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उत्तर प्रदेश में क्यों बढ़ाई गई IAS अधिकारियों की संख्या?

केंद्र सरकार ने यूपी में IAS कैडर की संख्या 652 से बढ़ाकर 683 कर दी है

Uttar Pradesh, CM Yogi Adityanath meeting
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अधिकारियों के मीटिंग करते हुए (फाइल फोटो)
अपडेटेड 5 जनवरी , 2026

उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और प्रशासनिक रूप से जटिल राज्य में शासन की रीढ़ भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) मानी जाती है. आबादी, भौगोलिक विस्तार, योजनाओं की संख्या और राजनीतिक अपेक्षाओं के लिहाज से यूपी हमेशा से अतिरिक्त प्रशासनिक दबाव वाला राज्य रहा है. 

ऐसे में यूपी के लिए IAS कैडर की स्वीकृत संख्या 652 से बढ़ाकर 683 होना केवल एक तकनीकी संशोधन नहीं, बल्कि चुनावी साल में योगी सरकार के लिए एक अहम प्रशासनिक और राजनीतिक राहत के तौर पर देखा जा रहा है. केंद्र सरकार की तरफ से यह फैसला 31 दिसंबर 2025 को अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951 के तहत भारतीय प्रशासनिक सेवा (कैडर स्ट्रेंथ फिक्सेशन) आठवें संशोधन रेगुलेशन, 2025 के जरिए नोटिफाई किया गया. 

उत्तर प्रदेश सरकार से सलाह-मशविरा कर लिया गया यह निर्णय आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशन के साथ ही लागू हो गया. कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) की अधिसूचना के अनुसार, इस संशोधन से न सिर्फ नौ नए पद जुड़े हैं, बल्कि लंबे समय से खाली चल रहे 18 पदों के साथ कुल 27 पदों पर DPC के जरिए PCS अधिकारियों का IAS में प्रमोशन के लिए रास्ता भी साफ हो गया है.

IAS की कमी और प्रशासनिक दबाव

उत्तर प्रदेश में पिछले कई वर्षों से IAS अधिकारियों की संख्या जरूरत के मुकाबले कम मानी जाती रही है. राज्य में 75 जिले, 18 मंडल, सैकड़ों विकास प्राधिकरण, बिजली वितरण कंपनियां, स्वास्थ्य मिशन, शिक्षा, समाज कल्याण और ग्रामीण विकास से जुड़ी बड़ी-बड़ी योजनाएं चल रही हैं. इसके बावजूद कई वरिष्ठ अधिकारी एक साथ दो-दो, कभी-कभी तीन-तीन अहम जिम्मेदारियां संभालते रहे हैं. एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ IAS अधिकारी के अनुसार, “यूपी में जिला मजिस्ट्रेट, मंडलायुक्त और सचिव स्तर पर काम का बोझ लंबे समय से असंतुलित रहा है. कई बार एक अधिकारी के पास इतने विभाग होते हैं कि नीति निर्माण और निगरानी दोनों प्रभावित होती हैं. इसका असर सीधे शासन की गुणवत्ता पर पड़ता है.” 

IAS कैडर की कमी का सबसे बड़ा असर फील्ड लेवल पर दिखता रहा है. इससे कानून-व्यवस्था, विकास योजनाओं और चुनावी तैयारियों पर भी असर पड़ता रहा है. खासकर चुनाव के दौरान अनुभवी अधिकारियों की कमी शासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाती है.

अधिकारियों की बढ़ोतरी से क्या बदलेगा

संशोधित कैडर स्ट्रक्चर के मुताबिक यूपी में अब कुल 370 सीनियर ड्यूटी पद होंगे. सेंट्रल डेपुटेशन रिजर्व 148, स्टेट डेपुटेशन रिजर्व 92, ट्रेनिंग रिजर्व 12 और लीव व जूनियर पोस्ट रिजर्व 61 पद तय किए गए हैं. IAS (भर्ती) नियम, 1954 के तहत 207 पद प्रमोशन से और 476 पद सीधी भर्ती से भरे जाएंगे. इसका सीधा फायदा यह होगा कि सचिवालय से लेकर फील्ड तक अधिकारियों की उपलब्धता बेहतर होगी. 

नए कैडर में 25 प्रधान सचिव, 12 संभागीय आयुक्त, 46 सचिव, 75 जिला मजिस्ट्रेट और 84 विशेष सचिव जैसे पद शामिल हैं. इसके अलावा शहरी विकास प्राधिकरणों, बिजली वितरण कंपनियों, स्वास्थ्य मिशनों, ग्रामीण विकास एजेंसियों और नियामक निकायों में भी वरिष्ठ पद शामिल किए गए हैं. राज्य सरकार से जुड़े एक अधिकारी का कहना है, “यह बढ़ोतरी सिर्फ संख्या का खेल नहीं है. इससे काम के बंटवारे में संतुलन आएगा. अधिकारी रणनीतिक फैसलों पर ज्यादा फोकस कर पाएंगे, न कि फायरफाइटिंग पर.”

PCS से IAS प्रमोशन और भीतर की राजनीति

इस फैसले का एक अहम पहलू प्रांतीय सिविल सेवा यानी PCS अधिकारियों के लिए IAS प्रमोशन का रास्ता खुलना है. 2010 और 2011 बैच के PCS अधिकारी लंबे समय से DPC का इंतजार कर रहे थे. नौ नए पदों और 18 खाली पदों के साथ 27 पदों पर प्रमोशन से न सिर्फ अधिकारियों का मनोबल बढ़ेगा, बल्कि शासन के भीतर अनुभव और निरंतरता भी आएगी. 

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि PCS से प्रमोट होकर आने वाले IAS अधिकारी राज्य की प्रशासनिक जमीनी हकीकत को बेहतर समझते हैं. बाराबंकी के एक डिग्री कालेज में राजनीति शास्त्र विभाग के शि‍क्षक आजाद कुमार सिंह कहते हैं, “सीधी भर्ती के अधिकारी जहां नीतिगत दृष्टि मजबूत करते हैं, वहीं PCS से आए अधिकारी जमीन से जुड़े होते हैं. चुनावी साल में सरकार को ऐसे अफसर चाहिए जो योजनाओं को तेजी से और बिना रुकावट लागू कर सकें.”

चुनावी साल और प्रशासनिक मशीनरी

वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले योगी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी योजनाओं का असर जमीन पर दिखाने की है. चाहे इंफ्रास्ट्रक्चर हो, कानून-व्यवस्था हो या फिर सामाजिक कल्याण की योजनाएं, सबकी डिलीवरी प्रशासनिक मशीनरी पर निर्भर करती है. IAS कैडर की बढ़ी हुई संख्या से सरकार को जिलों और विभागों में ज्यादा स्थिरता मिलेगी. ट्रांसफर-पोस्टिंग का दबाव कुछ हद तक कम होगा और अधिकारियों को लंबी अवधि के लक्ष्य पर काम करने का मौका मिलेगा. एक पूर्व मुख्य सचिव के अनुसार, “चुनाव से पहले सरकारें चाहती हैं कि जिलों में अनुभवी और भरोसेमंद अफसर हों. कैडर स्ट्रेंथ बढ़ने से विकल्प बढ़ते हैं और मजबूरी में गलत पोस्टिंग से बचा जा सकता है.” 

इस फैसले को केंद्र और योगी सरकार के बीच बेहतर तालमेल के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है. कैडर स्ट्रेंथ फिक्सेशन में केंद्र की भूमिका अहम होती है और राज्यों की मांगों पर हमेशा तुरंत सहमति नहीं बनती. ऐसे में यूपी जैसे राज्य के लिए कैडर बढ़ोतरी का फैसला राजनीतिक रूप से भी अहम माना जा रहा है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह कदम बताता है कि केंद्र, यूपी सरकार की प्रशासनिक जरूरतों को गंभीरता से ले रहा है. आजाद कुमार सिंह कहते हैं, “यह संदेश जाता है कि केंद्र और राज्य के बीच टकराव नहीं, बल्कि समन्वय है. चुनावी माहौल में यह सरकार के लिए सकारात्मक नैरेटिव बनाने में मदद करता है.”

हालांकि विपक्ष इसे केवल चुनावी सुविधा तक सीमित बताने की कोशिश कर सकता है. कुछ विपक्षी नेताओं का कहना है कि कैडर बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है मौजूदा अधिकारियों की जवाबदेही तय करना. लेकिन प्रशासनिक जानकार मानते हैं कि जवाबदेही और संसाधन दोनों साथ-साथ चलते हैं. जब अधिकारी कम होते हैं और काम ज्यादा, तब निगरानी और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं. 

एक सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी बताते हैं, “कैडर बढ़ोतरी का वास्तविक असर तुरंत नहीं दिखता, लेकिन इसके संकेत अगले एक-दो साल में सामने आने लगेंगे. प्रमोशन से आए नए IAS अधिकारियों की पोस्टिंग, सचिवालय में काम का पुनर्वितरण और फील्ड में स्थिरता इसके शुरुआती संकेत होंगे.” अधिकारी के मुताबिक के मुताबिक, “अगर सरकार इस बढ़ोतरी का सही इस्तेमाल करती है, तो योजनाओं की मॉनिटरिंग बेहतर होगी, जिलों में फैसले तेज होंगे और चुनावी साल में शासन की धार मजबूत दिखेगी.”

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