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गन्ना किसानों के करोड़ों रुपए का भुगतान फिर अटका; हर साल ऐसा क्यों होता है?

इस बार पश्चिमी यूपी के छह सबसे बड़े गन्ना उत्पादक जिलों की चीनी मिलों पर किसानों का लगभग 1878 करोड़ रुपए बकाया है और कमबेश ऐसे हालात हर साल ही बनते हैं

खेत में खड़ी गन्ना की फसल (File Photo-Social Media)
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 22 अप्रैल , 2026

मेरठ के सरधना क्षेत्र के किसान राजेंद्र सिंह की सुबह खेत से नहीं, बल्कि चिंता से शुरू होती है. गन्ने की फसल काटकर मिल को दिए महीनों बीत चुके हैं, लेकिन भुगतान अब तक पूरा नहीं मिला. घर में बच्चों की फीस जमा करनी है, खाद-बीज का इंतजाम करना है और पिछले सीजन का उधार भी चुकाना है, लेकिन पैसा अटका पड़ा है. वे बताते हैं, “मिल को गन्ना दिया, लेकिन पैसा नहीं मिला. अब साहूकार से उधार लेकर काम चला रहे हैं.”

उनकी आवाज में झुंझलाहट भी है और बेबसी भी. राजेंद्र अकेले नहीं हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हजारों किसान इसी स्थिति से गुजर रहे हैं, जहां गन्ना नकदी फसल तो है, लेकिन नकदी समय पर नहीं मिल रही. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की गन्ना बेल्ट- मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, शामली, बिजनौर और बागपत- इस समय भुगतान संकट के सबसे बड़े केंद्र में है. 

इन छह जिलों की करीब 30 चीनी मिलों पर किसानों का लगभग 1878 करोड़ रुपए बकाया है. केवल आठ मिलें ही ऐसी हैं जिन्होंने पूरा भुगतान किया है, जबकि बाकी मिलों में भुगतान आंशिक है या काफी पीछे चल रहा है. यह स्थिति ऐसे समय में है जब गन्ना इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है. खेत से लेकर बाजार तक, हर गतिविधि गन्ने के भुगतान पर निर्भर करती है. भुगतान रुकते ही गांवों में नकदी का प्रवाह थम जाता है और इसका असर दुकानों, छोटे कारोबारियों और मजदूरों तक दिखने लगता है.

गन्ना बेल्ट की हालत खराब 

मेरठ जिले की स्थिति इस संकट की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करती है. यहां लगभग 1.52 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती होती है और दो लाख से अधिक किसान इससे जुड़े हैं. जिले की छह चीनी मिलों में से तीन ने भुगतान पूरा कर दिया है, लेकिन किनौनी मिल पर करीब 350 करोड़ रुपए का बकाया है और भुगतान 50 प्रतिशत से भी कम हुआ है. मोहिउद्दीनपुर मिल पर करीब 17.5 करोड़ और सकौती मिल पर करीब 8.75 करोड़ रुपए बकाया हैं. 

इसका सीधा असर किसानों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है. वे बच्चों की फीस समय पर नहीं भर पा रहे, खेती के लिए जरूरी संसाधन नहीं जुटा पा रहे और कई मामलों में कर्ज लेने को मजबूर हो रहे हैं. मुजफ्फरनगर जिले में स्थिति थोड़ी बेहतर जरूर दिखती है, लेकिन पूरी तरह संतोषजनक नहीं है. यहां कुल 90.83 प्रतिशत भुगतान हुआ है, फिर भी करीब 283 करोड़ रुपए बकाया हैं. भैंसाना चीनी मिल पर अकेले 196 करोड़ रुपए से अधिक बकाया है. 

सहारनपुर में सातों मिलों का पेराई सत्र समाप्त हो चुका है, लेकिन करीब 237 करोड़ रुपए का भुगतान अब भी लंबित है. कुल भुगतान का लगभग 85 प्रतिशत ही किसानों तक पहुंच पाया है. शामली में तीनों मिलों पर 312.91 करोड़ रुपए बकाया हैं, जबकि बिजनौर में भी कई मिलों पर सैकड़ों करोड़ रुपए लंबित हैं. बागपत में मलकपुर और रमाला मिलों पर भारी बकाया है. मलकपुर मिल पर लगभग 350 करोड़ रुपए और रमाला मिल पर करीब 110 करोड़ रुपए किसानों को मिलने बाकी हैं.

सबसे बड़े चीनी उत्पादक से फिसला यूपी 

यह संकट सिर्फ भुगतान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े बड़े आर्थिक परिदृश्य का हिस्सा है. उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक राज्य रहा है और यहां करीब 29 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में गन्ने की खेती होती है. लाखों किसान और हजारों मजदूर इस पर निर्भर हैं. लेकिन 2025-26 का पेराई सत्र राज्य के लिए कई मायनों में झटका लेकर आया. 

गन्ना विकास विभाग के अनुसार, राज्य का चीनी उत्पादन 2024-25 के लगभग 91 लाख मीट्रिक टन से घटकर इस बार 89 लाख मीट्रिक टन के आसपास रह गया. यह गिरावट मामूली दिख सकती है, लेकिन इसका प्रतीकात्मक और आर्थिक महत्व बड़ा है, क्योंकि इससे उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादक का स्थान खो बैठा. नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज के आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र ने इस बार करीब 99 लाख मीट्रिक टन चीनी उत्पादन के साथ पहला स्थान हासिल कर लिया. 

यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय से उत्तर प्रदेश इस क्षेत्र में अग्रणी रहा है. इस गिरावट के पीछे तीन मुख्य वजहें सामने आई हैं- गन्ने की कम पैदावार, खांडसारी इकाइयों की ओर गन्ने का रुख और चीनी मिलों द्वारा समय पर भुगतान न किया जाना.

गिरावट की कई वजहें हैं

पहली और सबसे बड़ी वजह गन्ने की कम पैदावार रही. इस सत्र में मिलों तक पहुंचने वाले गन्ने की मात्रा 937.63 लाख मीट्रिक टन से घटकर 874.51 लाख मीट्रिक टन रह गई. इसके पीछे मौसम की बड़ी भूमिका रही. फरवरी में अचानक तापमान बढ़ गया, जिससे फसल की वृद्धि प्रभावित हुई. इसके बाद मार्च में हुई बेमौसम बारिश ने फसल को और नुकसान पहुंचाया. सबसे बड़ा झटका Co-0238 किस्म को लगा, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर उगाई जाती है. इस किस्म में सड़न की समस्या आने से उत्पादन में भारी गिरावट आई. नतीजतन, कई चीनी मिलों को तय समय से पहले ही पेराई बंद करनी पड़ी. 

शामली की ऊन मिल ने अपने निर्धारित समय से लगभग 15 दिन पहले पेराई बंद कर दी, जबकि थानाभवन मिल ने भी मार्च के अंत तक काम रोक दिया. दूसरी बड़ी वजह खांडसारी इकाइयों की ओर गन्ने का झुकाव रही. इस सत्र में बड़ी मात्रा में गन्ना चीनी मिलों के बजाय खांडसारी इकाइयों की ओर चला गया. इसका कारण साफ था- बेहतर दाम और जल्दी भुगतान. जहां सरकार द्वारा तय राज्य परामर्शित मूल्य (SAP) करीब 400 रुपए प्रति क्विंटल था, वहीं खांडसारी इकाइयां 450 रुपए प्रति क्विंटल तक दे रही थीं. इसके साथ ही भुगतान भी जल्दी मिल रहा था. ऐसे में किसानों ने स्वाभाविक रूप से खांडसारी इकाइयों को प्राथमिकता दी. इससे चीनी मिलों को पर्याप्त गन्ना नहीं मिला और उनका उत्पादन प्रभावित हुआ.

तीसरी और सबसे अहम वजह चीनी मिलों की तरफ से भुगतान में देरी रही. जब किसानों को समय पर भुगतान नहीं मिलता, तो उनका भरोसा मिलों पर से उठने लगता है. भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, “जब हर जगह डिजिटल लेन-देन लागू हो चुका है, तो गन्ना तौलते ही भुगतान किसानों के खाते में क्यों नहीं पहुंचता? एक दिन की देरी पर आम आदमी की बिजली कट जाती है, लेकिन मिलों पर सख्ती क्यों नहीं होती?” उनके मुताबिक, भुगतान में देरी ही किसानों को वैकल्पिक बाजारों की ओर धकेल रही है.

दिलचस्प बात यह है कि इस सत्र में उत्तर प्रदेश की चीनी रिकवरी दर 9.7 प्रतिशत से बढ़कर 10.2 प्रतिशत हो गई, जो महाराष्ट्र से अधिक है. इसका मतलब यह है कि तकनीकी रूप से मिलों की क्षमता में सुधार हुआ है और वे प्रति क्विंटल गन्ने से ज्यादा चीनी निकाल पा रही हैं. लेकिन कुल गन्ना कम मिलने के कारण उत्पादन घट गया. यह स्थिति बताती है कि समस्या मिलों की तकनीकी दक्षता नहीं, बल्कि कच्चे माल की उपलब्धता और प्रबंधन से जुड़ी है.

प्रभावी नहीं हो रहे सरकार के कदम 

सरकार इस पूरे मुद्दे पर अपनी सक्रियता का दावा कर रही है.  प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री और पश्च‍िमी यूपी से ताल्लुक रखने वाले अनिल कुमार का कहना है कि गन्ने के दाम में बढ़ोतरी की गई है और भुगतान की प्रक्रिया को नियमित किया गया है. उनके अनुसार, “पिछली सरकारों की तुलना में रिकॉर्ड गन्ना भुगतान किया गया है और किसानों के हितों का ध्यान रखा जा रहा है.” 

सहारनपुर मंडल के उप गन्ना आयुक्त ओम प्रकाश सिंह का कहना है कि चीनी मिलों को लगातार निर्देश दिए जा रहे हैं और भुगतान पर नजर रखी जा रही है. उनके मुताबिक, “मिलों को समयसीमा के भीतर भुगतान करने के लिए कहा गया है और जहां भी देरी हो रही है, वहां कार्रवाई की जा रही है.” सरकार ने गन्ना भुगतान सुनिश्चित करने के लिए कई कदम उठाए हैं. मिलों पर बकाया होने पर नोटिस जारी किए जा रहे हैं और जरूरत पड़ने पर रिकवरी की कार्रवाई भी की जा रही है. इसके अलावा, एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दिया गया है, ताकि मिलों की आय बढ़े और वे भुगतान करने में सक्षम हों. डिजिटल भुगतान प्रणाली को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है, जिससे पैसा सीधे किसानों के खातों में पहुंच सके. राज्य परामर्शित मूल्य (SAP) में बढ़ोतरी भी इसी दिशा में एक कदम है.

इसके बावजूद जमीनी स्तर पर समस्या पूरी तरह हल नहीं हो पाई है. कई मिलें आर्थिक दबाव में हैं और भुगतान टाल रही हैं. कुछ मामलों में मिल प्रबंधन की उदासीनता भी सामने आती है. कार्रवाई की प्रक्रिया लंबी होने से किसानों को तुरंत राहत नहीं मिल पाती. यही कारण है कि हर साल यह समस्या दोहराई जाती है. इसका असर सामाजिक स्तर पर भी पड़ रहा है. किसान कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं और कई बार आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर हो रहे हैं.

यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है, क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में गन्ना हमेशा केंद्रीय भूमिका निभाता रहा है. पश्च‍िमी यूपी के बड़े गन्ना किसान देवेंद्र चौधरी बताते हैं “इस समस्या का समाधान केवल तात्कालिक उपायों से नहीं होगा. इसके लिए एक स्थायी ढांचा तैयार करना होगा, जिसमें गन्ना तौलते ही भुगतान की व्यवस्था हो, मिलों की वित्तीय स्थिति मजबूत की जाए और खांडसारी व चीनी मिलों के बीच संतुलन बनाया जाए. जब तक भुगतान को पूरी तरह समयबद्ध और पारदर्शी नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह संकट बार-बार सामने आता रहेगा.”

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