लखनऊ के वृंदावन योजना इलाके में रहने वाले अजय के लिए इस साल स्कूल खुलना किसी त्योहार जैसा नहीं, बल्कि आर्थिक संकट जैसा साबित हुआ. उनके दो बच्चे शहर के एक नामी निजी स्कूल में पढ़ते हैं. रिजल्ट के दिन उन्हें एक लिस्ट थमा दी गई- किताबों, कॉपियों, वर्कबुक और स्टेशनरी की लंबी सूची. साथ ही यह भी बता दिया गया कि किताबें स्कूल परिसर में ही तय तारीख पर मिलेंगी.
अजय बताते हैं, “हम गए तो वहां एक तरह से दुकान सजी हुई थी. कोई विकल्प नहीं था. दो बच्चों की किताबें 13,000 रुपए में मिलीं. अलग से 2,500 रुपए की स्टेशनरी और 1,300 रुपए की यूनिफॉर्म.” वे आगे कहते हैं, “सबसे हैरानी की बात यह थी कि कई किताबें ऐसी थीं, जिनका पूरे साल इस्तेमाल भी नहीं होता.”
यह सिर्फ अजय की कहानी नहीं है. राजधानी लखनऊ से लेकर रायबरेली, वाराणसी और संभल तक लाखों अभिभावक इसी ‘सिस्टम’ का हिस्सा बनने को मजबूर हैं.
नए शैक्षिक सत्र की शुरुआत के साथ ही उत्तर प्रदेश में किताबों और कॉपियों का बाजार एक बार फिर सुर्खियों में है. लेकिन यह चर्चा सिर्फ महंगाई की नहीं, बल्कि एक ऐसे संगठित तंत्र की है, जिसमें स्कूल, निजी प्रकाशक और तय दुकानदार मिलकर अभिभावकों की जेब पर भारी बोझ डाल रहे हैं. इस पूरे खेल को अभिभावक “कमीशनखोरी का सिंडिकेट” कह रहे हैं, जबकि शिक्षा विभाग इसे रोकने के दावे करता रहा है. जमीनी हकीकत यह है कि हर साल यह नेटवर्क और मजबूत होता जा रहा है.
महंगी किताबों का नया सत्र : 30 फीसदी तक बढ़े दाम
राजधानी लखनऊ से लेकर यूपी का कोई भी जिला क्यों न हो हर जगह एक जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं. निजी स्कूलों ने इस बार किताबों के दाम में 30 फीसदी तक बढ़ोतरी कर दी है. विषयवार प्रति किताब 20 से 150 रुपए तक महंगी हुई है, जबकि कॉपी और रजिस्टर पर भी तीन से 12 रुपए तक की बढ़ोतरी हुई है. कुल मिलाकर एक बच्चे पर इस साल 1200 से 3000 रुपए का अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है.
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वही किताबें, जो राष्ट्रीय स्तर पर तय पाठ्यक्रम के तहत सस्ती दरों पर उपलब्ध हैं, निजी स्कूलों में कई गुना महंगी कर दी जाती हैं. उदाहरण के तौर पर, NCERT की 10वीं और 12वीं की किताबों का पूरा सेट 1500 से 2000 रुपए के बीच मिल जाता है, जबकि निजी स्कूलों में यही सेट 6,000 से 10,000 रुपए तक पहुंच जाता है. यानी सात गुना तक का अंतर. यूपी बोर्ड के स्कूलों में स्थिति और भी स्पष्ट है. कक्षा 9 से 12 तक की किताबों का सेट 393 से 458 रुपए में उपलब्ध है, क्योंकि यहां NCERT आधारित किताबें अनिवार्य रूप से लागू हैं. लेकिन इन्हीं कक्षाओं में निजी प्रकाशकों की किताबें लगाई जाएं तो वही सेट करीब 3000 रुपए तक पहुंच जाता है. इससे साफ है कि अंतर केवल सामग्री का नहीं, बल्कि सिस्टम का है.
कमीशनखोरी की धुरी : स्कूल, प्रकाशक और बुक सेलर
लखनऊ के कई नामी स्कूलों में अभिभावकों ने खुलकर आरोप लगाए हैं कि उन्हें किताबें एक तय दुकान से ही खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है. पुराने लखनऊ स्थित एक स्कूल में यूकेजी के बच्चे की किताबों का सेट 4800 रुपए में बेचा जा रहा है, जबकि कई अन्य स्कूलों में यही सेट 8,000 से 10,000 रुपए तक पहुंच रहा है. एक अभिभावक ने बताया, “दो बच्चों की किताबों पर इस साल 10,000 रुपए खर्च हो गए. स्कूल ने लिस्ट भी नहीं दी, सीधे स्कूल में ही खरीदने को कहा गया.”
अर्जुनगंज के एक अभिभावक का कहना है, “किताबों पर पहले जो कीमत छपी थी, उसे पेन से काटकर और उसपर स्लिप लगाकर नई कीमत चिपका दी गई. हर किताब पर करीब 100 रुपए ज्यादा लिए गए.” वहीं एक अन्य अभिभावक ने आरोप लगाया कि अब एक ही विषय की दो-दो किताबें चलाने का नया ट्रेंड शुरू हो गया है, जिससे खर्च और बढ़ गया है. इस पूरे सिस्टम की जड़ में है स्कूल, प्रकाशक और बुक सेलर के बीच तय कमीशन. आरोप है कि स्कूल संचालक 10 से 50 फीसदी तक का कमीशन लेते हैं.
रायबरेली में अभिभावकों ने खुलकर कहा कि किताब, ड्रेस और स्टेशनरी हर चीज पर 20 से 30 फीसदी तक कमीशन वसूला जा रहा है. वहीं संभल के चंदौसी में ताराजू लेकर प्रदर्शन करने वाले व्यापारियों ने आरोप लगाया कि कुछ स्कूलों में यह कमीशन 40 से 50 फीसदी तक पहुंच चुका है. वाराणसी के एक नामी स्कूल में पढ़ने वाले छात्र के पिता ने कहा, “जो कॉपी बाजार में 50 रुपए की मिलती है, उसे स्कूलों के जरिए 200 रुपए तक में बेचा जा रहा है. यह सीधा-सीधा शोषण है.” इस विरोध को दिखाने के लिए चंदौसी के व्यापारियों ने 10,000 रुपए के नोटों से किताबों को तराजू में तौलकर प्रतीकात्मक प्रदर्शन भी किया था.
किताब बाजार का आकार : 3000 करोड़ का कमीशन!
उत्तर प्रदेश में स्कूली शिक्षा का दायरा देश में सबसे बड़ा है और इसमें निजी स्कूलों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में कुल स्कूल नामांकन का करीब 45–50% हिस्सा निजी स्कूलों में है. यदि कुल स्कूली बच्चों की संख्या (लगभग 4 से 5 करोड़) को आधार माना जाए, तो 1.8 से 2.2 करोड़ बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं. इन छात्रों पर कॉपी-किताबों का औसत खर्च 3,000 से 5,000 रुपए प्रति वर्ष बैठता है. इस आधार पर उत्तर प्रदेश में निजी स्कूलों का सिर्फ किताब-कॉपी बाजार ही 5,000 से 10,000 करोड़ रुपए सालाना का अनुमानित आकार ले चुका है.
इस कारोबार का सबसे अहम हिस्सा कमीशन है. विभिन्न जिलों से मिले इनपुट के अनुसार, स्कूल–प्रकाशक–दुकानदार नेटवर्क में 20 से 30 फीसदी औसत कमीशन और कई मामलों में 40 फीसदी से अधिक मार्जिन तक लिया जाता है. इसका मतलब है कि कुल बाजार का लगभग 1,000 से 3,000 करोड़ रुपए हिस्सा सिर्फ कमीशन और अतिरिक्त वसूली के रूप में जाता है. यानी यह सिर्फ किताबों का खर्च नहीं, बल्कि एक “फिक्स सप्लाई और हाई मार्जिन” वाला नियंत्रित बाजार है, जहां अभिभावक अनिवार्य उपभोक्ता हैं और प्रतिस्पर्धा लगभग खत्म हो चुकी है.
प्रकाशकों की भूमिका भी इस खेल में अहम है. एक प्रकाशक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “स्कूलों से सीधा संपर्क किया जाता है. उन्हें मार्जिन दिया जाता है और उसी के हिसाब से किताबें लगाई जाती हैं. अगर कोई स्कूल ज्यादा छात्रों वाला है, तो उसे ज्यादा फायदा दिया जाता है.” यही वजह है कि हर साल किताबें बदल दी जाती हैं, ताकि पुरानी किताबें किसी और के काम न आ सकें.
विभाग की कार्रवाई केवल दिखावे की
माध्यमिक शिक्षा विभाग खुद मान चुका है कि कई स्कूल NCERT के मुकाबले 149 फीसदी से लेकर 361 फीसदी तक महंगी किताबें पढ़ा रहे हैं. विभाग ने जिला विद्यालय निरीक्षकों को कार्रवाई के निर्देश भी दिए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर बहुत सीमित दिखता है. शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वे इस पर कार्रवाई कर रहे हैं. लखनऊ मंडल के एडी बेसिक सुरेंद्र तिवारी ने कहा कि सभी जिलों को निर्देश जारी किए जाएंगे और मनमानी करने वाले स्कूलों को चिह्नित कर कार्रवाई होगी.
माध्यमिक शिक्षा राज्य मंत्री गुलाब देवी ने भी अधिकारियों को अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं. एक अभिभावक मुदित गोयल बताते हैं, “हर साल विभाग किताबों पर कमीशनखोरी रोकने के लिए अभियान चलाने का निर्देश तब देता है जब आधी से ज्यादा किताबों बाजार में बिक चुकी होती हैं. इससे विभाग में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की मंशा पर भी सवाल उठता है. सरकार अगर वाकई में गंभीर है तो साल भर इसपर अभियान चलते रहना चाहिए. जनवरी से अप्रैल के बीच तो बेहद सघन तरीके से.”
अभिभावक कल्याण संघ के अध्यक्ष प्रदीप श्रीवास्तव कहते हैं, “सरकार को सभी बोर्ड में NCERT की किताबें लागू करनी चाहिए और कम से कम तीन साल तक एक ही किताब चलाने का नियम होना चाहिए. इससे अभिभावकों पर बोझ कम होगा और किताबों का पुनः उपयोग भी संभव होगा.”
नियमों की अनदेखी से उठ रहे सवाल
लेकिन सवाल यह है कि अगर नियम पहले से मौजूद हैं, तो उनका पालन क्यों नहीं हो रहा? दरअसल, समस्या सिर्फ नियमों की नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन की है. कागजों पर साफ लिखा है कि कोई भी स्कूल किसी एक दुकान से खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता और ओवरचार्जिंग पर रोक है. लेकिन हकीकत में स्कूल सीधे आदेश नहीं देते, बल्कि ऐसा माहौल बना देते हैं कि अभिभावक विकल्प होने के बावजूद उसी तय दुकान से खरीदारी करने को मजबूर हो जाते हैं.
एक और बड़ा कारण है निगरानी की कमी. जिला स्तर पर अधिकारियों के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वे हर स्कूल की जांच कर सकें. वहीं कई मामलों में स्थानीय स्तर पर मिलीभगत के आरोप भी लगते रहे हैं. यही वजह है कि हर साल सिर्फ आदेश जारी होते हैं, लेकिन जमीनी बदलाव नहीं दिखता. माध्यमिक शिक्षक संघ के नेता डॉ. आरपी मिश्रा कहते हैं, “हर साल एक आदेश जारी कर दिया जाता है, लेकिन असली समस्या पर कार्रवाई नहीं होती. स्कूल, प्रकाशक और विभाग की मिलीभगत से ही यह खेल चल रहा है.” वहीं शिक्षक संघ के ही एक अन्य पदाधिकारी नरेंद्र कुमार वर्मा का कहना है कि “अब तो एक ही किताब को दो पार्ट में बांटकर अलग-अलग बेचा जा रहा है, ताकि मुनाफा और बढ़ाया जा सके.”
अभिभावकों की बेबसी और विकल्प
अभिभावकों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनके पास विकल्प होते हुए भी वे उनका इस्तेमाल नहीं कर पाते. स्कूल की ओर से दिए गए संकेत, बच्चों पर पड़ने वाले असर का डर और समय की कमी उन्हें उसी सिस्टम में शामिल होने के लिए मजबूर कर देती है. हालांकि, कुछ रास्ते अभी भी मौजूद हैं. अभिभावक स्कूल से लिखित में मांग सकते हैं कि बाहर से किताब खरीदने की अनुमति है.
हर खरीद की रसीद लेना और एमआरपी से मिलान करना जरूरी है. जबरन खरीद का दबाव होने पर जिला विद्यालय निरीक्षक, बेसिक शिक्षा अधिकारी या उपभोक्ता फोरम में शिकायत की जा सकती है. लेकिन जब तक इस पूरे सिस्टम पर सख्ती से कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह समस्या बनी रहेगी. शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में अगर कमीशनखोरी का यह खेल चलता रहा, तो इसका असर सिर्फ अभिभावकों की जेब पर नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता पर पड़ेगा.

