं. बीजेपी इसे अपने चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बनाने में जुटी है कि “केवल भाजपा ही हिंदुओं की सुरक्षा कर सकती है और उनके पलायन को रोक सकती है.” पार्टी के अंदरूनी सूत्र मानते हैं कि पश्चिमी यूपी, जहां 2027 के चुनाव में भाजपा को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है, वहां यह रिपोर्ट एक भावनात्मक मुद्दा बन सकती है.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि पर भी इस रिपोर्ट का असर पड़ा है. अब तक वे “सख्त प्रशासन” और “नो टॉलरेंस” की छवि पर राजनीति करते रहे हैं, लेकिन इस रिपोर्ट ने सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा किया है. विपक्ष इसे उनके खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है कि योगी का कानून-व्यवस्था मॉडल सिर्फ भाषणों तक सीमित है, जमीनी हकीकत कुछ और है. अब बीजेपी के लिए यह चुनौती है कि वह मुख्यमंत्री की छवि को बचाते हुए रिपोर्ट की कमियों को विपक्ष के सिर कैसे मढ़े.
राजनीतिक विश्लेषक और लखनऊ के जय नारायण डिग्री कालेज में राजनीतिक शास्त्र विभाग के प्रमुख बृजेश मिश्र बताते हैं, “आने वाले महीनों में विधानसभा और लोकसभा उपचुनावों में इस रिपोर्ट का असर दिख सकता है. विपक्ष इस मुद्दे को लेकर गांव-गांव जाएगा, खासकर उन जिलों में जहां सांप्रदायिक तनाव का इतिहास रहा है. वहीं बीजेपी इसे अपने पारंपरिक वोट बैंक को और अधिक संगठित करने के लिए इस्तेमाल करेगी. एक तरह से यह रिपोर्ट दोनों पक्षों को राजनीतिक हथियार मुहैया करा रही है. फर्क बस इतना है कि विपक्ष इसे सरकार की नाकामी साबित करने में इस्तेमाल करेगा और बीजेपी इसे विपक्षी शासन की “विरासत” बताकर पलटवार करेगी.”
मिश्र के मुताबिक संभल दंगे की यह रिपोर्ट इसलिए अहम है क्योंकि यह सिर्फ एक जिले की घटना नहीं, बल्कि पूरे यूपी के सांप्रदायिक और राजनीतिक समीकरणों को छूती है. आने वाले चुनावों में यह मुद्दा ध्रुवीकरण को और तेज करेगा. सवाल यही है कि क्या यह रिपोर्ट बदलाव की दिशा तय करेगी या फिर हमेशा की तरह सत्ता और विपक्ष की बयानबाजी में खोकर रह जाएगी.