बीते महीने लखनऊ के दौरे पर आए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सर संघचालक मोहन भागवत का मुस्लिमों के प्रति रुख कई लोगों के लिए हैरानी भरा साबित हुआ था. अवध प्रांत के चार दिवसीय प्रवास के दौरान लखनऊ में 25 सितंबर को भागवत ने अनुषांगिक संगठनों के साथ बैठक में कई मुद्दों पर भविष्य की रणनीति तैयार की. इस मौके पर भागवत ने कहा कि संघ संपूर्ण समाज को संगठित करना चाहता है. उन्होंने जोर देकर कहा, "मुस्लिम भी हमसे अलग नहीं हैं, वे भी हमारे हैं. यह देश जितना हमारा है उतना उनका भी है."
मुस्लिमों के प्रति संघ के इस रुख ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अल्पसंख्यक कार्यक्रम को एक नई दिशा भी दी. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले समाज के सभी वर्गों का समर्थन पाने में जुटी पार्टी ने अपने अनुषंगिक संगठन अल्पसंख्यक मोर्चा को मुस्लिम समुदाय को पार्टी से जोड़ने की जिम्मेदारी सौंपी. भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा ने एक टीम बनाकर कई सूफियों को एक नए अभियान के लिए पार्टी से जोड़ा. ये लोग हर जिले में सूफी समुदाय के बीच जाकर भाजपा सरकार की अल्पसंख्यक कल्याण के लिए शुरू की गई योजनाओं की जानकारी देंगे.
इस अभियान को “सूफी संवाद महाअभियान” का नाम दिया गया. भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा ने 12 अक्टूबर को लखनऊ में सूफी संवाद महाअभियान के तहत एक कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें 100 से ज्यादा दरगाहों के करीब 200 सूफी मौजूद थे. उनसे मुसलमानों तक मोदी और योगी सरकार की नीतियों और योजनाओं का संदेश पहुंचाने का अनुरोध किया गया.
भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष जमाल सिद्दीकी बताते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय परंपरा के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में सूफियों की प्रशंसा करते हैं. वे चाहते हैं कि सरकार की कल्याणकारी नीतियों और दृष्टिकोण के बारे में जानकारी देश भर के सूफियों तक पहुंचे. यह पसमांदा समाज के लिए बनी योजना से अलग रणनीति है. इसका उद्देश्य सूफी आध्यात्मिक नेताओं के माध्यम से अपने अनुयायियों के बीच भाजपा का संदेश पहुंचाना है, जो समाज के सभी वर्गों, विशेषकर मुस्लिम समाज से आते हैं."
भगवा दल की रणनीति सूफियों को भाजपा में शामिल करना नहीं बल्कि उनके साथ बातचीत शुरू करना और आम मुसलमानों तक पहुंचना है. जमाल सिद्दीकी के मुताबिक सूफी संवाद के जरिए पार्टी को उनके सामने आने वाली समस्याओं या उनकी मांगों के बारे में पता चल जाएगा और उन्हें सरकार तक पहुंचाया जा सकता है. अल्पसंख्यक मोर्चा के नेता ने बताया कि 22 राज्यों में सूफियों तक पहुंचने के लिए समितियां बनाई गई हैं.
अकेले उत्तर प्रदेश में, पार्टी 10,000 से अधिक सूफी दरगाहों के प्रमुखों से जुड़ने के लिए संवाद महाभियान कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रदेश भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा तैयार है. भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के यूपी अध्यक्ष कुंवर बासित अली बताते हैं, "पार्टी राज्य के सभी सूफियों से संपर्क करने की कोशिश करेगी. यह उन लोगों के साथ बैठकें करेगा जो सकारात्मक रुख दिखाएंगे और उन्हें बताएंगे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी सूफियों को कैसे मानते हैं? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उन्हीं की तरह संत हैं. उन्हें बताया जाएगा कि कैसे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) जैसी विपक्षी पार्टियां मुस्लिम समुदाय में भाजपा के खिलाफ गलत प्रचार करती हैं."
बासित अली ने लखनऊ की बैठक में एक नारा भी गढ़ा- "ना दूरी है, ना खाई है, मोदी हमारा भाई है." बासित अली बताते हैं, "अगर किसी इलाके में मुस्लिम लोग इच्छा जताते हैं कि भाजपा का कोई वरिष्ठ नेता उनसे मिले तो पार्टी एक मंत्री, सांसद या विधायक को उनसे मिलने के लिए भेजेगी और उनकी बात सुनेगी."
इस तरह भाजपा पसमांदा मुस्लिम के बाद अब सूफी समाज के जरिए मुस्लिमों को रिझाने में जुट गई है. बरेली स्थित एक डिग्री कॉलेज में प्रवक्ता अजीजुल हलीम बताते हैं, "दरगाहों और मजारों पर आने वाला मुस्लिम समाज केंद्र और प्रदेश सरकार की योजनाओं का सबसे बड़ा लाभार्थी है. इसीलिए भाजपा इस समुदाय को अपने से जोड़कर लोकसभा चुनाव में बोनस वोटों का जुगाड़ करना चाहती है."
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को कुल मुस्लिम मतदाताओं का करीब 8 फीसदी वोट मिला था. भाजपा इसे कम से कम 20 फीसदी तक पहुंचाना चाहती है. इसीलिए एक ओर पार्टी पसमांदा मुस्लिमों पर फोकस कर रही हो तो अब सूफियों के जरिए भी पहुंच बनाना चाहती है. भाजपा के एक प्रदेश पदाधिकारी बताते हैं, "भाजपा उन मुस्लिमों पर फोकस कर रही है जिन्हें सपा या बसपा के शासनकाल में सरकारी योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिला है. इनमें बड़ी तादाद महिलाओं की भी है."
इसके साथ ही अजीजुल हलीम कहते हैं कि भाजपा के सामने मुस्लिमों का समर्थन पाना बहुत आसान नहीं होगा. चुनाव के नजदीक आते ही अगर भाजपा नेताओं ने मुस्लिम समाज को निशाने पर लेते हुए कोई बयानबाजी की तो पार्टी की सारी रणनीति धरी रह जाएगी. ऐसे में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण को हवा नहीं मिली तो भाजपा को कितना लाभ होगा? यह भी एक बड़ा सवाल है.

