
पांच वर्ष के लंबे अंतराल के बाद उत्तर प्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा (UP-TET 2026) का आयोजन होने जा रहा है. 27 मार्च से ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि यह परीक्षा केवल पात्रता तय करने का माध्यम नहीं, बल्कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक क्षमता की व्यापक परीक्षा बनने जा रही है.
2 से 4 जुलाई के बीच प्रस्तावित इस परीक्षा में 30 लाख से अधिक अभ्यर्थियों के शामिल होने की संभावना है, जो इसे देश की सबसे बड़ी शिक्षक पात्रता परीक्षाओं की श्रेणी में खड़ा करता है. इस बार सबसे बड़ा बदलाव यह है कि परीक्षा का जिम्मा पहली बार उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग (UPESSC), प्रयागराज को सौंपा गया है.
यही बदलाव इस आयोजन को और अधिक संवेदनशील बनाता है, क्योंकि नए आयोग के लिए अपनी साख स्थापित करने का यह पहला बड़ा अवसर है.
नए अध्यक्ष प्रशांत कुमार के लिए ‘टेस्ट केस’
UP-TET 2026 केवल अभ्यर्थियों की ही नहीं, बल्कि आयोग के नए अध्यक्ष प्रशांत कुमार के प्रशासनिक कौशल की भी सीधी परीक्षा है. योगी सरकार ने 300 से ज्यादा एनकाउंटर करने वाले पूर्व DGP प्रशांत कुमार को सेवानिवृत्ति के 6 महीने बाद, 17 दिसंबर 2025 को उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया था. आयोग की पहली अध्यक्ष प्रोफेसर कीर्ति पांडेय थीं, जिन्होंने दिसंबर में इस्तीफा दे दिया था.
प्रशांत कुमार आयोग के दूसरे अध्यक्ष हैं और अपनी सख्त कार्यशैली व त्वरित निर्णय लेने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं. उनकी नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब आयोग को न सिर्फ निष्पक्ष परीक्षा करानी है, बल्कि पिछले वर्षों में भर्ती परीक्षाओं को लेकर उपजे अविश्वास को भी दूर करना है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रशांत कुमार के लिए यह एक 'हाई-स्टेक असाइनमेंट' है, जहां छोटी सी चूक भी बड़े विवाद का रूप ले सकती है. एक वरिष्ठ प्रशासनिक विश्लेषक के अनुसार, "प्रशांत कुमार के सामने दोहरी चुनौती है- पहली, इतने बड़े पैमाने पर सफल आयोजन और दूसरी, यह सुनिश्चित करना कि पूरी प्रक्रिया निर्विवाद रहे."
कई बदलावों का गवाह बनेगी परीक्षा
आयोग के उप सचिव संजय कुमार सिंह के मुताबिक, परीक्षा प्राथमिक (कक्षा 1 से 5) और उच्च प्राथमिक (कक्षा 6 से 8) स्तर पर आयोजित होगी. इस बार सबसे बड़ा बदलाव केवल आयोजन एजेंसी का नहीं, बल्कि उन नियमों का भी है जिनके जरिए अधिक से अधिक अभ्यर्थियों को शामिल करने की कोशिश की गई है. शुरुआती अधिसूचना में बड़ी संख्या में 'डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन' (DElEd) प्रशिक्षुओं को बाहर कर दिया गया था, जिससे असंतोष फैला.
इसके बाद 24 मार्च को आयोग ने संशोधित नोटिफिकेशन जारी किया, जिसमें DElEd के सभी सेमेस्टर के प्रशिक्षुओं, यहाँ तक कि पहले और दूसरे सेमेस्टर के छात्रों को भी आवेदन की अनुमति दे दी गई. इसके अलावा, सेवारत सहायक शिक्षकों और BPEd, DPEd, CPEd जैसी योग्यताओं वाले अभ्यर्थियों को भी शामिल कर लिया गया है. यह बदलाव उन लाखों अभ्यर्थियों के लिए बड़ी राहत है जो पहले इस दौड़ से बाहर हो रहे थे.
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय व्यावहारिक जरूरतों को देखते हुए लिया गया है. एक विशेषज्ञ का कहना है, "अगर इतनी बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को बाहर रखा जाता, तो परीक्षा की विश्वसनीयता और भविष्य की भर्ती प्रक्रिया दोनों प्रभावित होतीं." हालांकि, कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि पात्रता का दायरा इतना बढ़ाने से प्रतिस्पर्धा असामान्य रूप से बढ़ जाएगी, जिससे चयन प्रक्रिया और अधिक जटिल हो सकती है.
इस बार एक और अहम बदलाव 'वन टाइम रजिस्ट्रेशन' (OTR) की अनिवार्यता है. अभ्यर्थियों को आवेदन से पहले OTR पूरा करना होगा. आयोग का तर्क है कि इससे फर्जीवाड़ा कम होगा और उम्मीदवारों का डेटा एकीकृत रहेगा. हालांकि, तकनीकी जानकारों का कहना है कि 30 लाख से ज्यादा अभ्यर्थियों के लिए OTR सिस्टम को सुचारू रूप से चलाना एक बड़ी चुनौती होगी. अगर पोर्टल पर दबाव बढ़ा, तो आवेदन प्रक्रिया बाधित हो सकती है.
गड़बड़ी रोकने और आर्थिक आरक्षण के प्रावधान
धोखाधड़ी रोकने के लिए इस बार अत्यंत सख्त कदम उठाए गए हैं. जुड़वां अभ्यर्थियों के लिए अलग से सत्यापन व्यवस्था, लाइव फोटो अपलोड की अनिवार्यता और QR कोड आधारित वेरिफिकेशन जैसे उपाय पहली बार लागू किए जा रहे हैं. आयोग का दावा है कि इससे नकल और फर्जी उम्मीदवारों पर रोक लगेगी.
हालांकि, आईटी विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक के साथ-साथ परीक्षा केंद्रों पर मानवीय निगरानी को भी उतना ही मजबूत रखना होगा. EWS वर्ग को 5 प्रतिशत अंकों की छूट देने का फैसला भी इस बार का प्रमुख बदलाव है. अब सामान्य वर्ग के लिए जहां 60 प्रतिशत अंक अनिवार्य होंगे, वहीं EWS समेत अन्य आरक्षित वर्गों के लिए यह सीमा 55 प्रतिशत कर दी गई है. इसे सामाजिक समावेश की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है. शिक्षा नीति विशेषज्ञों के अनुसार, इससे उन वर्गों को बराबरी का अवसर मिलेगा जो अब तक इस लाभ से वंचित थे.
विवाद और कई चुनौतियां भी
फीस में बढ़ोतरी इस बार विवाद का मुख्य मुद्दा बनी हुई है. प्रति पेपर 1000 रुपए शुल्क तय किए जाने से अभ्यर्थियों में नाराजगी है, विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों में. सरकार और आयोग का तर्क है कि सुरक्षा उपायों और तकनीकी व्यवस्थाओं के लिए यह शुल्क आवश्यक है. इन सुधारों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह परीक्षा वास्तव में बेदाग शिक्षक भर्ती का मार्ग प्रशस्त करेगी. राज्य के परिषदीय विद्यालयों में 2018 के बाद से कोई बड़ी भर्ती नहीं हुई है और एक लाख से अधिक पद खाली बताए जाते हैं.
हालांकि सरकार का दावा है कि पद खाली नहीं हैं, लेकिन शिक्षक संगठनों के आंकड़े अलग तस्वीर पेश करते हैं. वरिष्ठ शिक्षक नेता डॉ. हरि प्रकाश यादव का कहना है कि "हर साल लगभग 10 हजार पद खाली हो रहे हैं, लेकिन भर्ती नहीं हो रही. ऐसे में TET केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाती है, जिसका सीधा संबंध रोजगार से नहीं जुड़ पा रहा."
यहीं से शिक्षा सेवा चयन आयोग की असली चुनौती शुरू होती है. पहली चुनौती 30 लाख से अधिक अभ्यर्थियों के लिए पारदर्शी तरीके से परीक्षा आयोजित करना और समय पर परिणाम देना है. दूसरी चुनौती विश्वसनीयता बनाए रखना है, क्योंकि पिछले वर्षों में कई परीक्षाएं पेपर लीक के कारण विवादों में रही हैं. तीसरी चुनौती तकनीकी है; OTR और लाइव वेरिफिकेशन जैसे सिस्टम तभी सफल होंगे जब तकनीकी ढांचा मजबूत होगा.
चौथी चुनौती नीति और क्रियान्वयन के बीच संतुलन की है. पात्रता का दायरा तो बढ़ा दिया गया है, लेकिन भर्ती की अनिश्चितता असंतोष का कारण बन सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि TET के बाद नियमित और समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया शुरू होना अनिवार्य है, तभी इसका उद्देश्य पूर्ण होगा.

