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यूपी की लेखपाल भर्ती में आरक्षण और राजनीतिक दखल को लेकर क्या सवाल उठ रहे?

16 दिसंबर और 28 दिसंबर के विज्ञापनों के बाद लेखपाल भर्ती-2025 को लेकर सामान्य और ओबीसी वर्ग के प्रतियोगी आमने-सामने हैं

UPSSSC VDO July 2023 Exam Result Soon
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 30 दिसंबर , 2025

उत्तर प्रदेश में राजस्व लेखपाल भर्ती परीक्षा 2025 एक बार फिर बड़े विवाद की वजह बन गई है. 7994 पदों पर होने वाली इस भर्ती को लेकर न सिर्फ प्रतियोगी छात्रों में असंतोष है, बल्कि आरक्षण नीति, राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. 

मामला तब तूल पकड़ गया, जब उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UPSSSC) ने 16 दिसंबर को जारी विज्ञापन को निरस्त कर 28 दिसंबर को संशोधित विज्ञापन जारी कर दिया. इस संशोधन में सामान्य वर्ग के पदों में भारी कटौती और ओबीसी वर्ग के पदों में वृद्धि की गई, जिसे लेकर छात्र संगठन सरकार और आयोग पर निशाना साध रहे हैं.

16 दिसंबर को UPSSSC ने राजस्व लेखपाल के 7994 पदों पर भर्ती का विज्ञापन जारी किया. इसमें पदों का वर्गवार बंटवारा इस प्रकार था– सामान्य वर्ग : 4165, अनुसूचित जाति (SC): 1426, अनुसूचित जनजाति (ST): 150, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 1441, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS): 792. विज्ञापन जारी होते ही अति पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) वर्ग के कुछ संगठनों और प्रतियोगी छात्रों ने आपत्ति जताई कि उन्हें नियमानुसार 27 फीसदी आरक्षण नहीं दिया गया है. 

इस मुद्दे को राजनीतिक समर्थन तब मिला, जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार पर पिछड़ा विरोधी होने का आरोप लगाया. मामला बढ़ता देख आयोग ने 16 दिसंबर का विज्ञापन वापस ले लिया. इसके बाद 28 दिसंबर को संशोधित विज्ञापन जारी किया गया, जिसमें सामान्य वर्ग के 905 पद घटा दिए गए. वहीं SC के 253, ST के 10 और OBC के 717 पद बढ़ा दिए गए. इसके साथ ही 29 दिसंबर से ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया शुरू कर दी गई.

छात्र संगठनों का विरोध और आरोप

इस बदलाव के बाद प्रतियोगी छात्र संघर्ष समिति और छात्र आंदोलन समन्वय समिति खुलकर विरोध में उतर आईं. समिति के संयोजक और मीडिया प्रभारी प्रशांत पांडेय ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर पूरे मामले पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग की. उनका आरोप है कि राजनीतिक दबाव के चलते अनारक्षित वर्ग के मेधावी छात्रों के हितों से समझौता किया गया. छात्र संगठनों का कहना है कि अगर 16 दिसंबर का विज्ञापन गलत था, तो सरकार और आयोग यह स्पष्ट करें कि उसमें क्या त्रुटि थी, उस त्रुटि के लिए कौन जिम्मेदार था और उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई? साथ ही यह भी बताया जाए कि 28 दिसंबर के संशोधित विज्ञापन में सामान्य वर्ग के पद किस आधार पर घटाए गए. 

प्रशांत पांडेय का दावा है कि यह बदलाव न तो पारदर्शी है और न ही प्रशासनिक रूप से स्पष्ट. उनका कहना है कि सरकार राजनीतिक ब्लैकमेलिंग के आगे झुककर योग्य सामान्य वर्ग के छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है. छात्र संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर भर्ती 16 दिसंबर वाले विज्ञापन के अनुसार आगे नहीं बढ़ी या श्वेत पत्र जारी नहीं हुआ, तो वे अदालत की शरण लेंगे और प्रदेशव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे.

सामान्य वर्ग के छात्रों का पक्ष

सामान्य वर्ग के प्रतियोगी छात्रों का कहना है कि वे पहले से ही सीमित अवसरों और कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहे हैं. ऐसे में अचानक 905 पदों की कटौती उनके लिए बड़ा झटका है. कई छात्रों ने तैयारी इसी विज्ञापन के आधार पर शुरू की थी और अब नियम बदल जाने से उनकी रणनीति और मनोबल दोनों प्रभावित हुए हैं. छात्रों का तर्क है कि आरक्षण व्यवस्था संविधानसम्मत है, लेकिन उसका पालन पारदर्शी और स्पष्ट तरीके से होना चाहिए. बार-बार विज्ञापन बदलना यह संकेत देता है कि या तो आयोग ने शुरुआत में लापरवाही की, या फिर बाद में राजनीतिक दबाव में फैसले बदले गए. दोनों ही स्थितियां प्रशासनिक विफलता को दर्शाती हैं.

ओबीसी वर्ग के प्रतियोगी छात्रों का पक्ष

दूसरी ओर, ओबीसी वर्ग के छात्र और संगठन संशोधित विज्ञापन को सही ठहरा रहे हैं. उनका कहना है कि संविधान और राज्य की आरक्षण नीति के अनुसार उन्हें 27 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए था, जो 16 दिसंबर के विज्ञापन में नहीं दिया गया. उनके अनुसार यह ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों के अधिकारों की अनदेखी थी. ओबीसी छात्रों का तर्क है कि अगर शुरुआती विज्ञापन में ही नियमों का पालन होता, तो आज विवाद की स्थिति पैदा नहीं होती. वे यह भी कहते हैं कि सामान्य वर्ग के पद कम होने की बात को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है, जबकि असल मुद्दा आरक्षण नियमों के सही अनुपालन का है.

आयोग और सरकार का क्या कहना है

UPSSSC का कहना है कि संशोधित विज्ञापन आरक्षण नियमों के अनुरूप है. आयोग के अनुसार, राजस्व विभाग से मिले संशोधित आरक्षण रोस्टर के आधार पर ही नए पदों का निर्धारण किया गया है. आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि लेखपाल भर्ती के लिए केवल वही अभ्यर्थी पात्र होंगे, जिन्होंने PET-2025 में भाग लिया हो और जिनका स्कोर कार्ड आयोग द्वारा जारी किया गया हो. आयोग के मुताबिक, शॉर्टलिस्टिंग PET-2025 के स्कोर के आधार पर होगी और शून्य या नकारात्मक अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों को चयन प्रक्रिया में शामिल नहीं किया जाएगा. आयोग का दावा है कि पूरी प्रक्रिया नियमों और न्यायालय के दिशा-निर्देशों के तहत की जा रही है.

राजनीतिक दखल और बयानबाजी

इस भर्ती विवाद में राजनीति की भूमिका भी साफ नजर आती है. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि सपा के विरोध के बाद आयोग को नई सूची जारी करनी पड़ी, जिसमें ओबीसी के 717 पद बढ़े और सामान्य वर्ग के 905 पद घटे. विपक्ष इसे अपनी जीत बता रहा है, जबकि सरकार पर दबाव में फैसले बदलने के आरोप लग रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में भर्ती और आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे अक्सर चुनावी राजनीति से जुड़ जाते हैं. इससे नीतिगत फैसले प्रशासनिक तर्क से ज्यादा राजनीतिक संतुलन के आधार पर लिए जाने लगते हैं.

भर्ती प्रक्रियाओं में आरक्षण विवाद बार-बार क्यों?

यह पहला मौका नहीं है जब यूपी में किसी भर्ती को लेकर आरक्षण विवाद खड़ा हुआ हो. विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं. पहला, आरक्षण रोस्टर और पद निर्धारण में प्रारंभिक स्तर पर की जाने वाली लापरवाही. दूसरा, विभिन्न वर्गों के आंकड़ों को लेकर स्पष्ट और सार्वजनिक जानकारी का अभाव. तीसरा, राजनीतिक दखल, जो प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित करता है. जानकार बताते हैं कि इसके अलावा, अदालतों के अलग-अलग फैसलों और राज्य सरकार के संशोधित नियमों के चलते भी भ्रम की स्थिति बनती है. जब तक आयोग और सरकार शुरुआत से ही पूरी गणना और तर्क सार्वजनिक नहीं करते, तब तक ऐसे विवाद बार-बार सामने आते रहेंगे.

लेखपाल भर्ती 2025 का विवाद केवल पदों के घटने-बढ़ने तक सीमित नहीं है. यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता, आरक्षण नीति के सही क्रियान्वयन और राजनीतिक दखल जैसे बड़े सवालों को सामने लाता है. सामान्य और ओबीसी, दोनों वर्गों के छात्रों की अपनी-अपनी चिंताएं और तर्क हैं, लेकिन सबसे बड़ा नुकसान उन अभ्यर्थियों का हो रहा है जो वर्षों से तैयारी कर रहे हैं और बार-बार बदलते नियमों के बीच फंस जाते हैं. 

अब निगाहें सरकार और आयोग पर टिकी हैं कि वे इस विवाद को कैसे सुलझाते हैं. श्वेत पत्र जारी कर स्पष्टता लाई जाती है या मामला अदालत और सड़क तक जाता है, यह आने वाले दिनों में तय होगा. इतना तय है कि जब तक भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और स्थिरता नहीं आएगी, तब तक ऐसे विवाद यूपी की भर्तियों का हिस्सा बने रहेंगे.

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