लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में पिछले महीने भर्ती हुए 32 वर्षीय रवि शुक्ला की हालत अचानक बिगड़ गई थी. शुरुआत साधारण उल्टी-दस्त से हुई, लेकिन कुछ ही घंटों में तेज बुखार और डिहाइड्रेशन ने स्थिति गंभीर कर दी. डॉक्टरों की शुरुआती जांच में साफ हुआ कि उन्होंने नाश्ते में जो अंडा खाया था, वह खराब था.
परिवार को भरोसा था कि बाजार से खरीदा गया अंड़ा ताजा है लेकिन बाद में पता चला कि वह कई दिन पुराना था. डॉक्टरों ने साफ कहा—अगर अंडे की ताज़गी और एक्सपायरी की जानकारी होती, तो यह स्थिति टाली जा सकती थी.
बलरामपुर अस्पताल में तैनात रहे पेट रोग विशेषज्ञ डा. ए. सी. श्रीवास्तव के अनुसार पहचान न होने के कारण बासी अंडे खाने से कई बार लोग फूड प्वायजनिंग जैसी बीमारी के शिकार हो जाते हैं. चूंकि ऐसे मामलों का कोई रिकार्ड नहीं होता लेकिन बासी अंडे खाने से होने वाली बीमारियों से पीड़ितों की संख्या में लगातार इजाफा ही हो रहा है.
ऐसे ही मामलों ने उत्तर प्रदेश सरकार को एक बड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर किया है. योगी सरकार ने 1 अप्रैल से राज्य में बिकने वाले हर अंडे पर उसकी उत्पादन तिथि और एक्सपायरी डेट की मुहर लगाना अनिवार्य करने का फैसला किया है. यह फैसला पहली नजर में छोटा लग सकता है, लेकिन इसका असर सीधे उपभोक्ता की सेहत, बाजार की पारदर्शिता और पूरे पोल्ट्री सेक्टर की कार्यप्रणाली पर पड़ेगा.
पशुपालन विभाग के मुताबिक अब हर अंडे पर दो तारीखें साफ-साफ लिखी होंगी, पहली, जिस दिन अंडा दिया गया और दूसरी, जिस दिन तक वह खाने के लिए सुरक्षित है. यह नियम सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके पालन को लेकर सख्त कार्रवाई का भी प्रावधान किया गया है. जो व्यापारी या किसान इसका पालन नहीं करेंगे, उनके अंडे या तो नष्ट कर दिए जाएंगे या उन पर “इंसानों के खाने के लिए उपयुक्त नहीं” की मुहर लगा दी जाएगी.
उत्तर प्रदेश में अंडा उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, लेकिन अब भी मांग के मुकाबले काफी पीछे है. राज्य में रोजाना करीब 1.5 से 1.7 करोड़ अंडों का उत्पादन होता है, जबकि खपत 3.5 से 5.5 करोड़ अंडों के बीच आंकी जाती है. यानी जरूरत का बड़ा हिस्सा अब भी दूसरे राज्यों से आने वाली सप्लाई पर निर्भर है. सालाना स्तर पर देखें तो प्रदेश में लगभग 6 अरब से ज्यादा अंडों का उत्पादन हो रहा है, जिसमें हाल के वर्षों में करीब 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. इसके बावजूद देश के कुल अंडा उत्पादन में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी अभी भी लगभग 4 प्रतिशत के आसपास ही है.
जहां तक एक्सपायरी डेट का सवाल है, अभी बाजार में खासतौर पर बड़े ब्रांडेड और पैकेज्ड अंडे जो कि संगठित पोल्ट्री कंपनियां सप्लाई करती हैं, उन पर ही उत्पादन और बेस्ट बिफोर की तारीख लिखी होती है. ऐसे अंडों की हिस्सेदारी प्रदेश के कुल बाजार में लगभग 15 से 20 प्रतिशत के बीच मानी जाती है, जबकि बाकी 80 प्रतिशत से ज्यादा अंडे खुले में, बिना किसी तारीख या लेबल के ही बेचे जाते हैं.
सरकार का तर्क साफ है, अब तक अंडों के कारोबार में एक बड़ा हिस्सा भरोसे पर चलता था, जिसमें उपभोक्ता पूरी तरह से दुकानदार पर निर्भर रहता था. लेकिन कई मामलों में इसी भरोसे का फायदा उठाया जाता था. पुराने अंडों को नए बताकर बेचना, गलत तरीके से स्टोरेज करना और एक्सपायरी के बाद भी बिक्री जारी रखना आम शिकायतें रही हैं.
अतिरिक्त मुख्य सचिव (पशुपालन और डेयरी) मुकेश मेश्राम के मुताबिक, खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन (FSDA) ने पहले से ही अंडों के भंडारण और बिक्री के लिए स्पष्ट नियम बनाए हैं, लेकिन उनका पालन सही तरीके से नहीं हो रहा था. खासकर दूसरे राज्यों से आने वाले व्यापारियों के मामले में लापरवाही ज्यादा देखने को मिली. यही वजह है कि अब नियमों को सख्ती से लागू करने का फैसला किया गया है.
इस व्यवस्था के पीछे एक वैज्ञानिक आधार भी है. सामान्य तापमान, यानी करीब 30 डिग्री सेल्सियस पर रखा गया अंडा लगभग दो हफ्ते तक सुरक्षित माना जाता है. वहीं, अगर उसे 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के बीच कोल्ड स्टोरेज में रखा जाए, तो उसकी उम्र पांच हफ्ते तक बढ़ सकती है. लेकिन असल समस्या यहीं से शुरू होती है, अधिकांश दुकानदार यह जानकारी न तो खुद रखते हैं और न ही ग्राहकों को देते हैं.
राज्य में अंडों के लिए समर्पित कोल्ड स्टोरेज की संख्या बेहद सीमित है. सिर्फ आगरा और झांसी में दो बड़े केंद्र हैं. इसके बावजूद, व्यापारी अंडों को सामान्य कोल्ड स्टोरेज में, जहां सब्जियां और अन्य खाद्य पदार्थ रखे जाते हैं, वहां भी स्टोर करते रहे हैं. यह न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी जोखिम भरा है, क्योंकि अलग-अलग खाद्य पदार्थों के लिए अलग तापमान और स्वच्छता मानक जरूरी होते हैं. यहीं पर एक्सपायरी डेट की मुहर एक बड़ा बदलाव ला सकती है. सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि उपभोक्ता खुद तय कर सकेगा कि अंडा ताजा है या नहीं. अब उसे दुकानदार के भरोसे रहने की जरूरत नहीं होगी. यह पारदर्शिता बाजार में ईमानदार व्यापारियों को बढ़ावा देगी और गलत प्रथाओं पर लगाम लगाएगी.
दूसरा बड़ा फायदा स्वास्थ्य के स्तर पर दिखेगा. फूड पॉइजनिंग के मामलों में अक्सर यह पता लगाना मुश्किल होता है कि समस्या किस खाद्य पदार्थ से हुई. लेकिन जब हर अंडे पर स्पष्ट तारीख होगी, तो जांच आसान होगी और जिम्मेदारी तय करना भी सरल हो जाएगा. इससे स्वास्थ्य विभाग की निगरानी भी मजबूत होगी. तीसरा फायदा सप्लाई चेन में सुधार के रूप में सामने आएगा. जब हर अंडे की उम्र दर्ज होगी, तो व्यापारी और डिस्ट्रीब्यूटर स्टॉक को बेहतर तरीके से मैनेज करेंगे. पुराने अंडों को पहले बेचने की प्रवृत्ति बढ़ेगी, जिससे वेस्टेज कम होगा और गुणवत्ता बनी रहेगी.
हालांकि, इस फैसले के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं. सबसे पहली चुनौती छोटे किसानों और स्थानीय विक्रेताओं के सामने आएगी. बड़े पोल्ट्री फार्म्स के लिए हर अंडे पर प्रिंट करना आसान है, क्योंकि उनके पास मशीनें और संसाधन हैं. लेकिन छोटे स्तर पर काम करने वाले किसानों के लिए यह अतिरिक्त व्यवस्था करना आसान नहीं होगा, भले ही प्रति अंडा लागत 3-4 पैसे ही क्यों न हो. दूसरी चुनौती निगरानी और क्रियान्वयन की है.
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में हर बाजार, हर दुकान और हर सप्लाई चैन पर नजर रखना आसान नहीं है. FSDA और पशुपालन विभाग को नियमित निरीक्षण के लिए पर्याप्त संसाधन और स्टाफ की जरूरत होगी. अगर निगरानी ढीली रही, तो नियम कागजों तक ही सीमित रह सकता है. तीसरी समस्या बाहर से आने वाले अंडों को लेकर है. राज्य में बड़ी मात्रा में अंडे दूसरे राज्यों से भी आते हैं. ऐसे में यह सुनिश्चित करना कि हर बाहरी सप्लायर भी नियमों का पालन करे, एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती होगी. हालांकि सरकार ने साफ कर दिया है कि ऐसे अंडों पर विशेष नजर रखी जाएगी और नियम तोड़ने पर सख्त कार्रवाई होगी.
फिर भी, कुल मिलाकर यह कदम खाद्य सुरक्षा के लिहाज से एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा रहा है. विकसित देशों में इस तरह की व्यवस्था पहले से लागू है, जहां हर खाद्य उत्पाद पर उसकी ट्रेसबिलिटी सुनिश्चित की जाती है. उत्तर प्रदेश में इस पहल को उसी दिशा में एक शुरुआती कदम के तौर पर देखा जा सकता है.
सरकार की योजना सिर्फ नियम लागू करने तक सीमित नहीं है. पशुपालन विभाग राज्य में अंडा उत्पादन बढ़ाने और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर भी काम कर रहा है. कोल्ड स्टोरेज की संख्या बढ़ाने, आधुनिक स्टोरेज सुविधाएं विकसित करने और सप्लाई चेन को बेहतर बनाने की योजना पर काम चल रहा है. अगर ये प्रयास जमीन पर उतरते हैं, तो न सिर्फ उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता मिलेगी, बल्कि किसानों और व्यापारियों को भी फायदा होगा.

