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रिटायरमेंट की उम्र करीब आई, तब बन पाए सरकारी टीचर!

उत्तर प्रदेश में 13 साल की कानूनी लड़ाई के बाद 1,113 अभ्यर्थियों को शिक्षक नियुक्ति मिली. लेकिन लंबा इंतज़ार उनके करियर के बड़े हिस्से को निगल चुका है, अब सेवा के बचे हैं कुछ ही साल

Appointment letter at Late age (AI)
सांकेतिक तस्वीर (AI)
अपडेटेड 12 मार्च , 2026

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के बैरिया गांव के कमलेश कुमार इन दिनों अपने अपॉइंटमेंट लेटर का इंतज़ार कर रहे हैं. चेहरे पर हल्की मुस्कान है, लेकिन यह मुस्कान उत्साह से ज़्यादा एक लंबे संघर्ष के बाद सही साबित होने की राहत जैसी है.

इस पल तक पहुंचने में उन्हें 13 साल लगे, एक ऐसा सफर जो सरकारी भर्ती, राजनीतिक बदलाव और अदालतों की लंबी प्रक्रिया से होकर गुज़रा. कमलेश अब 56 साल के हैं. लेकिन जब उन्होंने 2013 में सरकारी स्कूल में शिक्षक बनने के लिए आवेदन किया था, तब उनकी उम्र 43 साल थी.

उस समय उत्तर प्रदेश में सरकारी अपर प्राइमरी स्कूलों में साइंस और मैथ्स के 29,334 असिस्टेंट टीचरों की भर्ती निकली थी.ओबीसी श्रेणी से होने के कारण उन्हें अधिकतम आयु सीमा में पांच साल की छूट मिली थी. बीएड की डिग्री के साथ उन्हें उम्मीद थी कि उनका शिक्षक बनने का सपना जल्द पूरा हो जाएगा. लेकिन भर्ती प्रक्रिया जल्द ही विवादों और कानूनी लड़ाई में उलझ गई. नतीजतन, कमलेश जैसे हजारों उम्मीदवारों को एक ऐसे इंतज़ार में धकेल दिया गया, जो वर्षों तक चलता रहा.

इन 13 सालों में कमलेश की ज़िंदगी का ढर्रा लगभग तय हो गया था. वे अपने पुश्तैनी खेत की देखभाल करते रहे, गांव में भाई की छोटी-सी मेडिकल दुकान पर हाथ बंटाते रहे और बीच-बीच में अदालतों में चल रही सुनवाई की खबरों पर नज़र रखते रहे. वे कहते हैं, “सरकारी नौकरी का सपना मैंने कभी छोड़ा नहीं. हर बार लगता था कि अब शायद फैसला आ जाएगा.” आज जब नियुक्ति का समय आया है, तब परिस्थितियां भी बदल चुकी हैं.

रिटायरमेंट की उम्र 62 साल तय है, इसलिए कमलेश अधिकतम पांच या छह साल ही शिक्षक रह पाएंगे. वे धीमे स्वर में कहते हैं, “अब बस इतना चाहता हूं कि पढ़ाना शुरू कर सकूं. जब मेरी बेटी की शादी हो, तब भी मैं नौकरी में रहूं.” उनकी 19 वर्षीय बेटी आरती फिलहाल ग्रेजुएशन के दूसरे वर्ष में पढ़ रही है. कमलेश बताते हैं, “उसकी पढ़ाई का खर्च मेरे ससुराल वालों ने उठाया है. मेरी इच्छा है कि उसकी शादी अपनी कमाई से करूं.”

कमलेश अकेले नहीं हैं. उनके जैसे 1,000 से अधिक उम्मीदवार हैं, जिनकी नियुक्ति अब जाकर संभव हो पाई है. लेकिन इनमें से कई लोग उस लंबे सरकारी करियर का सपना खो चुके हैं, जिसकी उम्मीद उन्होंने आवेदन करते समय की थी.

भर्ती कैसे फंसी विवादों में

यह पूरी कहानी 11 जुलाई 2013 से शुरू होती है. उस समय उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी और बेसिक शिक्षा विभाग ने जूनियर बेसिक स्कूलों में साइंस और मैथ्स विषय के लिए 29,334 असिस्टेंट टीचरों की भर्ती का विज्ञापन जारी किया. लेकिन आवेदन प्रक्रिया शुरू होते ही चयन के मानदंड को लेकर विवाद खड़ा हो गया. एक पक्ष का कहना था कि चयन टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) की मेरिट के आधार पर होना चाहिए. वहीं सरकारी आदेश में चयन के लिए शैक्षणिक अंकों को वेटेज देने की व्यवस्था की गई थी. इसमें हाईस्कूल, इंटरमीडिएट, ग्रेजुएशन और बीएड के अंकों को जोड़कर मेरिट तय करने का प्रावधान था.

यही विवाद जल्द ही इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गया. इसके बाद भर्ती प्रक्रिया कई साल तक कानूनी उलझनों में फंसी रही. लगातार सुनवाई के बाद 2015 में भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ी और काउंसलिंग शुरू हुई. 2016 के अंत तक लगभग 22,000 उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र भी मिल गए थे. लेकिन इसी दौरान 2017 के विधानसभा चुनाव आ गए और मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू हो गया. इससे बची हुई नियुक्तियां रुक गईं.

मार्च 2017 में राज्य में नई सरकार बनने के बाद भर्ती की समीक्षा का आदेश दिया गया. इसके साथ ही बची हुई पोस्ट को फिलहाल के लिए फ्रीज़ कर दिया गया. उस समय कई बार यह आश्वासन दिया गया कि प्रक्रिया जल्द पूरी कर ली जाएगी. समयसीमा बढ़ाई गई, अधिकारियों को निर्देश जारी हुए, लेकिन ज़मीनी स्तर पर भर्ती आगे नहीं बढ़ सकी.

सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत

भर्ती प्रक्रिया में लगातार देरी से परेशान उम्मीदवारों ने दोबारा अदालत का रुख किया. कई याचिकाएं दाखिल हुईं और अदालत ने सरकार से जवाब मांगा. सरकार की ओर से कई बार समय मांगा गया, लेकिन समाधान नहीं निकल सका. इसके बाद अदालत में अवमानना याचिकाएं भी दाखिल की गईं. 2019 तक यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. लेकिन इसी बीच कोविड-19 महामारी आ गई और अदालतों के कामकाज पर भी असर पड़ा. इससे मामला और लंबा खिंच गया.

करीब एक दशक की कानूनी लड़ाई के बाद 29 जनवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण आदेश दिया. अदालत ने कहा कि जिन उम्मीदवारों ने तय कट-ऑफ मार्क्स हासिल किए हैं और जिन्होंने 31 दिसंबर 2019 से पहले अदालत का रुख किया था, उन्हें काउंसलिंग के बाद नियुक्त किया जाए. इस आदेश के बाद बेसिक शिक्षा विभाग ने प्रक्रिया को फिर से शुरू किया. 2025 के अंत में 1,700 से अधिक खाली पदों की सूची जारी की गई. इसके बाद 22 से 27 जनवरी 2026 के बीच प्रयागराज स्थित स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशनल मैनेजमेंट एंड ट्रेनिंग (SIEMAT) में लगभग 1,500 उम्मीदवारों की काउंसलिंग कराई गई. काउंसलिंग प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब नियुक्ति की औपचारिकताएं तेजी से पूरी की जा रही हैं. उत्तर प्रदेश बेसिक एजुकेशन काउंसिल के सचिव सुरेंद्र कुमार तिवारी ने बताया, “सभी बचे हुए उम्मीदवारों की काउंसलिंग पूरी कर ली गई है और उनके दस्तावेजों की जांच भी हो चुकी है. कुल 1,113 उम्मीदवारों को जिला आवंटन जारी कर दिया गया है और उन्हें 19 मार्च तक नियुक्ति पत्र मिल जाएंगे.” 

राहत, लेकिन अधूरा सपना

हालांकि नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू होने से उम्मीदवारों में राहत जरूर है, लेकिन कई लोगों के लिए यह राहत थोड़ी कड़वी भी है. कानूनी लड़ाई के कारण उनकी उम्र काफी बढ़ चुकी है और अब उनके पास सरकारी सेवा के केवल कुछ ही साल बचे हैं. कमलेश कुमार कहते हैं, “अगर भर्ती समय पर हो जाती, तो हम 20 साल से ज्यादा सेवा कर सकते थे. अब बस कुछ साल ही मिलेंगे.” इसी भर्ती के एक अन्य उम्मीदवार अनुराग यादव बताते हैं कि लंबे इंतज़ार ने कई लोगों की ज़िंदगी की दिशा बदल दी. “कई उम्मीदवारों ने दूसरे काम शुरू कर दिए, कुछ ने प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना शुरू कर दिया. लेकिन हम सब इस उम्मीद में जुड़े रहे कि एक दिन न्याय मिलेगा.”

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की लंबी भर्ती प्रक्रियाएं केवल उम्मीदवारों के लिए ही नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के लिए भी नुकसानदेह होती हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय के शिक्षा विशेषज्ञ प्रो. आरके सिंह कहते हैं, “सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी पहले से ही एक बड़ी समस्या है. अगर भर्तियां समय पर नहीं होतीं, तो इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है.” वे कहते हैं कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित करना जरूरी है.

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