यूपी में पूर्व विधायक मुकेश श्रीवास्तव की लखनऊ में गिरफ्तारी ने एक बार फिर उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन यानी NRHM घोटाले की फाइलों पर जमी धूल हटा दी है. इस गिरफ्तारी के साथ एक बड़ा सवाल फिर खड़ा हो गया है.
इस घोटाले के दौरान दो सीएमओ की दिनदहाड़े हत्या हुई, एक डिप्टी सीएमओ जेल के भीतर संदिग्ध परिस्थितियों में मृत मिला और जिसकी जांच में बड़े नेताओं, अफसरों और ठेकेदारों के नाम उछले, उस मामले में आखिर हत्या की साजिश रचने वाले कथित मास्टरमाइंड आज भी कानून की पकड़ से बाहर क्यों हैं?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विजिलेंस जहां वित्तीय अनियमितताओं और आय से अधिक संपत्ति के मामलों में कार्रवाई कर रही है, वहीं हत्याओं की गुत्थी डेढ़ दशक बाद भी पूरी तरह नहीं सुलझ पाई है.
गिरफ्तारी ने फिर जगा दी पुरानी यादें
बहराइच जिले में पयागपुर से पूर्व कांग्रेस विधायक और बाद में समाजवादी पार्टी से जुड़े मुकेश श्रीवास्तव को विजिलेंस ने आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में गिरफ्तार किया है. विजिलेंस के अनुसार उन्होंने अपनी वैध आय से लगभग 59.74 प्रतिशत अधिक संपत्ति अर्जित की. इसके अलावा श्रावस्ती, बलरामपुर और गोंडा में NRHM योजना के तहत हुए कार्यों में वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की जांच भी उनके खिलाफ चल रही है. जांच एजेंसियों के मुताबिक अस्पतालों के मेंटेनेंस, मेडिकल उपकरणों की खरीद, दवाओं की सप्लाई, आउटसोर्सिंग कर्मचारियों की नियुक्ति और वाहन संचालन जैसी योजनाओं में बड़े पैमाने पर धांधली हुई.
आरोप है कि कई काम कागजों पर पूरे दिखाए गए, कुछ में आंशिक काम कराकर पूरा भुगतान ले लिया गया और कई मामलों में टेंडर प्रक्रिया तक का पालन नहीं किया गया. लेकिन मुकेश श्रीवास्तव की गिरफ्तारी केवल भ्रष्टाचार की कहानी नहीं है. यह उस पूरे तंत्र की याद दिलाती है जिसके दौरान उत्तर प्रदेश में तीन वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों की मौत हुई थी और जिसने तत्कालीन सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया था.
जब NRHM घोटाला बना खूनी रहस्य
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए की गई थी. केंद्र से अरबों रुपए राज्यों को भेजे गए थे. उत्तर प्रदेश में भी इस योजना के तहत भारी धनराशि खर्च हुई. लेकिन कुछ ही वर्षों में शिकायतें आने लगीं कि दवाओं की खरीद, भवन निर्माण, उपकरणों की सप्लाई और विभिन्न परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है.
इसी दौरान 27 अक्टूबर 2010 को लखनऊ में परिवार कल्याण विभाग के तत्कालीन सीएमओ डॉ. विनोद आर्या की गोली मारकर हत्या कर दी गई. मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि 2 अप्रैल 2011 को उनके उत्तराधिकारी डॉ. ब्रह्म प्रसाद सिंह की भी हत्या कर दी गई. दो वरिष्ठ अधिकारियों की हत्या ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया. लेकिन असली सनसनी तब फैली जब 22 जून 2011 को NRHM घोटाले में आरोपी बनाए गए डिप्टी सीएमओ डॉ. योगेंद्र सिंह सचान जेल के भीतर मृत पाए गए.
शुरुआती दावा आत्महत्या का था लेकिन परिस्थितियां ऐसी थीं कि हत्या की आशंका लगातार बनी रही. एक के बाद एक तीन मौतों ने यह संकेत दिया कि NRHM घोटाले के पीछे केवल वित्तीय अनियमितताएं नहीं, बल्कि कहीं अधिक बड़ा और संगठित खेल छिपा हो सकता है.
सीबीआई की जांच और अनसुलझे सवाल
सीएमओ हत्याकांड और डॉ. सचान की मौत की जांच के दौरान कई चर्चित नाम सामने आए. जांच एजेंसियों और न्यायिक जांच में पूर्वांचल के एक प्रभावशाली बाहुबली सांसद, तत्कालीन सरकार के एक मंत्री और कुछ अन्य राजनीतिक प्रभाव वाले व्यक्तियों के नाम चर्चा में आए. डॉ. विनोद आर्या हत्याकांड में एक विधायक का नाम भी सामने आया था. आरोप था कि शूटरों को सुपारी देकर हत्या कराई गई.
हालांकि जांच एजेंसियां इन आरोपों को अदालत में साबित करने लायक साक्ष्य जुटाने में सफल नहीं हो सकीं. यही वह बिंदु है जहां पूरा मामला उलझ गया. हत्या करने वाले कुछ शूटरों और प्रत्यक्ष आरोपियों तक तो जांच पहुंची लेकिन कथित साजिशकर्ताओं तक नहीं. NRHM घोटाले की गंभीरता को देखते हुए कई मामलों की जांच सीबीआई को सौंपी गई.
डॉ. योगेंद्र सिंह सचान की मौत की जांच भी सीबीआई ने की. दिलचस्प बात यह रही कि जांच एजेंसी ने दो बार क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की और मौत को आत्महत्या बताया. लेकिन अदालत ने दोनों बार कई सवाल उठाए. बाद में विशेष अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि उपलब्ध परिस्थितियों में हत्या और साजिश की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. यहीं से यह सवाल और गहरा हो गया कि अगर अदालत को हत्या की आशंका दिख रही थी तो फिर जांच एजेंसियां कथित साजिशकर्ताओं तक क्यों नहीं पहुंच सकीं?
पूर्व अधिकारियों का कहना है कि ऐसे मामलों में प्रत्यक्ष सबूत मिलना बेहद कठिन होता है. साजिश रचने वाले आमतौर पर घटनास्थल से दूर रहते हैं और उनके खिलाफ केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य ही उपलब्ध होते हैं. ऐसे मामलों में मजबूत तकनीकी और वित्तीय जांच की जरूरत होती है, जो उस समय सीमित थी.
अलग-अलग रास्तों पर जांच
मुकेश श्रीवास्तव के मामले में विजिलेंस जिन दस्तावेजों, बैंक लेन-देन, संपत्तियों और भुगतान रिकॉर्ड के आधार पर कार्रवाई कर रही है, वे वित्तीय अपराधों से जुड़े सबूत हैं. ऐसे मामलों में कागजी दस्तावेज, बैंकिंग रिकॉर्ड और सरकारी फाइलें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. इसके विपरीत हत्या के मामलों में प्रत्यक्ष गवाह, फॉरेंसिक साक्ष्य और साजिश की कड़ियों को जोड़ना पड़ता है. NRHM प्रकरण में यही सबसे कमजोर कड़ी साबित हुई.
मुकेश श्रीवास्तव के खिलाफ सबूत मुहैया कराने में पयागपुर से वर्तमान बीजेपी विधायक सुभाष त्रिपाठी की बड़ी भूमिका रही. वर्ष 2017 में यूपी में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद से सुभाष त्रिपाठी ने अलग-अलग स्तरों पर मुकेश श्रीवास्तव की तरफ की गई गड़बडि़यों के सबूत जांच एजेंसियों को मुहैया कराए. सुभाष त्रिपाठी के प्रयास से ही मुकेश पर मुकदमा कायम हो सका और जांच एजेंसियों का शिकंजा कसा.
हालांकि सीएमओ हत्याकांड की जांच में वर्षों बीतने के साथ कई गवाह बदल गए, कुछ दस्तावेज गायब हो गए और कई अधिकारी सेवानिवृत्त हो गए. जांच के शुरुआती दौर में भी रिकॉर्ड उपलब्ध न होने की शिकायतें सामने आती रहीं. जांच एजेंसियों को कई बार अस्पतालों के अधिकारियों और कर्मचारियों को तलब करना पड़ा था ताकि पुराने दस्तावेज जुटाए जा सकें. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर वित्तीय अनियमितताओं की जांच और हत्या की जांच को एकीकृत तरीके से आगे बढ़ाया जाता तो शायद साजिश की तस्वीर अधिक स्पष्ट हो सकती थी.
परिवार आधारित नेटवर्क की जांच
विजिलेंस की मौजूदा जांच में मुकेश श्रीवास्तव के अलावा उनके परिवार से जुड़ी कंपनियों की भूमिका भी सामने आई है. जांच में पत्नी पूजा श्रीवास्तव, भाभी सविता श्रीवास्तव और परिवार से जुड़ी फर्मों के माध्यम से किए गए कार्यों की पड़ताल की जा रही है. जानकारी के अनुसार मेडिकल उपकरणों की खरीद, मेंटेनेंस और अन्य ठेकों में इन कंपनियों को लाभ पहुंचाए जाने के संकेत मिले हैं. कई वित्तीय लेन-देन भी जांच एजेंसियों ने ट्रैक किए हैं.
इसके अलावा पूर्व विधायक मुकेश श्रीवास्तव के भाई अजय श्रीवास्तव के खिलाफ भी आय से अधिक संपत्ति की जांच चल रही है. आउटसोर्सिंग कर्मचारियों की नियुक्ति और भुगतान से जुड़े मामलों की भी समीक्षा की जा रही है. इन जांचों से यह स्पष्ट होता है कि एजेंसियां अब केवल व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क को समझने की कोशिश कर रही हैं. हालांकि यह जांच अभी भी वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित है.
क्या कभी सामने आएंगे असली मास्टरमाइंड?
सबसे बड़ा सवाल यही है. 15 वर्ष बीत जाने के बावजूद NRHM घोटाले से जुड़ी हत्याओं में कथित राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षकों की भूमिका अदालत में साबित नहीं हो सकी है. कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार समय बीतने के साथ हत्या के मामलों में दोष सिद्ध करना और कठिन हो जाता है. गवाहों की स्मृति कमजोर पड़ती है, दस्तावेजी सबूत कम हो जाते हैं और परिस्थितिजन्य कड़ियां टूटने लगती हैं.
फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि डॉ. सचान की मौत को लेकर अदालत ने हत्या और साजिश की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया. इसका अर्थ है कि जांच के कई सवाल अब भी खुले हुए हैं. उधर, मुकेश श्रीवास्तव की गिरफ्तारी को केवल एक व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई के रूप में नहीं देखा जा रहा. विजिलेंस श्रावस्ती, बलरामपुर और गोंडा में दर्ज मामलों में चार्जशीट दाखिल करने की तैयारी कर रही है.
अगर इन मामलों में वित्तीय प्रवाह, पेमेंट चेन और लाभार्थियों का पूरा नेटवर्क सामने आता है तो संभव है कि NRHM घोटाले की कुछ नई परतें खुलें. जांच एजेंसियों को उम्मीद है कि वित्तीय रिकॉर्ड की नई पड़ताल से उन कड़ियों तक पहुंचा जा सकता है जो पहले नजरअंदाज हो गई थीं. हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे सीएमओ हत्याकांड की गुत्थी भी सुलझ जाएगी.

