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महिला आरक्षण : क्या योगी आदित्यनाथ की रणनीति ने सपा-कांग्रेस को फंसा दिया है?

महिला आरक्षण के मुद्दे पर 21 अप्रैल को योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में निकली जनाक्रोश यात्रा, 30 अप्रैल को यूपी विधानसभा के विशेष सदन और 28 को मोदी की रैली के जरिए भी उठेगा मसला

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योगी आदित्यनाथ और BJP के बाकी नेता 'जनाक्रोश महिला पदयात्रा' से पहले मंच पर
अपडेटेड 21 अप्रैल , 2026

सुबह की तेज धूप अभी पूरी तरह चढ़ी भी नहीं थी कि 21 अप्रैल को राजधानी लखनऊ की सड़कों पर नारों की गूंज फैलने लगी. सुबह नौ बजे 5 कालीदास मार्ग स्थ‍ित मुख्यमंत्री आवास से निकलकर सिविल हॉस्पिटल होते हुए विधान भवन की ओर बढ़ता महिलाओं का विशाल हुजूम सिर्फ एक रैली नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश था. हाथों में तख्तियां, चेहरों पर आक्रोश और कदमों में तेज़ी- “बहन-बेटियों का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान” जैसे नारे हवा में तैर रहे थे. 

इस भीड़ के बीच सबसे आगे चल रहे थे योगी आदित्यनाथ, जिनके साथ पूरा मंत्रिमंडल और भारतीय जनता पार्टी (BJP) का प्रदेश नेतृत्व कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ रहा था. यह ‘जनाक्रोश महिला पदयात्रा’ थी. इसका आयोजन सत्ता पक्ष ने विपक्ष को घेरने के लिए किया था और इसकी वजह थी लोकसभा में विपक्ष के विरोध के चलते गिरने वाला 131वां संविधान संशोधन विधेयक जिसे सरकार महिला आरक्षण के लिए जरूरी बता रही थी.

विधान भवन के सामने पहुंचकर मुख्यमंत्री ने सीधे विपक्ष पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' महिलाओं को विधानसभाओं और लोकसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है, लेकिन कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके जैसे दलों ने इसे बाधित कर अपने महिला-विरोधी चेहरे को उजागर किया है. 

उनके मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को अपनी छवि सुधारने का अवसर दिया था, लेकिन उन्होंने इसे गंवा दिया. यह पदयात्रा दरअसल सिर्फ विरोध या समर्थन का कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा थी. 21 अप्रैल से शुरू हुआ यह अभियान राज्यव्यापी बनाया गया है, जिसमें ब्लॉक और जिला स्तर तक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. BJP इसे एक सामाजिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत कर रही है, जिसमें स्वयं सहायता समूहों, महिला संगठनों और नागरिक समाज को जोड़ा जा रहा है. पार्टी का उद्देश्य साफ है- महिला आरक्षण के मुद्दे को घर-घर तक पहुंचाना और इसे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में स्थापित करना.

विशेष सदन की रणनीति 

इस पूरे घटनाक्रम का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव 30 अप्रैल को प्रस्तावित यूपी विधानसभा का विशेष सत्र है. इस एक-दिवसीय सत्र का मुख्य विषय 'महिला सशक्तिकरण' रखा गया है. विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना के मुताबिक इस सत्र में महिला अधिकारों और आरक्षण से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत चर्चा होगी. 

सरकार इस दौरान एक निंदा प्रस्ताव लाने की तैयारी में है, जिसका लक्ष्य विपक्षी दलों को कटघरे में खड़ा करना होगा. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह पूरा अभियान केवल विधायी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है. लखनऊ में बाबा साहेब डा. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रोफेसर सुशील पांडेय कहते हैं, “BJP ने महिला आरक्षण को एक भावनात्मक और नैतिक मुद्दे के रूप में फ्रेम किया है. इससे विपक्ष के लिए विरोध करना कठिन हो जाता है, क्योंकि इससे सीधे तौर पर महिला अधिकारों के खिलाफ खड़े होने का संदेश जा सकता है.” 

पांडेय के मुताबिक 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले BJP महिला मतदाताओं को अपने पक्ष में संगठित करने की दीर्घकालिक रणनीति पर काम कर रही है. दरअसल, आंकड़े भी इस रणनीति की पुष्टि करते हैं. उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में पिछले एक दशक में महिला मतदाताओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है और यह अब निर्णायक कारक बन चुकी है. 2017 विधानसभा चुनाव में महिलाओं का मतदान प्रतिशत लगभग 60 फीसदी के आसपास था, जो 2022 में बढ़कर करीब 62–63 फीसदी तक पहुंच गया.

 कई चरणों में तो महिलाओं की वोटिंग पुरुषों के बराबर या उससे अधिक दर्ज की गई. यह बदलाव साफ संकेत देता है कि महिला मतदाता अब सिर्फ सहभागी नहीं, बल्कि परिणाम तय करने वाली शक्ति बन चुकी हैं. राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्तर पर भी कुछ बढ़ोतरी दिखती है, हालांकि यह अभी सीमित है. 403 सदस्यीय यूपी विधानसभा में फिलहाल कुल 51 महिला विधायक हैं. इनमें BJP की 30, समाजवादी पार्टी की 15, अपना दल (एस) की 4, कांग्रेस की 1 और आरएलडी की 1 महिला विधायक शामिल हैं. यानी कुल हिस्सेदारी अभी भी लगभग 12-13 फीसदी के आसपास ही है, जो 33 फीसदी आरक्षण की बहस को और प्रासंगिक बनाती है. 

नैरेटिव को रीफ्रेम करने में जुटा विपक्ष 

राजनीतिक विश्लेषक डॉ. नीलिमा सिंह कहती हैं, “2014 के बाद से भाजपा ने महिला मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की है- चाहे वह उज्ज्वला योजना हो, शौचालय निर्माण या कानून व्यवस्था का मुद्दा. अब महिला आरक्षण को उसी श्रृंखला का अगला कदम बनाया जा रहा है.” उनके अनुसार, महिला वोटबैंक अब सिर्फ ‘सपोर्टिंग फैक्टर’ नहीं बल्कि चुनावी जीत का निर्णायक तत्व बन चुका है. इसी के समानांतर विपक्ष भी अपनी रणनीति तैयार कर रहा है. समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर खुलकर BJP को चुनौती दी है. उनका तर्क है कि BJP महिला आरक्षण के नाम पर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही है, जबकि असली मुद्दे—जैसे परिसीमन, उप-कोटा और समयसीमा—पर स्पष्टता नहीं है. 

सपा और कांग्रेस दोनों इस बात पर जोर दे रहे हैं कि अगर सरकार गंभीर है तो विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजे. कांग्रेस विधायक दल की नेता आराधना मिश्रा ने भी इसी दिशा में बयान दिया है. उनका कहना है, “अगर विधानसभा 33 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश करते हुए प्रस्ताव पारित करे, तो कांग्रेस उसका समर्थन करेगी.” साथ ही उन्होंने BJP पर देरी का आरोप लगाते हुए याद दिलाया कि कांग्रेस ने 2022 के चुनाव में टिकट वितरण में 40 प्रतिशत महिलाओं को मौका दिया था.

विपक्ष की रणनीति दो स्तरों पर काम कर रही है. पहला, वह BJP के अभियान को ‘राजनीतिक स्टंट’ के रूप में पेश करना चाहता है. दूसरा, वह महिला सशक्तिकरण के अपने पुराने कदमों को सामने लाकर यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि इस मुद्दे पर उसकी प्रतिबद्धता नई नहीं है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि विपक्ष BJP के नैरेटिव को पूरी तरह खारिज करने की स्थिति में नहीं है, इसलिए वह उसे ‘रीफ्रेम’ करने की कोशिश कर रहा है.

योगी को मिलेगा मोदी का साथ 

हालांकि, इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की रणनीति अधिक आक्रामक और बहुस्तरीय नजर आती है. एक ओर वे सड़क पर पदयात्राओं और रैलियों के जरिए माहौल बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सदन में विशेष सत्र बुलाकर इस मुद्दे को संस्थागत वैधता देने की कोशिश कर रहे हैं. पार्टी की महिला इकाइयों को भी सक्रिय किया गया है, जो जिलों में विरोध प्रदर्शन और जनसंपर्क अभियान चलाएंगी. विपक्षी पार्टियों द्वारा संसद में संविधान संशोधन बिल को रोकने के बाद, BJP की महिला विंग, भारतीय जनता महिला मोर्चा, 28 अप्रैल को काशी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा के लिए 50,000 से ज़्यादा महिलाओं को जुटाने के लिए मंडल-स्तर की बैठकें कर रही है. 

मोदी के 28 अप्रैल को आने और अगली सुबह रवाना होने की संभावना है. BJP काशी क्षेत्रीय इकाई के अध्यक्ष दिलीप सिंह पटेल ने कहा कि 28 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र में होने वाली यह रैली पूरी तरह से महिलाओं द्वारा ही संचालित होगी. वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी की रैली यूपी में BJP की चुनावी तैयारियों के लिए महत्वपूर्ण होगी. 

सुशील पांडेय के मुताबिक विपक्ष के सामने चुनौती यह है कि वह इस नैरेटिव का प्रभावी जवाब कैसे दे. अगर वह आरक्षण का समर्थन करता है तो BJP को श्रेय जाता है, और अगर विरोध करता है तो महिला विरोधी छवि का खतरा होता है. यही वजह है कि विपक्ष फिलहाल प्रक्रिया और शर्तों पर सवाल उठाकर संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. आने वाले दिनों में विधानसभा का विशेष सत्र इस राजनीतिक संघर्ष का अगला बड़ा मंच होगा. यहां न केवल विधायी बहस होगी, बल्कि दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक संदेश को और धार देने की कोशिश करेंगे.

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