सुबह के करीब सात बजे, महाराजगंज जिले के नौतनवा कस्बे के एक पेट्रोल पंप पर असामान्य हलचल शुरू हो चुकी थी. हल्की ठंडक के बीच मोटरसाइकिलों, कारों और छोटे कमर्शियल वाहनों की लंबी कतार धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी. इन वाहनों के नंबर प्लेट पर नजर डालें तो एक बात साफ दिखती है.
इनमें बड़ी संख्या नेपाल से आए वाहनों की है. करीब 35 वर्षीय रमेश गुरूंग, जो नेपाल के भैरहवा से आए हैं, अपनी बारी का इंतजार करते हुए कहते हैं, “हमारे यहां डीजल बहुत महंगा हो गया है. यहां भरवाना मजबूरी है, नहीं तो रोज़ का खर्च चलाना मुश्किल हो जाएगा.”
यह दृश्य अब एक दिन या एक पंप तक सीमित नहीं रहा. उत्तर प्रदेश के नेपाल से सटे जिलों-महाराजगंज, निचलौल, सिंदुरिया, बहराइच, लखीमपुर और गोंडा में, लगभग हर पेट्रोल पंप पर यही तस्वीर देखने को मिल रही है. वजह साफ है: नेपाल और भारत के ईंधन दामों के बीच बढ़ता अंतर.
नेपाल में हाल ही में डीजल की कीमत में करीब 33 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है, जिससे इसकी कीमत भारतीय मुद्रा में लगभग 148.125 रुपए प्रति लीटर तक पहुंच गई है. इसके उलट भारत में डीजल करीब 88.88 रुपए और पेट्रोल 95.13 रुपए प्रति लीटर मिल रहा है. यानी दोनों देशों के बीच कीमतों में लगभग 50-60 रुपए प्रति लीटर तक का अंतर बन गया है. यही अंतर सीमावर्ती इलाकों में “फ्यूल माइग्रेशन” का कारण बन रहा है.
मांग में विस्फोट, आपूर्ति पर दबाव
पेट्रोल पंप संचालकों के मुताबिक, सामान्य दिनों की तुलना में खपत लगभग तीन गुना तक बढ़ गई है. नौतनवा के एक पंप मालिक बताते हैं, “पहले जहां एक दिन में जितना ईंधन बिकता था, अब उतना आधे दिन में खत्म हो जा रहा है. शाम होते-होते टैंक खाली हो जाते हैं.” इस बढ़ी हुई मांग ने आपूर्ति व्यवस्था को भी झटका दिया है. कई पंपों पर रात आठ बजे तक ‘ड्राई’ होने की स्थिति बन रही है.
हालांकि अधिकारी बार-बार यह साफ कर रहे हैं कि वास्तविक कमी नहीं है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उपभोक्ताओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. जिलापूर्ति अधिकारी एपी सिंह कहते हैं, “ईंधन की कोई कमी नहीं है. हमने पंप संचालकों को निर्देश दिए हैं कि वे वितरण में पारदर्शिता रखें और किसी भी तरह की जमाखोरी न होने दें.”
स्थिति को संभालने के लिए कई पेट्रोल पंपों ने एक नया नियम लागू किया है- एक वाहन को अधिकतम 200 रुपए का ही पेट्रोल या सीमित मात्रा में डीजल दिया जाएगा. इस कदम का मकसद जमाखोरी रोकना और अधिक से अधिक लोगों तक ईंधन पहुंचाना है. लेकिन इस नियम ने समस्या को पूरी तरह हल करने के बजाय एक नया संकट पैदा कर दिया है. स्थानीय निवासी अरविंद मिश्रा कहते हैं, “जो नेपाली वाहन चालक टैंक फुल कराने आते हैं, उन्हें बार-बार लाइन में लगना पड़ता है. इससे भीड़ और बढ़ रही है. हम लोग अपने काम के लिए भी समय पर पेट्रोल नहीं भरवा पा रहे.” पंप के एक कर्मचारी के अनुसार, “कुछ लोग कई बार लाइन में लगकर ज्यादा पेट्रोल लेने की कोशिश करते हैं. इससे विवाद की स्थिति बनती है.”
विवाद और सामाजिक तनाव
भीड़ बढ़ने के साथ-साथ विवाद भी बढ़ रहे हैं. हाल ही में महाराजगंज के एक पेट्रोल पंप पर स्थानीय भारतीय और नेपाली वाहन चालक के बीच कहासुनी हो गई, जिससे देखते ही देखते पूरा माहौल तनावपूर्ण हो गया. मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने किसी तरह मामला शांत कराया, लेकिन इस तरह की घटनाएं अब आम होती जा रही हैं.
स्थानीय लोगों की मांग है कि भारतीय और नेपाली वाहनों के लिए अलग-अलग लाइन बनाई जाए. उनका कहना है कि इससे न केवल व्यवस्था सुधरेगी, बल्कि विवाद भी कम होंगे. तहसीलदार कर्ण सिंह कहते हैं, “मामला हमारे संज्ञान में है. जल्द ही पेट्रोल पंप संचालकों के साथ बैठक कर व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे.”
हालांकि इस पूरी स्थिति को केवल कीमतों के अंतर से समझना अधूरा होगा. इसके पीछे एक और बड़ा कारण है- पैनिक बाइंग यानी घबराहट में खरीदारी. अधिकारियों के मुताबिक, सोशल मीडिया पर चल रही अफवाहों, जैसे चुनाव के बाद ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी या वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने वाली हैं- ने लोगों में असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है. इसी के चलते लोग जरूरत से ज्यादा ईंधन खरीदने की कोशिश कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश स्टेट पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रंजीत सिंह कहते हैं, “मांग में यह उछाल वास्तविक कमी की वजह से नहीं है. यह अफवाहों, लॉजिस्टिक देरी और सीमा पार कीमतों के अंतर का मिला-जुला असर है.”
जमाखोरी रोकने के उपाय और उनके साइड इफेक्ट
तेल कंपनियों ने जमाखोरी रोकने के लिए कई सख्त कदम उठाए हैं. इनमें थोक बिक्री पर नियंत्रण और एक बार में सीमित मात्रा में ईंधन देने का नियम शामिल है. उदाहरण के तौर पर, कई जगहों पर 200 लीटर के बैरल में डीजल देने पर रोक लगा दी गई है, जो आमतौर पर खेती के कामों में इस्तेमाल होता है. इसके अलावा, प्रति ट्रांजैक्शन लगभग 20 लीटर तक की सीमा तय की गई है. हालांकि इन उपायों का उद्देश्य वितरण को संतुलित करना है, लेकिन इससे ग्रामीण इलाकों में नई दिक्कतें पैदा हो गई हैं.
किसान, जो आमतौर पर खेती के पीक सीजन में डीजल का स्टॉक रखते हैं, अब बार-बार पंप पर जाने को मजबूर हैं. इससे उनकी लागत और समय दोनों बढ़ रहे हैं. एक किसान कहते हैं, “पहले हम एक बार में डीजल ले आते थे. अब हर दो दिन में लाइन लगानी पड़ रही है.” तेल कंपनियों ने सप्लाई चेन को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए रियल-टाइम इन्वेंट्री सिस्टम लागू किया है. इसके तहत पंपों को ईंधन तभी भेजा जाता है जब उनका स्टॉक लगभग खत्म होने वाला होता है.
नए सिस्टम से जमाखोरी पर लगाम तो लगी है, लेकिन कभी-कभी इससे ‘अस्थाई कमी’ का भ्रम पैदा हो जाता है. लखनऊ के एक पेट्रोल पंप ऑपरेटर बताते हैं, “अगर किसी एक पंप पर कुछ समय के लिए ईंधन खत्म हो जाता है, तो लोग पास के पंपों पर टूट पड़ते हैं. इससे अचानक भीड़ बढ़ जाती है और ऐसा लगता है कि हर जगह कमी हो गई है.”
प्रशासन की सख्ती और निगरानी
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने सीमावर्ती इलाकों में निगरानी बढ़ा दी है. पुलिस, स्थानीय प्रशासन और पेट्रोलियम निगरानी टीमों के बीच समन्वय स्थापित किया गया है. अधिकारियों का कहना है कि वे इस बात पर नजर रख रहे हैं कि कहीं ईंधन की कालाबाजारी या अवैध तरीके से नेपाल ले जाने का सिलसिला तो नहीं बढ़ रहा.
हालांकि बड़े पैमाने पर तस्करी की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन छोटे स्तर पर इस तरह की गतिविधियों से इनकार नहीं किया जा सकता. इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और उत्तर प्रदेश के स्टेट हेड संजय भंडारी का कहना है कि सप्लाई पूरी तरह स्थिर है. वे कहते हैं, “पेट्रोल और डीजल की कोई कमी नहीं है. सीमावर्ती जिलों में मांग बढ़ी है, जिसे देखते हुए सप्लाई बढ़ा दी गई है. कुछ मामलों में सप्लाई दोगुनी तक की गई है.” उनके मुताबिक, मौजूदा स्थिति “डिमांड डिस्टॉर्शन” का उदाहरण है, जहां वास्तविक कमी के बजाय लोगों की धारणा और व्यवहार से संकट पैदा होता है.
इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल पेट्रोल पंपों तक सीमित नहीं है. इसका प्रभाव सीमावर्ती अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है. एक तरफ जहां पंप संचालकों की बिक्री बढ़ी है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय उपभोक्ताओं को परेशानी झेलनी पड़ रही है. ट्रांसपोर्ट, खेती और छोटे व्यवसायों पर भी इसका असर दिखने लगा है. विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो यह एक बड़े आर्थिक और सामाजिक संकट का रूप ले सकती है.

