लगभग एक दशक पहले तक उत्तर प्रदेश में बिजली कटौती, ट्रांसफॉर्मर फुंकने, लो-वोल्टेज और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन आम राजनीतिक दृश्य हुआ करते थे. योगी आदित्यनाथ सरकार ने 2017 के बाद लगातार यह दावा किया कि उसने प्रदेश को 'अंधेरे से उजाले' की ओर ले जाने का काम किया है.
लेकिन अब, भीषण गर्मी के बीच लखनऊ समेत कई शहरी और ग्रामीण इलाकों में बढ़ती बिजली कटौती, स्थानीय खराबियों और मरम्मत में देरी ने फिर से उसी पुराने सवाल को जिंदा कर दिया है कि आखिर उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था में गड़बड़ी कहां है?
दिलचस्प बात यह है कि इस बार संकट की प्रकृति पहले जैसी नहीं दिखती. राज्य सरकार और ऊर्जा विभाग का दावा है कि बिजली की उपलब्धता में कोई बड़ी कमी नहीं है. उत्तर प्रदेश में हाल ही में बिजली की मांग 30,000 मेगावाट के पार पहुंच गई, जो देश में सबसे अधिक मांगों में से एक है. अधिकारियों के अनुसार, इतनी भारी मांग के बावजूद बिजली खरीद और उत्पादन की व्यवस्था पर्याप्त है. यानी समस्या उत्पादन से ज्यादा वितरण व्यवस्था में दिखाई दे रही है.
यही वजह है कि बिजली संकट अब सिर्फ प्रशासनिक मसला नहीं, बल्कि योगी सरकार के लिए राजनीतिक और प्रबंधन कुशलता की परीक्षा की परीक्षा बनता जा रहा है. विधानसभा चुनावों से पहले विपक्ष इस मुद्दे को सरकार की विफलता के रूप में पेश कर रहा है जबकि BJP के अपने विधायक भी सार्वजनिक तौर पर शिकायतें दर्ज करा रहे हैं.
लोगों तक क्यों नहीं पहुंच पा रही बिजली
ऊर्जा विभाग का तर्क है कि मौजूदा संकट बिजली की कमी का नहीं, बल्कि लोकल फॉल्ट और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क पर बढ़ते दबाव का है. लेकिन उपभोक्ताओं और कर्मचारी संगठनों का कहना है कि असली समस्या वितरण व्यवस्था के पुनर्गठन, कर्मचारियों की कमी और कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर से पैदा हुई है. इस पूरे विवाद के केंद्र में है 'वर्टिकल सिस्टम’, जिसे पिछले साल कई शहरों में लागू किया गया. इस व्यवस्था में बिजली विभाग के कामों को अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया गया है. पहले किसी इलाके में एक जूनियर इंजीनियर (JE) या सब-डिविजनल ऑफिसर (SDO) लगभग हर समस्या के लिए सीधे जिम्मेदार होता था. उपभोक्ताओं को पता रहता था कि शिकायत किससे करनी है. लेकिन नई व्यवस्था में बिलिंग, मीटरिंग, रखरखाव और तकनीकी कार्य अलग-अलग इकाइयों में बांट दिए गए हैं.
आलोचकों का कहना है कि इससे जवाबदेही कमजोर हुई है. कई बार अधिकारी खुद तय नहीं कर पाते कि किसी तकनीकी खराबी को ठीक करने की जिम्मेदारी किसकी है.नतीजा यह कि उपभोक्ता हेल्पलाइन, ऑनलाइन शिकायत और अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर काटते रहते हैं. ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे कहते हैं, “इस फेसलेस व्यवस्था ने भारी भ्रम पैदा कर दिया है. उपभोक्ताओं और फील्ड कर्मचारियों दोनों को यह समझ नहीं आता कि आखिर जिम्मेदार कौन है. लखनऊ में पैदा हुआ संकट जल्दबाजी में लागू किए गए वर्टिकल सिस्टम का नतीजा है.” दुबे का आरोप है कि 1912 हेल्पलाइन और ऑनलाइन सिस्टम पर अत्यधिक निर्भरता ने उपभोक्ताओं और फील्ड कर्मचारियों के बीच सीधा तालमेल खत्म कर दिया है. शिकायतें दर्ज तो हो जाती हैं, लेकिन समाधान में देरी होती है.
कर्मचारियों की कमी या सुधारों का विरोध?
बिजली कर्मचारी संगठन लगातार दावा कर रहे हैं कि बढ़ती मांग के मुकाबले विभाग में कर्मचारियों की संख्या घटती जा रही है. यूपी बिजली कर्मचारी संघ के पदाधिकारियों के मुताबिक विभाग में लगभग 73 हजार स्वीकृत पद हैं, जिनमें 43 हजार से अधिक खाली पड़े हैं. उनका आरोप है कि पिछले चार वर्षों में बड़े स्तर पर भर्ती नहीं हुई जबकि 20 हजार से ज्यादा संविदा कर्मचारियों को हटा दिया गया. एक वरिष्ठ पदाधिकारी के अनुसार, “मौजूदा कर्मचारियों पर काम का बोझ कई गुना बढ़ गया है. गर्मियों में फॉल्ट आने पर कर्मचारियों को देर रात तक ड्यूटी करनी पड़ती है.”
वहीं दूसरी तरफ यूपी पॉवर कार्पोरेशन लिमिटेड यानी UPPCL प्रबंधन इन आरोपों को खारिज करता है. UPPCL चेयरमैन और अतिरिक्त मुख्य सचिव (ऊर्जा) आशीष गोयल का कहना है कि देश की सबसे अच्छी बिजली कंपनियां वर्टिकल सिस्टम पर ही काम करती हैं. गोयल के मुताबिक यह व्यवस्था हर काम के लिए अलग जवाबदेही तय करती है और भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम करती है. उपभोक्ताओं को किसी अधिकारी से सीधे मिलने की जरूरत नहीं पड़ती. जिन शहरों में यह लागू हुआ है, वहां तकनीकी प्रदर्शन बेहतर हुआ है.
गोयल ने कर्मचारियों की कमी के आरोपों को भी खारिज किया और कहा कि पिछले दिनों रिकॉर्ड मांग के बावजूद स्थिति काफी हद तक नियंत्रण में रही. हालांकि विभाग के भीतर ही यह स्वीकार किया जा रहा है कि वितरण नेटवर्क पर दबाव बढ़ा है. एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, “कुछ स्थानों पर तय लोड और वास्तविक खपत में बड़ा अंतर है. इससे ट्रांसफॉर्मर और फीडर ओवरलोड हो रहे हैं.”
ओवरलोड सिस्टम और कमजोर ढांचा
विशेषज्ञों और कर्मचारियों का कहना है कि पिछले दशक में बिजली की मांग तेजी से बढ़ी, लेकिन उसी अनुपात में इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित नहीं हुआ. आज उत्तर प्रदेश में उपभोक्ताओं की संख्या 3.5 करोड़ से अधिक हो चुकी है. लेकिन कर्मचारी संगठनों का दावा है कि नए सबस्टेशन और फीडरों का विस्तार पर्याप्त नहीं हुआ. शैलेंद्र दुबे का कहना है कि लखनऊ जैसे शहर को लगभग 350 सबस्टेशन की जरूरत है, जबकि यहां सिर्फ 148 सबस्टेशन हैं. उनके अनुसार, “बड़ी संख्या में ट्रांसफॉर्मर, फीडर और सबस्टेशन ओवरलोड पर चल रहे हैं. इससे बार-बार ट्रिपिंग, लो-वोल्टेज और ट्रांसफॉर्मर फेल होने जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं.”
फील्ड कर्मचारियों का कहना है कि अब एक JE तीन से चार सबस्टेशनों को संभाल रहा है जबकि एक SDO के जिम्मे 10 से 12 फीडर हैं. ऐसे में खराबी आने पर तुरंत समाधान संभव नहीं हो पाता. उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन टेंडर/कॉन्ट्रैक्ट एम्प्लॉइज यूनियन के महासचिव देवेंद्र कुमार पांडे के मुताबिक व्यवस्थागत विफलताओं का गुस्सा सबसे ज्यादा फ्रंटलाइन कर्मचारियों को झेलना पड़ता है. बिजली कटते ही जनता लाइनमैन और स्थानीय इंजीनियरों पर हमला करती है, जबकि प्रशासनिक दबाव JE और SDO पर पड़ता है.
मई के दौरान कई थर्मल पावर इकाइयों के बंद रहने से भी बिजली संकट गहराया. भीषण गर्मी के बीच जब मांग चरम पर थी, उसी समय हजारों मेगावाट उत्पादन प्रभावित हुआ. घाटमपुर की 660 मेगावाट इकाई 18 दिन बंद रही, जबकि ललितपुर की 660 मेगावाट इकाई 11 दिन तक बंद रही. ओबरा, अनपरा, जवाहरपुर, लैंको, परीछा और खुर्जा की इकाइयों में भी कई दिनों तक उत्पादन ठप रहा. राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के चेयरमैन अवधेश कुमार वर्मा ने आरोप लगाया कि रखरखाव, कोयला प्रबंधन और क्षमता विस्तार में लापरवाही के कारण उपभोक्ताओं को अघोषित बिजली कटौती झेलनी पड़ रही है. उन्होंने कहा, “उपभोक्ताओं से भारी बिल वसूले जा रहे हैं, लेकिन सिस्टम की क्षमता मांग के अनुरूप विकसित नहीं की गई. केवल बिजली उपलब्ध होना काफी नहीं है. तकनीकी खराबी और उन्हें ठीक करने में देरी लोगों की परेशानी बढ़ा रही है.”
BJP विधायक भी खुलकर उठा रहे सवाल
बिजली संकट का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि अब इस मुद्दे पर सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि BJP विधायक भी खुलकर बोल रहे हैं. हाल ही में लखनऊ पूर्व से विधायक ओपी श्रीवास्तव ने ऊर्जा मंत्री एके शर्मा को पत्र लिखकर लखनऊ पूर्व में अघोषित बिजली कटौती पर चिंता जताई. इससे पहले लखनऊ के सरोजनीनगर विधानसभा सीट से विधायक राजेश्वर सिंह और लखनऊ उत्तर से विधायक नीरज बोरा भी बिजली समस्याओं को लेकर पत्र लिख चुके हैं.
विपक्ष ने भी इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना लिया है. विधानसभा में विपक्ष के नेता माता प्रसाद पांडे ने सिद्धार्थनगर में बिजली कटौती का मुद्दा उठाया. बीएसपी प्रमुख मायावती ने कहा कि भीषण गर्मी में बिजली कटौती ने गरीबों, किसानों और छोटे व्यापारियों का जीवन मुश्किल बना दिया है. वहीं सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार से पूछा कि जब मांग और दरें लगातार बढ़ रही हैं तो नई उत्पादन क्षमता कितनी जोड़ी गई. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने सरकार से 'श्वेत पत्र' जारी करने की मांग करते हुए कहा कि जनता को यह जानने का अधिकार है कि पिछले नौ वर्षों में बिजली उत्पादन और ग्रिड क्षमता में कितना विस्तार हुआ.
योगी सरकार के लिए चुनौती क्यों?
योगी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में कानून व्यवस्था और बिजली आपूर्ति को गिना जाता रहा है. BJP लगातार यह प्रचार करती रही है कि SP और BSP सरकारों के दौर की तरह अब 'रोस्टर आधारित कटौती' नहीं होती. ऊर्जा मंत्री ए. के. शर्मा भी यही तर्क देते हैं. उनका कहना है कि 2012-17 के दौरान राज्य की औसत मांग लगभग 13 हजार मेगावाट थी, जबकि आज यह 30 हजार मेगावाट के पार है और सरकार पूरी मांग पूरी कर रही है. लेकिन राजनीतिक चुनौती सिर्फ 'उत्पादन' का आंकड़ा नहीं है.
आम उपभोक्ता के लिए असली सवाल यह है कि उसके घर में बिजली लगातार आ रही है या नहीं. यदि शहरों में घंटों फॉल्ट बना रहता है, ट्रांसफॉर्मर जलते हैं, वोल्टेज गिरता है और शिकायतों का समाधान नहीं होता, तो सरकार के बड़े दावे जमीन पर कमजोर पड़ने लगते हैं. यही वजह है कि BJP विधायक भी अब अपने क्षेत्रों में जनता के बढ़ते असंतोष को महसूस कर रहे हैं. बिजली ऐसा मुद्दा है जो सीधे रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करता है. गर्मी के मौसम में यह असंतोष तेजी से राजनीतिक नाराजगी में बदल सकता है.
फिलहाल सरकार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि स्थिति नियंत्रण में है और स्थानीय तकनीकी समस्याओं को दूर करने के लिए काम जारी है. LESA लखनऊ सेंट्रल के चीफ इंजीनियर रवि अग्रवाल कहते हैं, “हमारा मौजूदा फोकस बिना रुकावट बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करना है. सुधार कार्य लगातार जारी हैं.” लेकिन सवाल सिर्फ अस्थायी सुधार का नहीं, बल्कि पूरी वितरण व्यवस्था की क्षमता का है.
क्या तेजी से बढ़ती मांग के मुकाबले उत्तर प्रदेश का बिजली ढांचा पर्याप्त है? क्या कर्मचारियों की कमी और पुनर्गठन की नीतियां फील्ड स्तर पर संकट पैदा कर रही हैं? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या सरकार इस मुद्दे को चुनावी असंतोष बनने से रोक पाएगी? फिलहाल इतना साफ दिख रहा है कि बिजली संकट अब केवल तकनीकी या प्रशासनिक विषय नहीं रह गया है. यह योगी सरकार की प्रशासनिक क्षमता, राजनीतिक विश्वसनीयता और चुनावी रणनीति तीनों की बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है.

