scorecardresearch

यूपी पुलिस को चार साल बाद मिलेगा स्थाई डीजीपी; कौन हैं दावेदार?

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और UPSC प्रक्रिया के बीच उत्तर प्रदेश में चार साल बाद स्थाई DGP की नियुक्ति की राह साफ होती दिख रही है, राजीव कृष्ण सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं

UP Police SI Recruitment
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 27 मई , 2026

उत्तर प्रदेश को क्या लगभग चार साल बाद आखिरकार एक स्थाई पुलिस महानिदेशक (DGP) मिलने जा रहा है? बीते कई वर्षों से कार्यवाहक डीजीपी व्यवस्था के सहारे चल रही यूपी पुलिस में अब शीर्ष पद पर नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है. 

संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की नई दिल्ली में हुई बैठक के बाद यह संकेत मिल रहे हैं कि राज्य सरकार को जल्द ही तीन वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों का पैनल भेजा जाएगा, जिनमें से किसी एक के नाम पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अंतिम मुहर लगाएंगे. 

यह पूरी प्रक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में पिछले चार वर्षों से स्थाई पुलिस प्रमुख की नियुक्ति नहीं हो सकी है. पूर्व डीजीपी मुकुल गोयल को पद से हटाए जाने के बाद से लेकर अब तक राज्य में लगातार कार्यवाहक पुलिस प्रमुखों के सहारे व्यवस्था चलती रही. बाद में प्रशांत कुमार को कार्यवाहक डीजीपी बनाया गया, लेकिन उन्हें भी स्थाई नियुक्ति नहीं मिली. पिछले साल 31 मई को प्रशांत कुमार के रिटायर होने के बाद राजीव कृष्ण को कार्यवाहक डीजीपी का दायित्व सौंपा गया और तब से वही इस पद को संभाल रहे हैं.

दरअसल सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से राज्यों में 'कार्यवाहक डीजीपी संस्कृति' पर नाराज़गी जताता रहा है. शीर्ष अदालत ने साफ कहा था कि राज्यों को पुलिस प्रमुख की नियुक्ति तय प्रक्रिया और निर्धारित कार्यकाल के आधार पर करनी चाहिए, ताकि पुलिस नेतृत्व राजनीतिक और प्रशासनिक अनिश्चितताओं से मुक्त रह सके. इसी वजह से यूपी सरकार को भी सुप्रीम कोर्ट की तरफ से तय दिशा-निर्देशों के अनुरूप UPSC के जरिए स्थाई डीजीपी चयन प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी. 

राज्य सरकार ने 18 मार्च को पात्र वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों के नाम UPSC को भेजे थे. इसके बाद 26 मई को नई दिल्ली में आयोग की बैठक हुई, जिसमें उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव एस.पी. गोयल और अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद समेत वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए. बैठक में वरिष्ठता, सेवा रिकॉर्ड, अनुभव और पात्रता मानकों के आधार पर अधिकारियों के नामों पर विचार किया गया. माना जा रहा है कि आयोग एक या दो दिन में अपना पैनल राज्य सरकार को भेज सकता है. इस बार जिन नामों की सबसे ज्यादा चर्चा है, उनमें 1990 बैच की वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी रेणुका मिश्रा, 1991 बैच के आलोक शर्मा, पीयूष आनंद और वर्तमान कार्यवाहक डीजीपी राजीव कृष्ण प्रमुख हैं.

रेणुका मिश्रा वरिष्ठता के लिहाज से सबसे आगे हैं. वहीं आलोक शर्मा फिलहाल स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (SPG) के निदेशक हैं और पीयूष आनंद राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) के प्रमुख के रूप में कार्यरत हैं. हालांकि आलोक शर्मा के कार्यकाल में छह महीने से कम समय बचा होने की बात कही जा रही है, जो डीजीपी चयन की अनिवार्य शर्तों में बाधा बन सकती है.

जानकारी के अनुसार, वर्तमान कार्यवाहक डीजीपी राजीव कृष्ण इस दौड़ में सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं. योगी सरकार के भीतर उनकी प्रशासनिक पकड़, कानून-व्यवस्था के मामलों में सक्रिय भूमिका और सरकार के भरोसेमंद अधिकारी के तौर पर उनकी छवि को उनके पक्ष में देखा जा रहा है. राजीव कृष्ण के पास फिलहाल महानिदेशक सतर्कता का अतिरिक्त प्रभार भी है. माना जा रहा है कि सरकार 'कंटीन्यूटी' यानी नेतृत्व में निरंतरता के आधार पर भी उनके नाम को प्राथमिकता दे सकती है. हालांकि, अंतिम फैसला सिर्फ वरिष्ठता से तय नहीं होगा. 

सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के अनुसार UPSC तीन नामों का पैनल तैयार करता है और फिर राज्य सरकार उन नामों में से किसी एक को चुनती है. चयन प्रक्रिया में अधिकारी का सेवा रिकॉर्ड, ईमानदारी, प्रशासनिक क्षमता, कानून-व्यवस्था संभालने का अनुभव और केंद्रीय एजेंसियों में काम का रिकॉर्ड महत्वपूर्ण माना जाता है. निर्धारित मानदंडों के मुताबिक, किसी अधिकारी के पास पुलिसिंग के मुख्य क्षेत्रों में कम से कम 10 वर्षों का अनुभव होना चाहिए. इसमें जिला, जोन या रेंज स्तर पर कानून-व्यवस्था संभालना, अपराध जांच एजेंसियों में काम करना, सीआईडी, आर्थिक अपराध शाखा, साइबर क्राइम, भ्रष्टाचार-रोधी इकाइयों, खुफिया शाखाओं और आतंकवाद-रोधी अभियानों में अनुभव शामिल है. 

इसके अलावा IB, RAW, CBI, NIA, प्रवर्तन निदेशालय, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, SPG, NSG और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों जैसी एजेंसियों में प्रतिनियुक्ति भी एक अहम योग्यता मानी जाती है. यही वजह है कि पीयूष आनंद और आलोक शर्मा जैसे अधिकारी भी गंभीर दावेदार माने जा रहे हैं, क्योंकि दोनों के पास केंद्रीय एजेंसियों में लंबा अनुभव है. लेकिन यूपी की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में सिर्फ सेवा रिकॉर्ड ही निर्णायक नहीं होता. राज्य सरकार यह भी देखती है कि कौन अधिकारी सरकार की प्राथमिकताओं के अनुरूप काम कर सकता है और 2027 विधानसभा चुनाव से पहले कानून-व्यवस्था के बड़े राजनीतिक और सामाजिक दबावों को प्रभावी ढंग से संभाल सकता है. 

दरअसल अगले डेढ़-दो वर्षों में उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था सरकार के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा बनने जा रही है. पंचायत चुनाव, नगरीय राजनीतिक गतिविधियां, धार्मिक आयोजन, जातिगत समीकरण, अपराध नियंत्रण और 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां, इन सबके बीच डीजीपी की भूमिका बेहद अहम होगी. ऐसे में सरकार किसी ऐसे अधिकारी को चुनना चाहेगी जो प्रशासनिक रूप से मजबूत होने के साथ-साथ राजनीतिक नेतृत्व के साथ तालमेल बैठाने में भी सक्षम हो.

यूपी पुलिस देश की सबसे बड़ी पुलिस फोर्स मानी जाती है. लगभग ढाई लाख से ज्यादा पुलिसकर्मियों वाली इस व्यवस्था का नेतृत्व सिर्फ प्रशासनिक पद नहीं बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक महत्व भी रखता है. डीजीपी कानून-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण, खुफिया समन्वय, सांप्रदायिक संवेदनशीलता और बड़े आयोजनों की सुरक्षा रणनीति तय करने में केंद्रीय भूमिका निभाता है. यही कारण है कि इस पद पर लंबे समय तक स्थाई नियुक्ति न होना विपक्ष और न्यायपालिका दोनों के लिए चिंता का विषय रहा. सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कई मामलों में कहा था कि राज्यों का बार-बार कार्यवाहक डीजीपी नियुक्त करना पुलिस सुधारों की भावना के खिलाफ है. अदालत का मानना रहा है कि जब तक पुलिस प्रमुख को निश्चित कार्यकाल और संस्थागत स्थिरता नहीं मिलेगी, तब तक पुलिस नेतृत्व राजनीतिक बदलावों से प्रभावित होता रहेगा. यूपी में लगातार कार्यवाहक व्यवस्था बने रहने को भी इसी नजरिए से देखा गया. 

अब जबकि UPSC की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच चुकी है, राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि क्या योगी सरकार वास्तव में एक पूर्णकालिक स्थाई डीजीपी नियुक्त करेगी या फिर किसी नई प्रशासनिक रणनीति के तहत स्थिति को लंबा खींचा जाएगा. 

हालांकि इस बार संकेत अपेक्षाकृत स्पष्ट माने जा रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के दबाव, UPSC की सक्रियता और राज्य सरकार की औपचारिक भागीदारी को देखते हुए माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश को जल्द ही नया स्थाई पुलिस प्रमुख मिल सकता है. यदि ऐसा होता है तो यह सिर्फ एक प्रशासनिक नियुक्ति नहीं होगी, बल्कि पिछले चार वर्षों से चली आ रही अस्थाई व्यवस्था के अंत का संकेत भी होगी. साथ ही यह भी साफ होगा कि देश के सबसे बड़े राज्य में पुलिस नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता की स्थिति आखिरकार खत्म होने जा रही है.

Advertisement
Advertisement