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कॉलेजों में ड्रेस कोड! यूनीफॉर्म से अनुशासन आएगा या छात्रों की मुश्किलें बढ़ेंगी?

योगी सरकार ने उच्च शिक्षा संस्थानों में ड्रेस कोड लागू करने का लिया निर्णय, 75 लाख छात्रों पर असर; अनुशासन, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर बहस तेज

Students (File Photo)
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 22 मई , 2026

उत्तर प्रदेश में अब कॉलेज छात्रों को जल्द ही यूनिफॉर्म पहननी होगी क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने 21 मई को राज्य भर के उच्च शिक्षण संस्थानों में ड्रेस कोड अनिवार्य करने की योजना की घोषणा की है. यह घोषणा प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के उस निर्देश के एक दिन बाद आई है जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को स्कूलों की तरह यूनिफॉर्म लागू करने की संभावना तलाशने का निर्देश दिया था. 

इस तरह प्रदेश में स्कूलों के बाद अब कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में भी यूनिफॉर्म लागू करने की तैयारी ने नई बहस छेड़ दी है. सरकार इसे अनुशासन, समानता और सामाजिक समरसता से जोड़कर देख रही है जबकि शिक्षाविदों और छात्र संगठनों के बीच इसे लेकर अलग-अलग राय उभर रही है. अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो उत्तर प्रदेश देश का पहला ऐसा बड़ा राज्य बन सकता है, जहां उच्च शिक्षा संस्थानों में व्यापक स्तर पर यूनिफॉर्म अनिवार्य होगी.

प्रदेश में इस समय सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों को मिलाकर करीब 75 लाख से अधिक छात्र-छात्राएं उच्च शिक्षा से जुड़े हुए हैं. उच्च शिक्षा विभाग के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 35 से अधिक राज्य विश्वविद्यालय, निजी विश्वविद्यालय और लगभग आठ हजार से अधिक कॉलेज संचालित हैं. ऐसे में ड्रेस कोड लागू होने का असर सीधे तौर पर लाखों छात्रों पर पड़ेगा. इनमें ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थी, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, पेशेवर पाठ्यक्रमों के छात्र और शहरी निजी कॉलेजों में पढ़ने वाले युवा भी शामिल होंगे. 

योगी सरकार इस फैसले को केवल पहनावे तक सीमित नहीं मान रही. उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने स्पष्ट किया है कि छात्रों के बीच बढ़ती सामाजिक और आर्थिक असमानता को कम करने के लिए एक समान ड्रेस कोड जरूरी है. सरकार का तर्क है कि कई बार छात्रों के कपड़े उनकी आर्थिक स्थिति को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करते हैं, जिससे कुछ विद्यार्थियों में हीन भावना पैदा होती है, जबकि कुछ में श्रेष्ठता का भाव विकसित होता है. यूनिफॉर्म इस अंतर को कम करने का माध्यम बन सकती है.

इस निर्णय के पीछे एक बड़ा कारण अनुशासन भी बताया जा रहा है. राज्यपाल आनंदीबेन पटेल की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में कॉलेज समय के दौरान छात्रों के बाजारों, मॉल और सार्वजनिक स्थानों पर घूमने को लेकर चिंता जताई गई थी. अधिकारियों का मानना था कि अगर छात्रों की यूनिफॉर्म तय होगी तो उनकी पहचान आसान होगी और संस्थानों में नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी. सरकार इसे स्कूलों की तरह ‘अनुशासित शैक्षणिक संस्कृति’ विकसित करने की दिशा में एक कदम मान रही है. 

दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में योगी सरकार शिक्षा संस्थानों में अनुशासन और निगरानी को लेकर लगातार सख्त रुख अपनाती रही है. नकल विरोधी कानून, बायोमेट्रिक उपस्थिति, सीसीटीवी निगरानी और डिजिटल मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाओं के बाद अब ड्रेस कोड को उसी श्रृंखला का अगला कदम माना जा रहा है. सरकार का मानना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में भी एक नियंत्रित और औपचारिक वातावरण तैयार करना जरूरी है. 

हालांकि इस प्रस्ताव के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियाँ भी हैं. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विश्वविद्यालय और कॉलेज स्कूलों की तरह एकरूप संस्थान नहीं होते. यहां अलग-अलग आयु वर्ग, पाठ्यक्रम और सामाजिक पृष्ठभूमि के छात्र पढ़ते हैं. इंजीनियरिंग, मेडिकल, लॉ, मैनेजमेंट और कला संकाय के छात्रों की आवश्यकताएं भी अलग-अलग होती हैं. ऐसे में पूरे राज्य में एक समान ड्रेस कोड लागू करना आसान नहीं होगा. 

दूसरी चुनौती आर्थिक बोझ की है. ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के कई छात्र पहले ही फीस, किराया और पढ़ाई के अन्य खर्चों से जूझ रहे हैं. यदि यूनिफॉर्म अनिवार्य की जाती है तो उसके अतिरिक्त खर्च का सवाल उठेगा. छात्र संगठनों का तर्क है कि कॉलेज शिक्षा स्कूल की तरह अनिवार्य नहीं होती और यहां बड़ी संख्या में ऐसे विद्यार्थी आते हैं, जो पार्ट टाइम नौकरी या सीमित संसाधनों के सहारे पढ़ाई करते हैं. उनके लिए अतिरिक्त ड्रेस खरीदना बोझ बन सकता है.

एक बड़ा सवाल व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति का भी है. विश्वविद्यालयों को परंपरागत रूप से ऐसे स्थान के रूप में देखा जाता है, जहां छात्रों को अपनी पहचान और विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता होती है. कई शिक्षाविद मानते हैं कि उच्च शिक्षा संस्थानों में अत्यधिक नियंत्रण रचनात्मकता और स्वतंत्र माहौल को प्रभावित कर सकता है. कुछ छात्र संगठनों ने पहले ही संकेत दिए हैं कि यदि कठोर ड्रेस कोड लागू किया गया, तो इसका विरोध हो सकता है. इसके बावजूद सरकार इस फैसले को सामाजिक समानता से जोड़कर राजनीतिक और वैचारिक संदेश देने की कोशिश कर रही है. 

BJP लंबे समय से ‘एकरूपता’ और ‘अनुशासन’ को अपनी प्रशासनिक सोच का हिस्सा बताती रही है. ऐसे में ड्रेस कोड का प्रस्ताव केवल शैक्षणिक सुधार नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण का हिस्सा भी माना जा रहा है. सरकार इसे ‘विकसित उत्तर प्रदेश’ और ‘विकसित भारत’ की अवधारणा से जोड़ रही है, जहां शिक्षा संस्थानों में नियंत्रित और व्यवस्थित माहौल को प्राथमिकता दी जाए.

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार इस व्यवस्था को लागू करती है तो उसे चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ना होगा. संभव है कि शुरुआत सरकारी और सहायता प्राप्त कॉलेजों से हो तथा बाद में निजी संस्थानों को इसमें शामिल किया जाए. यह भी संभावना है कि प्रत्येक विश्वविद्यालय को अपनी परिस्थितियों के अनुसार ड्रेस तय करने की छूट दी जाए क्योंकि पूरे राज्य के लिए एक ही पैटर्न लागू करना व्यवहारिक रूप से कठिन होगा. कुछ शिक्षकों का मानना है कि यूनिफॉर्म से कैंपस में फैशन और दिखावे की प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है. इससे छात्रों का ध्यान पढ़ाई पर अधिक केंद्रित रहने की उम्मीद की जा रही है. वहीं विरोध करने वाले पक्ष का कहना है कि अनुशासन केवल कपड़ों से नहीं आता, बल्कि बेहतर शिक्षण वातावरण, नियमित कक्षाओं और संवाद से विकसित होता है.

सरकार के सामने एक प्रशासनिक चुनौती यह भी होगी कि नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई कैसे तय की जाए. स्कूलों में अनुपालन अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन विश्वविद्यालयों में लाखों छात्रों की निगरानी करना सरल नहीं होगा. इसके अलावा निजी विश्वविद्यालयों और स्वायत्त संस्थानों की अपनी व्यवस्थाएं हैं, जिन पर राज्य सरकार के निर्देशों को लागू कराने में कानूनी और प्रशासनिक जटिलताएं भी आ सकती हैं. 

फिलहाल सरकार ने नीति की औपचारिक रूपरेखा जारी नहीं की है लेकिन संकेत साफ हैं कि आने वाले समय में उत्तर प्रदेश के कॉलेज कैंपस का स्वरूप बदल सकता है. अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो यह केवल छात्रों के पहनावे में बदलाव नहीं होगा, बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों की संस्कृति, स्वतंत्रता और प्रशासनिक ढांचे पर भी व्यापक प्रभाव डालेगा. यही वजह है कि ड्रेस कोड का यह प्रस्ताव अब केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस का विषय बनता जा रहा है.

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